मां ने ही ‘नीले ड्रम’ में डुबोकर बेटी को मारा

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क्राइम फाइल्स के पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि कैसे भोपाल के डेहरिया गांव में एक महीने की किंजल की रहस्यमयी गुमशुदगी ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी। मां सरिता ने दावा किया कि बच्ची को ‘प्रेत’ उठा ले गया, जिसके बाद घर में तांत्रिक का ड्रामा चला। लेकिन पांच घंटे बाद, मासूम का शव घर के ही पानी के ड्रम में मिला। पोस्टमॉर्टम ने पुष्टि की कि यह हत्या थी।

अब सवाल यह था कि बंद घर में, अपनों के बीच, मासूम का कातिल कौन था? पुलिस की जांच एक ऐसे सच की ओर बढ़ रही थी, जो ‘प्रेत’ की कहानी से कहीं ज्यादा खौफनाक था। पढ़िए क्राइम फाइल्स पार्ट-2…

जांच का चक्रव्यूह और शक की सुई एक महीने की किंजल की मौत कोई हादसा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी हत्या थी। यह सच सामने आते ही खजूरी सड़क पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर एल.डी. मिश्रा और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, कातिल को ढूंढना। घर के दरवाजे बंद थे, किसी बाहरी व्यक्ति के आने-जाने का कोई सबूत नहीं था। साफ था, कातिल घर के अंदर ही मौजूद था। पुलिस की जांच का केंद्र बने वो तीन लोग जो घटना के वक्त घर पर थे

सरिता (बच्ची की मां): जिसने सबसे पहले बच्ची के गायब होने का शोर मचाया।

सुगन बाई (बच्ची की दादी/चाची सास): जो घर के आंगन में ही मौजूद थीं।

6 साल की भतीजी: जो वहीं खेल रही थी।

पुलिस ने तीनों से अलग-अलग और फिर एक साथ बिठाकर पूछताछ की। हर किसी का बयान एक ही कहानी कह रहा था – उन्होंने किसी को घर में आते या जाते नहीं देखा। सरिता ने दोहराया कि वह बच्ची को भतीजी के पास छोड़कर कपड़े धोने गई थी। सुगन बाई ने कहा कि वह बाहर बच्चों के साथ थी। 6 साल की बच्ची अपनी खेल की दुनिया में मग्न थी।

इन बयानों ने एक तरह का ‘लॉक्ड-रूम मिस्ट्री’ का ताना-बाना बुन दिया था। अगर कोई बाहर से नहीं आया, तो बच्ची ड्रम तक कैसे पहुंची? पुलिस का शक गहराता जा रहा था और शक की सुई बार-बार एक ही शख्स पर आकर टिक रही थी – मां सरिता।

वही थी जो बच्ची के सबसे करीब थी। उसी ने आखिरी बार किंजल को जिंदा देखा था और उसी ने ‘प्रेत’ की अविश्वसनीय कहानी गढ़कर मामले को भटकाने की कोशिश की थी। परिवार के लोग भी अब कानाफूसी करने लगे थे। पति सचिन और परिवार के अन्य सदस्यों की आंखों में भी अपनी बहू के लिए शक साफ नजर आ रहा था।

परत दर परत खुलासा, मां क्यों बनी बेटी की दुश्मन? पुलिस ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाया और परिवार की पृष्ठभूमि खंगालनी शुरू की। यहीं से इस हत्याकांड के पीछे छिपे खौफनाक मकसद की परतें उधड़ने लगीं।

साल 2019 में सचिन और सरिता की शादी हुई शादी के बाद सब कुछ सामान्य था। 15 अगस्त 2020, जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब मेवाड़ा परिवार में एक नन्ही परी की किलकारी गूंजी। सरिता ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम किंजल रखा गया। परिवार में लक्ष्मी के आने का जश्न मनाया गया, लेकिन इस खुशी के दिखावे के पीछे एक कड़वा सच छिपा था, जिसे सिर्फ घर के लोग ही जानते थे।

बेटी के जन्म से खुश नहीं थी सरिता पुलिस की पूछताछ में परिवार के सदस्यों ने जो खुलासे किए, वे चौंकाने वाले थे। सरिता की जेठानी, इमरत बाई ने पुलिस को बताया कि सरिता बेटी होने से बिल्कुल खुश नहीं थी। वह हमेशा एक बेटे की चाहत रखती थी। जब किंजल पैदा हुई, तो वह जैसे टूट ही गई। वह बच्ची को अपना दूध तक नहीं पिलाती थी। हम सब जबरदस्ती करते, तो बेमन से, मुंह बनाकर पिलाती थी।

