अस्पताल ने मामूली इलाज में उलझाए रखा; काटना पड़ा पैर
मैंने 14 साल लंबी लड़ाई लड़ी है। अब जाकर मुझे इंसाफ मिला है। गलत इलाज की वजह से मुझे अपना पैर गंवाना पड़ा, उसकी भरपाई कौन करेगा?

ये सवाल है विदिशा जिले के कुरवाई निवासी सुरजीत सिंह जाट का। 14 साल पहले एक सड़क हादसे में घायल सुरजीत को भोपाल के नर्मदा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि अस्पताल ने इलाज में लापरवाही बरती और इसी वजह से सुरजीत को अपना एक पैर गंवाना पड़ा। सुरजीत और उसकी फैमिली ने मुआवजे की मांग करते हुए डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर फोरम में याचिका लगाई।
फोरम ने सुरजीत के पक्ष में फैसला दिया और अस्पताल को मुआवजा देने के आदेश दिए। इस फैसले के खिलाफ अस्पताल स्टेट कंज्यूमर फोरम चला गया। अब 8 सितंबर को सुरजीत के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्टेट कंज्यूमर फोरम ने नर्मदा अस्पताल को 10 लाख रुपए का मुआवजा 2012 से अब तक 6 प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने के निर्देश दिए हैं।
सुरजीत और उनकी फैमिली ने किस तरह से ये लड़ाई लड़ी और अस्पताल की लापरवाही से अपाहिज हुए सुरजीत की जिंदगी कैसे बदल गई, इस बारे में भास्कर ने कुरवाई जाकर सुरजीत और परिवार से बात की।

सपनों से भरी जिंदगी और एक मनहूस रात साल 2011 की शुरुआत सुरजीत के लिए खुशियों की सौगात लेकर आई थी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद चंडीगढ़ और दिल्ली में कुछ समय नौकरी कर, वे अपने घर कुरवाई लौट आए थे। नई-नई शादी हुई थी और जनवरी में घर में बेटे की किलकारियां गूंजी थीं। परिवार पूरा था, सपने बड़े थे और भविष्य सुनहरा दिख रहा था।
सुरजीत बताते हैं, ‘मैं घर के पास रहकर नौकरी करना चाहता था, ताकि परिवार के साथ रह सकूं और अपनी खेती-बाड़ी पर भी ध्यान दे सकूं।’ सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन जल्द ही खुशियों पर ग्रहण लगने में देर नहीं लगी। 19 फरवरी 2011 की रात थी। सुरजीत अपनी बाइक से सांची से विदिशा की ओर आ रहे थे। उसी वक्त बाइक अंधेरे में खड़ी एक वैन से जा टकराई।

डॉक्टर बोले- पांव में बस मामूली फ्रैक्चर है, बाद में देखेंगे कुरवाई में कीटनाशक दवाओं की दुकान चलाने वाले सुरजीत के बड़े भाई ओंकार सिंह बताते हैं- रात के करीब 10 बज रहे थे। मुझे अचानक ख्याल आया कि सुरजीत अब तक घर नहीं लौटा। मैंने उसे फोन किया, तो फोन उसके दोस्त ने उठाया, जो बाइक पर पीछे बैठा था। उसने कांपती हुई आवाज में कहा- भैया, हमारा एक्सीडेंट हो गया है। मैं सब कुछ छोड़कर भागा।
मैं घटनास्थल पर पहुंचा तो पता चला कि सुरजीत को विदिशा के स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका था। उसकी हालत बेहद गंभीर थी। मैंने बिना देर किए सुरजीत को भोपाल ले जाने का फैसला किया। रात 2 बजे तक हम लोग नर्मदा अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने बताया कि हादसे में सुरजीत के पेट में अंदरूनी घाव हो गए हैं, जिससे खून बह रहा है और तुरंत ऑपरेशन करना होगा।

डॉक्टर बोले- पैर चाहिए या जिंदगी? ऑपरेशन के तीन दिन बाद डॉक्टरों ने सुरजीत के पैर में रॉड डाली। परिवार को लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा, लेकिन दो दिन बाद ही उन्होंने देखा कि सुरजीत के पैर का अंगूठा नीला पड़ रहा है। जब डॉक्टरों को यह बताया गया, तो उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अगले दिन पूरा पंजा काला पड़ने लगा। बाहर से कुछ डॉक्टरों को बुलाया गया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
चार दिन के अंदर जब पूरा पैर काला पड़ गया, तब डॉक्टरों ने कहा, ‘पैर में ब्लड फ्लो पूरी तरह रुक गया है। अब यह हिस्सा गैंगरीन का शिकार हो चुका है। इसे घुटने के नीचे से काटना पड़ेगा।’
परिवार ने कहा कि वह सुरजीत को दिल्ली या कहीं और ले जाने को तैयार हैं। डॉक्टरों का जवाब था- आप चाहे दिल्ली जाएं या अमेरिका, यह पैर कोई नहीं बचा सकता। अब आप फैसला कीजिए, आपको जिंदगी चाहिए या पैर?

