परम पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – सेवा-संस्कार और पारमार्थिकता भारतीय संस्कृति की अत्यन्त सुदीर्घ और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।

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??सादर हरि ऊँ? परम पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – सेवा-संस्कार और पारमार्थिकता भारतीय संस्कृति की अत्यन्त सुदीर्घ और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। अग्नि-अम्बर, जल-नक्षत्र और निहारिकाओं के रूप में परमात्मा स्वयं भी पारमार्थिक कार्यों में संलग्न है। एतदर्थ, अपनी आत्मीयता का विस्तार कीजिए और सेवाव्रती बनें ..! भगवद प्राप्ति के लिए अत्यन्त सहज-श्रेष्ठ, लोक प्रतिष्ठित और महापुरुषों द्वारा आचरित मार्ग है – सेवा ! सेवा साधन नही, अपितु समस्त साधनों की फलश्रुति है। अभिमान रहित – निष्काम सेवा भाव से परमात्मा सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं, साथ ही सेवा से साधक के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक रूपान्तरण और अहंकार का निर्मूलन होता है। निःस्वार्थ सेवा द्वारा साधक देव-अनुग्रह को अनुभव करने लगता है। अतः परमात्म-प्रसन्नता अर्जन के लिए निराभिमानी एवं सेवाव्रती बनें ! प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। ?श्री गुरूचरणकमलेभ्यों नमः?

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