संविधान दिवस के एक दिन पहले अयोध्या धाम स्थित राम मंदिर पर धर्म ध्वजारोहण सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ ही नया राजनीतिक कर्तव्य पथ निर्मित होने जा रहा है.

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संविधान दिवस के एक दिन पहले अयोध्या धाम स्थित राम मंदिर पर धर्म ध्वजारोहण सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ ही नया राजनीतिक कर्तव्य पथ निर्मित होने जा रहा है.
धर्म ध्वजा भारत का राजनीतिक आर्बिट बदल रहा है. राम भक्तों के दबाव और प्रभाव के बिना गवर्नेंस की कल्पना अब अधूरी है. यह ध्वजा हिंदुत्व के राजनीतिक पथ को मजबूत करेगी. जो इसके विरोधी हैं, वो भी इस मार्ग को अपनाने के लिए मजबूर होंगे.
सनातन, आस्था का ही धर्म है. इसमें जन्मा हर हिंदू आस्थावान है. इस सिद्धांत पर हिंदू राजनेता सेकुलर होने का अभिनय कितना भी करें लेकिन आस्था उसकी मजबूरी है.
ममता बनर्जी पुरी का जगन्नाथ मंदिर, तो अखिलेश यादव केदारेश्वर महादेव बनवा रहे हैं. यह राजनीति में राम भक्तों का ही दबाव है कि, राम मंदिर को लेकर अपनाई गई नकारात्मक भूमिका से बचने के लिए इन मंदिरों के प्रोजेक्ट हाथ में लिए गए हैं .
कांग्रेस का तो जैसे राम मंदिर के साथ उत्थान और पतन का रिश्ता जुड़ा है. कांग्रेस ताला खुलवाने का दावा करती है लेकिन राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और ध्वजारोहण से स्वयं को अलग रखती है. देश की राजनीति बिना राम मंदिर का चक्कर लगाए अब शायद ही सत्ता की सीढ़ी चढ़ने में सफलता मिल सके.
राम और राष्ट्र एक ही हैं. राम के बिना राष्ट्र की कल्पना बेमानी है. आजादी के बाद सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा भटक गई थी. अयोध्या में दिव्य और भव्य राम मंदिर पर पूर्णता का उद्घोष करता हुआ केसरिया धर्म ध्वजारोहण अगर आजादी के बाद होता तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता विश्व में आज अलग स्तर पर होती. जो दृश्य देश ने आजादी के सत्तर साल बाद देखा है, वह देश की दिशा को बदलने वाला है.
यह बात कल्पना से बाहर थी कि भारत का पीएम राम मंदिर पर किसी कार्यक्रम के दौरान हाथ जोड़, आराधना में लीन खड़ा दिखेगा. पीएम नरेंद्र मोदी के उद्बोधन में भारतीय संस्कृति का जो आत्मविश्वास और गौरव दिखा वह राम भक्तों के लिए अद्वितीय आनंददायी रहा.
आरएसएस और बीजेपी के बीच टकराव की बातें कई बार आती है. सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत और पीएम मोदी का राम मंदिर पर तालमेल सुखद दिखा. शिलान्यास, प्राण प्रतिष्ठा और ध्वजारोहण तीनों अवसरों पर दोनों साथ-साथ दिखे. उनकी सिनर्जी और केमिस्ट्री ऐसी दिखाई दी, जैसे दोनों एक पवित्र उद्देश्य के लिए प्रतीक के रूप में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हो.
सरकार और संघ साथ-साथ काम करें, यह बात कांग्रेस और राहुल की पसंद से परे है. वो तो संघ की गतिविधियों को राष्ट्र के हित में नहीं मानते. संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है. इस वर्ष में राम मंदिर पर केसरिया धर्म ध्वजारोहण देश के गवर्नेंस में ऑर्बिट चेंज का अवसर दिखाई पड़ता है.
अभी तक सरकारें जब बदलती थीं, तब नेताओं के चेहरों के साथ नीतियों, प्रक्रियाओं और काम के तरीकों में बदलाव होता था. अब कार्य संस्कृति ही नहीं बल्कि गवर्नेंस का आर्बिट ही बदलता दिख रहा है.
प्राण प्रतिष्ठा के बाद राम मंदिर की उपलब्धि का राजनीतिक लाभ बीजेपी को नहीं मिला. अयोध्या की फैजाबाद लोकसभा सीट बीजेपी हार गई. पूरा अवध भाजपा के हाथ से निकल गया. बिहार में मगध ने फिर बीजेपी का आत्मविश्वास बढ़ाया है. प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, वह इतिहास में दफन हो जाता है. बिहार चुनाव परिणाम से मिला आत्मविश्वास मोदी के एक-एक शब्द में सुनाई पड़ रहा था.
गुलामी की मानसिकता और मैकाले की शिक्षा व्यवस्था पर भी मोदी ने प्रहार किया. देश के राजनीतिक हालातों में इन व्यवस्थाओं का ही प्रभाव दिखाई पड़ता है. आजादी के बाद गुलामी की मानसिकता नहीं बदली.
अब हालात बदल रहे हैं. ब्रिटिश काल के कानून बदले गए हैं. राजपथ, कर्तव्य पथ बना. गुलामी की मानसिकता अगर किसी को अपनी विरासत लगती है तो फिर ऐसी राजनीति देश में चलना अब कठिन है. ब्रिटिश शासन काल के प्रतीक हों या मुगल काल के, उन पर गर्व करना, राजनीति के प्रतीक के रूप में वोट बैंक बनाना, यह अब तक चलता रहा लेकिन अब यह धर्मध्वजा इसको बदलने का काम करेगी.
पीएम मोदी ने देश के लोगों से अपील की, कि राम मंदिर के दर्शन करने जाने वाले श्रद्धालुओं को परिसर में बने सप्त मंदिर का दर्शन जरूर करना चाहिए. इसमें शबरी, वाल्मीकि और निषादराज के भी मंदिर हैं, जो सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है.
राम भक्तों के प्रभाव को कम करने के लिए जातीय राजनीति को हथियार बनाया गया. आरक्षण पर भ्रम फैलाने का काम भी राम भक्तों में विभाजन के लिए ही किया जाता है, लेकिन बिहार की राजनीति ने राम भक्तों के प्रभाव का स्वरूप प्रस्तुत किया है.
गुलामी की मानसिकता ने भारत को उसकी नियति से दूर रखा है. यह नियति अब धर्म ध्वजा के रूप में फिर से जाग्रत हुई है. इस जागरण में लाखों रामभक्तों ने अपना बलिदान दिया है. इस पुण्य अवसर पर ऐसे नायकों का स्मरण करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि, स्वर्ग में उनकी आत्माएं प्रसन्न होंगी क्योंकि, राम मंदिर का सपना आज साकार हुआ है.
राम मर्यादा के साथ बिना भेदभाव, समान व्यवहार और विकास के प्रतीक हैं. यह आदर्श, नेताओं की मानसिकता का एक छोटा सा हिस्सा भी बन सके तो गवर्नेंस का रूप बदल जाएगा. राजनीति में स्वच्छता और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टीकरण नहीं होगा. सभी वर्गों और समुदायों के साथ न्याय होगा.
पद और तारीख आती जाती हैं. नियति हर हाथ से अपना लक्ष्य पूरा करा ही लेती है. धर्म ध्वजा के समक्ष नतमस्तक पीएम मोदी देश में गवर्नेंस की नियति का प्रतीक हैं. यही वर्तमान और यही भविष्य का आह्वान है.

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