“लौह पुरुष के संकल्प की लौ से प्रज्वलित हुआ अखंड भारत का स्वाभिमान”
– नीलेश वर्मा
भारत की एकता और अखंडता का दीप आज गर्व से प्रज्वलित है, जिसकी ज्योति लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के अटूट संकल्प और अदम्य साहस से प्रकट हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत सैकड़ों रियासतों में विभक्त था, किन्तु सरदार पटेल की दूरदृष्टि, दृढ़ इच्छाशक्ति और राजनीतिक कौशल ने इन रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत को विखंडन से बचाया। यह केवल राजनीतिक एकीकरण नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का भी प्रतीक था, जिसने “अखंड भारत” के स्वाभिमान को नई ऊर्जा प्रदान की। प्रतिवर्ष 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की घोषणा वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा की गई थी। राष्ट्रीय एकता दिवस का उद्देश्य देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के प्रति जनजागरण फैलाना तथा स्वतंत्र भारत के निर्माण में सरदार पटेल के अमूल्य योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करना है। उनके अद्वितीय प्रयासों से भारत आज एक सशक्त, संगठित और एकतामय राष्ट्र के रूप में विश्व मंच पर गौरव से खड़ा है।
एक राष्ट्र होते हुए भी जब भारत लगभग 562 रियासतों में बंटा हुआ था, जिनमें से अनेक ब्रिटिश शासन के अधीन न होकर अर्ध-स्वायत्त थीं, तब देश को अखंड रूप देने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने निभाई। सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारत के प्रथम गृह मंत्री के रूप में अपने कुशल नेतृत्व, कूटनीति और अडिग इच्छाशक्ति से जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल, कच्छ, जोधपुर, त्रावणकोर, और मणिपुर जैसी प्रमुख रियासतों को भारत में मिलाने का कार्य किया। उनके अथक प्रयासों से अधिकांश रियासतों ने 1947 से 1949 के बीच स्वेच्छा से “भारत संघ” में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। जोधपुर व भोपाल को उन्होंने राजनीतिक संवाद से और जूनागढ़ व हैदराबाद को उन्होंने दृढ़ प्रशासनिक व सैन्य नीति के माध्यम से भारत में जोड़ा। विशेष रूप से 1948 में “ऑपरेशन पोलो” के माध्यम से हैदराबाद राज्य का भारत में विलय, उनकी दृढ़ता और दूरदर्शिता का प्रमाण है। वास्तव में, यह कार्य किसी चमत्कार से कम नहीं था, क्योंकि जिस समय अन्य देश विभाजन की पीड़ा से गुजर रहे थे, उस समय पटेल ने भारत को टूटने से बचाया और एक राष्ट्र के रूप में खड़ा किया।
सरदार वल्लभभाई पटेल कुर्मी समाज के गौरव हैं, गुजरात के एक साधारण कृषक परिवार में उनका जन्मे हुआ। अपने परिश्रम, ईमानदारी और दृढ़ संकल्प से उन्होंएने दिखाया कि किसान का बेटा भी राष्ट्र निर्माता बन सकता है। 1918 के खेड़ा सत्याग्रह और 1928 के बारडोली आंदोलन में उन्होंने किसानों को संगठित कर अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ विजय पाई, जिससे उन्हें “सरदार” की उपाधि मिली। कुर्मी समाज उन्हें अपना आदर्श इसलिए मानता है क्योंकि उन्होंने किसान और श्रमिक वर्ग के सम्मान को राष्ट्रीय पहचान दी। उनका जीवन संदेश देता है कि एकता, संगठन और कर्मठता से कोई भी समाज उन्नति कर सकता है। यही कारण है कि सरदार पटेल आज भी कुर्मी समाज के स्वाभिमान और राष्ट्रनिष्ठा के प्रतीक बने हुए हैं।
हम सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय एकता दिवस मना रहे हैं, यह केवल इतिहास की स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण है। भारत के वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में उनके विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। विश्व राजनीति में भारत का उदय, रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के साथ ही राष्ट्रीय एकता की सुदृढ़ भावना के साथ आगे बढ़ रहा है, यह सब लौह पुरुष के संकल्प का ही परिणाम है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा गुजरात के केवड़िया में “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” की स्थापना उसी अमर भावना का प्रतीक है, जो बताती है कि भारत की आत्मा तभी प्रफुल्लित होती है, जब उसकी एकता अटूट हो। आज भारत “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के मंत्र के साथ आगे बढ़ रहा है, जहाँ उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक विकास, संस्कृति और राष्ट्रीय गौरव की एक ही धारा बह रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा बीते वर्षों में लिए गए अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निर्णयों ने देश की एकता और अखंडता को नई दिशा दी है। इनमें अनुच्छेद 370 का हटाया जाना, जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन तथा पूर्वोत्तर राज्यों के तीव्र विकास जैसे कदम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये निर्णय न केवल भारत को भौगोलिक रूप से, बल्कि विचारों और भावनाओं के स्तर पर भी एक सूत्र में बांधते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल के उस अधूरे स्वप्न को साकार कर रहे हैं, जिसमें एक एकजुट और सशक्त भारत की परिकल्पना थी। आज आवश्यकता है कि विशेषकर देश के युवा उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें। भारत में जब भी विभाजन या वैमनस्य की आवाज उठे, तब हमें लौह पुरुष की दृढ़ता याद रखनी चाहिए, जिन्होंंने असंभव को संभव किया। वास्तव में देखें तो लौह पुरुष के संकल्प की लौ आज भी हमारे सैनिकों की शौर्यगाथाओं में, किसानों के परिश्रम में और युवाओं के नवाचार में प्रज्वलित है और यही लौ, यही चेतना, यही स्वाभिमान मेरे अखंड भारत की अमर आत्मा है।
– लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।
