काम करते हुए क्या किसी और अखबार या चैनल में आप लिख सकते हैं या नहीं ?

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‘ दूसरे अखबार में लिखने से पहले
संपादक
से लिखित में स्वीकृति ले लें○○○○○○○○‍○○’

एक अखबार या टीवी चैनल में
काम करते हुए क्या किसी और अखबार या चैनल
में आप लिख सकते हैं या नहीं ? यह हमेशा से दुविधा का विषय रहा है और कई पत्रकारों ने अपने हाथ का काम खोया है. आज इसी विषय पर चर्चा करते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और गांधीवादी कार्यकर्ता राजेश बादल कल
( 11 अक्टूबर ) को अजमेर में ‘ गांधी की पत्रकारिता और आज का दौर’ विषय पर व्याख्यान देने आए तो हम पुरुषोत्तम पंचौली और हरिवल्लभ मेघवाल के साथ अजमेर जा पहुंचे.
व्याख्यान का आयोजन गांधी महोत्सव समिति ने अजयमेरू प्रेस क्लब में किया था. अजयमेरू प्रेस क्लब का विशाल भवन और बड़ा सभागार देखकर ही मन बाग बाग हो गया. अभी भी उसका निर्माण चल रहा है.

हम डेढ़ बजे कार से कोटा से रवाना हुए थे और सायं सात बजे ही व्याख्यान स्थल पर पहुंच पाए थे. देवली से अजमेर की टू- लेन सड़क कई जगह उखड़ी हुई, उसमें बड़े बड़े गड्ढे हो रहे हैं और उसे दुरुस्त करने की ओर सरकार का ध्यान नहीं है.
ताज्जुब की बात यह है कि सड़क भले ही बदहाल हो लेकिन दो जगह टोल वसूली हो रही थी. खैर, जब हम पहुंचे बादल साहब का व्याख्यान हो चुका था. उनकी ट्रेन का टाइम हो चुका था और वे निकल ही रहे थे. हम करीब पन्द्रह मिनिट उनके साथ रहे.

इस दौरान बादल साहब ने एक रोचक किस्सा सुनाया.
उस समय वे नई दुनिया में काम करते थे और राजेन्द्र माथुर साहब ‘नई दुनिया’ के संपादक थे. बादल साहब ने राजेन्द्र माथुर साहब से लिखित स्वीकृति लीं और कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक ‘ रविवार ‘ में भी लिखने लगे.
उस समय अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे. बादल साहब ने अर्जुन सिंह के भ्रष्ट कारनामों को लेकर 14 पेज की रपट लिखीं, जिसे रविवार ने अर्जुन सिंह का चित्र लगाकर आमुख कथा के रूप में प्रकाशित किया. मीडिया मैनेजमेंट में माहिर माने जाने वाले अर्जुन सिंह ने अपनी सारी ताकत इस काम में लगाई कि किसी तरह राजेश बादल को ‘नई दुनिया’ से नौकरी से निकलवा दें. राजेन्द्र माथुर साहब उनकी ढाल बने रहे. माथुर साहब कहते थे कि तुम्हें निकालने से पहले उन्हें मुझे निकालना पड़ेगा. बादल कहते हैं कि राजेन्द्र माथुर साहब देवदूत संपादक थे.जिसके चलते उनका कुछ नहीं बिगड़ा.

दूसरी घटना राजस्थान पत्रिका से जुड़ी है. सन् 1980 में कोटा में संवाददाता बनने के बाद जो मेरे साथ सबसे पहले जुड़े वे बृजमोहन आत्मदीप थे. जिन्हें आजकल आत्मदीप के नाम से जाना जाता है.

सन् 1983 में नई दिल्ली से प्रभाष जोशी की अगुवाई में ‘जनसत्ता’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ तो उसमें राजस्थान के कई पत्रकारों को चिट्ठियां लिखकर आलेख मांगे गए. उसमें एक चिट्ठी मुझे भी मिलीं. उस चिट्ठी को आत्मदीप ने भी पढ़ा. मैंने तो लेख लिखा नहीं लेकिन आत्मदीप ने एक लेख लिखकर जनसत्ता को भिजवा दिया. साथ में यह भी लिखा कि मेरा नाम न छापें. लेकिन ‘जनसत्ता’ मे डेस्क पर काम करने वालों ने आत्मदीप का पत्र तो रद्दी की टोकरी में फेंक दिया और लेख आत्मदीप की बाइलाइन के साथ छाप दिया.

तब हिन्दी पत्रकारिता के आकाश में ‘जनसत्ता’ का आगमन एक धूमकेतु की तरह हुआ था. उसका प्रसार इतनी तेजी के साथ हुआ कि प्रभाष जोशी ने पाठकों से क्षमा मांगी कि हमारी मशीन की क्षमता सीमित है, हम और अखबार नहीं छाप सकते, इसलिए क्षमा कीजिए.

जाहिर है कि जन सत्ता से सभी अखबारों के मालिक भय प्रकम्पित थे. तिस पर कर्पूरचन्द्र कुलिश जी ने देखा कि राजस्थान पत्रिका के कई संवाददाता ‘जनसत्ता’ में लिखकर रहे हैं तो उन्होंने सभी को पत्रिका की नौकरी से निकालने का कठोर फैसला ले लिया. तब आत्मदीप को राजस्थान पत्रिका के कोटा कार्यालय में जुड़े दो ही माह हुए थे. पत्र में लिखा था- आपका आलेख जनसत्ता में छपा देखा. एतदर्थ आपकी सेवाएं समाप्त की जाती है. आपकी दो माह की पगार का सात सौ रुपए का चेक संलग्न है.

नवोदित पत्रकारों के लिए
इन दोनों घटनाओं का सबक यहीं है कि
दूसरे अखबार या टीवी चैनल में लिखने की हुड़क है
तो राजेश बादल की तरह अपने संपादक से लिखित में आज्ञा लेकर ही लिखें. कभी कभार अतिउत्साह नौकरी के लिए भी
घातक हो साबित होता है.

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