वह न उसे नहलाती, न उसके पास सोती थी। बच्ची की सारी देखभाल मैं ही करती थी। पड़ोस में रहने वाली संगीता मेवाड़ा ने भी यही गवाही दी कहा- सरिता को अपनी बेटी से जरा भी लगाव नहीं था। वह उसे देखकर खुश होने की बजाय कोसती रहती थी। ऐसा लगता था जैसे वह बच्ची को अपनी जिंदगी का बोझ समझती है। परिवार के लगभग हर सदस्य ने एक ही बात दोहराई।

यह साफ हो चुका था कि सरिता अपनी बेटी को प्यार नहीं करती थी, क्योंकि वह एक बेटा चाहती थी। ‘प्रेत’ की कहानी अब पुलिस को एक सोचा-समझा नाटक लग रही थी, जो असलियत पर पर्दा डालने के लिए रचा गया था।

चाची बोली- बेटी की मौत पर सरिता नहीं रोई इस केस की सबसे अहम गवाह बनीं सरिता की चाची सास, सुगन बाई। उन्होंने पुलिस को बताया, ‘उस दिन सुबह मैंने ही पानी का ड्रम भरा था। जब यह घटना हुई, तब मैं बाहर थी और घर में सिर्फ सरिता और बच्ची ही थे। उसी ने बच्ची को पानी में डुबोया, ड्रम का ढक्कन बंद किया और फिर बाहर आकर गुमशुदगी का नाटक करने लगी।’

सुगन बाई ने एक और दिल दहला देने वाली बात बताई, ‘जब बच्ची का शव ड्रम से निकाला गया, तो पूरा घर रो-रोकर बेहाल था, लेकिन सरिता की आंखों में एक आंसू तक नहीं था। वह बस चुपचाप, शांत खड़ी सब देख रही थी, जैसे उसे कोई फर्क ही न पड़ा हो।’

किसी ने हत्या होते हुए देखी नहीं थी कहानी में एक मोड़ अभी बाकी था। सरिता को बच्ची को पानी में डुबोते हुए किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा था। कोर्ट में केस को साबित करने के लिए पुलिस को एक कबूलनामे की जरूरत थी। जेल में सरिता लगातार खुद को बेकसूर बताती रही।

उसने आरोप लगाया कि परिवार के किसी और सदस्य ने बच्ची को मारा है और सब मिलकर उसे फंसा रहे हैं, लेकिन यह नाटक ज्यादा दिन नहीं चल सका। एक दिन जब उसका पति सचिन उससे मिलने आया, तो वह उसके सामने टूट गई। सचिन के बार-बार पूछने पर वह फफक-फफक कर रो पड़ी और उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया।

उसने रोते हुए कहा, ‘हां, मैंने ही किंजल को पानी की टंकी में डालकर ढक्कन बंद कर दिया था। मुझे लड़का चाहिए था, पर लड़की हो गई। मैं जब भी उसका चेहरा देखती थी, तो खुद को कोसने लगती थी। उस दिन घर में कोई नहीं था, मैंने मौका देखकर उसे पानी में डुबो दिया और डर के मारे किसी को कुछ नहीं बताया।’

अदालत का फैसला- सरिता को उम्रकैद की सजा भोपाल जिला न्यायालय में यह मामला 5 साल तक चला। सरिता के वकील ने दलील दी कि वह सिर्फ 25 साल की एक नवविवाहिता है, उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, और इस सजा से उसका पूरा वैवाहिक जीवन तबाह हो जाएगा। उन्होंने न्यूनतम सजा की मांग की। वहीं सरकारी वकील ने इसे एक जघन्य अपराध बताया।

सरकारी वकील ने दलील दी कि यह मामला समाज को झकझोरने वाला है और सिर्फ कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होना, इस क्रूरता के लिए उदारता का आधार नहीं हो सकता। 27 फरवरी, 2025 को, 23वें अपर सत्र न्यायाधीश अतुल सक्सेना ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

उन्होंने 104 पन्नों के फैसले में सरिता मेवाड़ा को अपनी एक महीने की बेटी की हत्या का दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई और 1000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। न्यायाधीश अतुल सक्सेना ने अपने फैसले में सिर्फ सजा ही नहीं सुनाई, बल्कि समाज की उस मानसिकता पर भी गहरी चोट की, जो आज भी बेटे और बेटी में भेद करती है।

कोर्ट ने रवींद्रनाथ टैगोर की पंक्तियों का भी जिक्र किया और लिखा- जो यह कहते हैं कि ‘जब एक बेटी का जन्म होता है, तो यह इस बात का निश्चायक सबूत है कि ईश्वर मानव जाति से अप्रसन्न नहीं है,’ क्योंकि ईश्वर पुत्रियों के माध्यम से स्वयं को साकार रूप देता है।

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