पैर का बाकी हिस्सा भी काला पड़ने लगा परिवार को लगा कि शायद अब सुरजीत की जान बच जाएगी, लेकिन यह तो समस्याओं की शुरुआत थी। पैर कटने के बाद भी ब्लड फ्लो बहाल नहीं हुआ। बचा हुआ पैर भी धीरे-धीरे काला पड़ने लगा। जब ओंकार ने डॉक्टरों से पूछा, ‘अब क्या करेंगे?’ तो जवाब फिर वही था, ‘देखते हैं।’ डॉक्टरों ने जांघ के पास एक कट लगाकर तार के जरिए ब्लॉकेज खोजने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे।
हद तो तब हो गई जब जांघ पर लगाए गए कट की ड्रेसिंग ठीक से नहीं की गई, जिससे घाव में संक्रमण फैल गया और वह पक गया। इस बीच, बचा हुआ पैर पूरी तरह काला हो चुका था। परिवार की हर गुहार पर डॉक्टरों का एक ही जवाब होता, ‘आपको जिंदगी चाहिए या पैर?’ आखिर में, निराश होकर परिवार ने सुरजीत की सारी रिपोर्ट्स भोपाल मेमोरियल अस्पताल के एक वरिष्ठ वेस्कुलर सर्जन को दिखाईं।
रिपोर्ट्स देखते ही सर्जन ने बताया कि पैर में रक्त प्रवाह रुकने पर एक सामान्य बायपास सर्जरी की जाती है, जिसमें दूसरे पैर की नस से एक रबर ट्यूब के जरिए प्रभावित हिस्से में रक्त पहुंचाया जाता है। परिवार ने सुरजीत को भोपाल मेमोरियल अस्पताल में भर्ती करने का फैसला किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। संक्रमण फैलने की वजह से डॉक्टरों को उनका पूरा पैर जांघ के पास से काटना पड़ा।

न्याय के लिए लड़ी लंबी और कठिन लड़ाई दो महीने के इलाज और 11 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करने के बाद सुरजीत की जान तो बच गई, लेकिन वे अपनी एक टांग हमेशा के लिए खो चुके थे। अब परिवार को यह साफ हो चुका था कि उनके बेटे की यह हालत हादसे की वजह से नहीं, बल्कि डॉक्टरों की घोर लापरवाही का नतीजा है। साल 2012 में ओंकार सिंह ने वकील राजकुमार जैन से संपर्क किया।
एडवोकेट जैन उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ‘जब ओंकार मेरे पास आए, तो उनकी गुजारिश पर मैं सुरजीत को देखने अस्पताल गया। मैंने जो देखा, वह दिल दहला देने वाला था। एक नौजवान लड़का बिस्तर पर मरणासन्न हालत में पड़ा था। उसका पैर जांघ से कटा हुआ था, घाव बहुत गहरे थे और उनमें पस पड़ चुका था। मैंने कागज देखे तो समझ आ गया कि इलाज में लापरवाही हुई है। मैंने उसी दिन ठान लिया था कि इस लड़के को न्याय दिलाकर रहूंगा।’
एडवोकेट जैन ने जिला उपभोक्ता फोरम में मुआवजे का केस दायर किया। तीन साल तक चली सुनवाई के दौरान अस्पताल प्रबंधन अपनी लापरवाही के आरोपों पर कोई ठोस सबूत या दस्तावेज पेश नहीं कर सका।

झूठे सबूत पेश कर बचने की कोशिश की जिला उपभोक्ता फोरम के फैसले के खिलाफ अस्पताल प्रबंधन ने राज्य उपभोक्ता फोरम में अपील की। राज्य फोरम में सुनवाई के दौरान अस्पताल ने एक नया तथ्य पेश किया। उन्होंने दावा किया कि सुरजीत की जांच एक वेस्कुलर एक्सपर्ट से भी कराई गई थी और इसके लिए उन्होंने सर्जन की टिप्पणी और फीस के दस्तावेज भी पेश किए।
यह एक चौंकाने वाला दावा था। एडवोकेट राजकुमार जैन और आशीष चौधरी ने सुरजीत के इलाज के सभी कागजात और बिलों को फिर से खंगाला। उन्होंने पाया कि किसी भी बिल में वेस्कुलर सर्जन की फीस का कोई जिक्र नहीं था। जब वकीलों ने फोरम में यह तर्क रखा, तो अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि उन्होंने वह फीस माफ कर दी थी।

13 साल बाद मिला न्याय, पर जख्म आज भी हरे हैं कानूनी दांव-पेंच चलते रहे। साल बीतते गए। जब 8 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी फैसला नहीं आया, तो सुरजीत ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य फोरम को जल्द सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया। आखिरकार, 8 सितंबर को 14 साल की लंबी और थका देने वाली लड़ाई के बाद राज्य उपभोक्ता फोरम ने अपना अंतिम फैसला सुनाया।
फोरम ने जिला फोरम के 2015 के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि सुरजीत के इलाज में लापरवाही हुई है। फोरम ने नर्मदा अस्पताल को आदेश दिया कि वह सुरजीत को 10 लाख रुपए का मुआवजा और 2012 से अब तक 6% की दर से ब्याज का भुगतान करे। परिवार को उम्मीद है कि उन्हें कुल 18 से 20 लाख रुपए की मुआवजा राशि मिलेगी।
कृत्रिम पैर के साथ रोजमर्रा के काम करना मुश्किल सुरजीत को मुआवजा देने के आदेश तो दे दिए हैं लेकिन सुरजीत के लिए कृत्रिम पैर के साथ रोजमर्रा के काम करना मुश्किल है। वे कहते हैं, “पिछले 14 साल में मेरी जिंदगी बिस्तर और कुर्सी के बीच सिमटकर रह गई है। इस पैर को पहनकर ज्यादा चल लूं तो जांघ में जख्म हो जाते हैं। मैं केवल वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल कर सकता हूं, वह भी बड़ी मुश्किल से।
जब मैं भोपाल पेशी पर जाता था, तो सुबह लगभग खाली पेट जाता था, ताकि रास्ते में फ्रेश होने की नौबत न आए। एक पैर से लंगड़ाते हुए मैं सालों तक कोर्ट के चक्कर काटता रहा।”

