मोहन सरकार में आम नागरिक का काल बजा रहा घंटा ?

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*मोहन सरकार में आम नागरिक का काल बजा रहा घंटा ?*

व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

 

मध्यप्रदेश में सरकार के दो साल पूरे हुए। जश्न का मौसम है। पोस्टर मुस्कुरा रहे हैं, मंच सजे हैं, उपलब्धियों की सूची चमक रही है। मगर इन्हीं दो सालों के बीच अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा सक्रिय रही है तो वह है मौत। कभी दवा बनकर, कभी पानी बनकर, कभी व्यवस्था की शक्ल में। छिंदवाड़ा और इंदौर इसकी दो ताज़ा मिसालें हैं, जिनके बीच की दूरी किलोमीटर में भले हो, पर सरकारी लापरवाही में ज़रा भी नहीं।

 

छिंदवाड़ा में कहानी बच्चों से शुरू होती है। मासूम, जिनकी बीमारी उतनी गंभीर नहीं थी जितनी दवा। कफ सिरप नाम सुनते ही राहत का एहसास होता है। मगर इस सिरप ने खांसी नहीं, साँसें रोक दीं। एक-एक कर बच्चे अस्पताल पहुँचे, फिर मोर्चरी। सरकारी फाइलों में यह “दवा गुणवत्ता में कमी” का मामला है, लेकिन माँ-बाप के लिए यह भरोसे की हत्या थी। जिन हाथों ने बच्चे को दवा पिलाई, वे हाथ आज भी कांपते हैं क्या गुनाह था? सरकारी दवा, सरकारी व्यवस्था, सरकारी भरोसा तीनों ने मिलकर बच्चों को सज़ा दे दी।

 

जांच बैठी। समिति बनी। गिरफ्तारी हुई। बयान आए कि दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। मगर छिंदवाड़ा के घरों में एक सवाल दीवारों पर टंगा रह गया जब यह दवा बाजार में थी, तब कौन सो रहा था? ड्रग कंट्रोलर, स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल, सप्लायर सबने अपनी-अपनी नींद पूरी की और बच्चों की नींद हमेशा के लिए खुल गई। सरकार ने इसे हादसा कहा, जबकि यह सिस्टम का नियमित अभ्यास था।

 

छिंदवाड़ा की राख ठंडी भी नहीं हुई थी कि इंदौर में घंटा बज गया। इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर। जहां झाड़ू सिर्फ सड़क पर नहीं, छवि पर भी फिरती है। जहां पानी पर भरोसा किया जाता है, क्योंकि ब्रांड बना दिया गया है। उसी इंदौर में नल से ज़हर निकला। उल्टी-दस्त ने लोगों को जकड़ लिया। अस्पतालों में भीड़, घरों में डर और श्मशानों में सन्नाटा। कई ज़िंदगियाँ चली गईं, सैकड़ों बीमार पड़े। सवाल सीधा था पानी गंदा कैसे हुआ? जवाब गोल जांच चल रही है।

 

नगर निगम जागा, टैंकर दौड़े, नोटिस चिपके “पानी उबालकर पिएं।” जनता ने सोचा काश बच्चों के सिरप पर भी यह नोटिस लगा होता। हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, आदेश दिए। प्रशासन ने फाइलें खोलीं। मगर जिन घरों से अर्थी उठ चुकी थी, उनके लिए आदेश देर से आए। इंदौर ने साबित किया कि स्वच्छता के तमगे नलों को शुद्ध नहीं करते, और रैंकिंग से मौत नहीं रुकती।

दोनों घटनाओं में फर्क बस इतना है कि छिंदवाड़ा में मौत शीशी में आई और इंदौर में पाइप से। जिम्मेदार दोनों जगह वही लापरवाह व्यवस्था। सरकार हर बार कहती है कि यह अलग-अलग घटनाएं हैं। मगर जनता देख रही है कि यह एक ही कहानी के अलग अध्याय हैं। अध्याय का नाम है “हम देख रहे हैं।”

 

सरकार के दो साल में यह पहला मामला नहीं। कहीं पुल गिरा, कहीं नाव पलटी, कहीं सड़क ने जान ली, कहीं अस्पताल ने। मगर छिंदवाड़ा और इंदौर इसलिए डराते हैं क्योंकि यहां मौत रोज़मर्रा की चीज़ बनकर आई दवा और पानी। जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है, वही सबसे बड़ा धोखा दे गए।

 

सरकारी भाषा में मौत कभी आंकड़ा होती है, कभी “दुर्भाग्यपूर्ण घटना”। प्रेस नोट में संवेदना होती है, मुआवज़े की घोषणा होती है। मगर कोई यह नहीं बताता कि मुआवज़ा भरोसे की भरपाई कैसे करेगा? बच्चे की हँसी की कीमत कितनी है? उस बुज़ुर्ग की सांसों का दाम क्या है, जिसने नल खोलकर पानी पिया और अस्पताल में दम तोड़ा?

 

दो साल की सरकार ने बहुत कुछ बदला पोस्टर, नारे, चेहरे। मगर नहीं बदली तो जवाबदेही। हर हादसे के बाद वही रटा-रटाया संवाद जांच होगी, कार्रवाई होगी। कार्रवाई तब होती है जब खबर ठंडी पड़ जाती है। दोषी छोटे पकड़े जाते हैं, बड़े सिस्टम में सुरक्षित रहते हैं। और जनता को समझा दिया जाता है कि अगली बार सावधान रहें।

 

छिंदवाड़ा में माता-पिता को समझाया गया कि गलत दवा थी। इंदौर में नागरिकों को समझाया गया कि पानी उबालना चाहिए था। यानी गलती हर बार जनता की। सरकार तो बस शोक व्यक्त करती है। शोक अब प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुका है जैसे टेंडर, जैसे फाइल मूवमेंट।

 

दो साल पूरे होने पर उपलब्धियों का हिसाब दिया जाता है। काश कोई यह भी बताए कि इन दो सालों में कितनी चिताएँ जलीं, कितने पालने खाली हुए, कितने घरों में डर बस गया। यह आंकड़ा किसी वेबसाइट पर नहीं मिलेगा, क्योंकि यह जनता के दिलों में दर्ज है।

 

बात यह नहीं कि सरकार गलती करती है। यह है कि हर गलती के बाद भी वही ढांचा चलता रहता है। छिंदवाड़ा के बच्चे और इंदौर के नागरिक एक-दूसरे से कुछ नहीं कहते, बस चुपचाप एक सवाल छोड़ जाते हैं अगली बार कौन? अगली बार दवा? पानी? या कोई और बुनियादी चीज़?

 

मोहन यादव सरकार के दो सालों का यह सच पोस्टरों पर नहीं दिखेगा। यह सच अस्पताल की कतारों, श्मशानों की राख और खाली घरों में मिलेगा। जब सरकार उपलब्धियों का ढोल पीटती है, तब कहीं कोई माँ अपने बच्चे की फोटो देख रही होती है, और कोई परिवार नल की तरफ डर से देखता है। और यही इस की सबसे कड़वी सच्चाई है यह प्रदेश अब यह नहीं पूछता कि सरकार क्या कर रही है, बल्कि यह पूछता है कि अगली मौत कहाँ से

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