भ्रष्टाचार की सब्जी में नमक नहीं होता, जनसंपर्क मध्यप्रदेश इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विज्ञापन?*

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*भ्रष्टाचार की सब्जी में नमक नहीं होता, जनसंपर्क मध्यप्रदेश इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विज्ञापन?*

 

*(व्यंग पूरी पुष्टि औऱ दस्तावेज पर आधारित है व्यंगकार *राजेन्द्र सिंह जादौन* है ?)*

 

मालवा के बाजार में अगर कोई कहे कि “भाई, सब्जी लो लेकिन नमक मत पूछना”, तो यकीन मानिए, वो जनसंपर्क विभाग की रसोई से आया होगा। यहाँ सब्जी यानी विज्ञापन, और नमक यानी नियम-कायदे, जो इस रसोई में बड़ी बेशर्मी से गायब हैं।

 

पुराने साहब गए, तो सबने सोचा कि अब शायद कुछ सुधरेगा। लेकिन हुआ उल्टा नया शेफ आया और बिरयानी में नमक छोड़कर बाकी सब मिर्च-मसाला डाल दिया। अब नियम, कानून, पारदर्शिता सबने फाइलों में दम तोड़ दिया।

 

नए साहब ने आते ही फॉर्मूला दिया “ऊपर से नीचे”। मतलब फाइल ऊपर जाएगी ही नहीं, क्योंकि साहब खुद कहते हैं “आई एम द बॉस।” साहब का डायलॉग सुनकर तो लगता है, जैसे वो मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग में नहीं, हॉलीवुड के सेट पर बैठे हों। लेकिन फर्क ये है कि यहाँ कैमरा नहीं, बल्कि विज्ञापन के बजट का क्लोज-अप चलता है।

 

अब नियम ये कहते हैं कि भारत में टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापन देने के लिए MIB (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) के सख्त कानून हैं। लेकिन साहब की रसोई में ये नियम मिर्च की तरह सिर्फ दिखाने के लिए रखे हैं, डालने के लिए नहीं। असली स्वाद आता है साहब की ‘चरण सेवा’ वाली चटनी से। जिसने चरण चूमे, उसके लिए सरकारी विज्ञापन का गेट खुला। जिसने नियमों का पाठ पढ़ाने की कोशिश की, उसके लिए CPR (कंट्रीब्यूशन प्रेस रिलीज़) भी सपना बन गया।

 

टीवी विज्ञापन और गाड़ी लेकर प्रेस टूर की उम्मीद? भूल जाइए! जनाब, यहाँ तो हालात ऐसे हैं कि “जो बोलेगा, वही डूबेगा।” जिनका झोला साहब के चरणों में रखा, उनका पन्ना मोटा, और जिनकी रीढ़ सीधी रही, उनकी खबर तक सूख गई।

 

कानून बनाम किचन की रेसिपी

 

MIB के नियम कहते हैं –

✔ लाइसेंस ज़रूरी।

✔ सिर्फ रजिस्टर्ड चैनल को सरकारी विज्ञापन।

✔ एमएसओ (Multi-System Operator) को चैनल नहीं माना जाएगा।

✔ अनधिकृत चैनल पर विज्ञापन देना गैरकानूनी।

 

*वैसे भारत में टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापन देने के लिए MIB के तहत सख्त नियम हैं। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं*

 

लाइसेंस की आवश्यकता -सभी सैटेलाइट टीवी चैनल को MIB से अपलिंक/डाउनलिंक लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। किराये के लाइसेंस (जैसे कि किसी अन्य चैनल का लाइसेंस किराए पर लेकर चलाना) या फ्रेंचायजी मॉडल (जहां ब्रांड नाम का उपयोग किया जाता है लेकिन स्वतंत्र लाइसेंस नहीं) को MIB द्वारा मान्यता नहीं मिलती। केवल पंजीकृत चैनल ही सरकारी विज्ञापनों के पात्र होते हैं।

 

एमएसओ (Multi-System Operators) की भूमिका: एमएसओ केबल ऑपरेटर होते हैं जो सिग्नल वितरित करते हैं, लेकिन वे खुद चैनल नहीं चलाते। एमएसओ को MIB से पंजीकरण की आवश्यकता होती है, लेकिन वे सरकारी विज्ञापनों के लिए चैनल के रूप में योग्य नहीं माने जाते। केवल अनुमत सैटेलाइट टीवी चैनल ही विज्ञापन प्रसारित कर सकते हैं। MIB ने हाल ही में (2025 में) एमएसओ द्वारा तैनात सिस्टम (जैसे CAS और SMS) का विवरण मांगा है, जो अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए है। 2 sources

 

विज्ञापन कोड (Advertising Code): CTN Act के नियम 7 के तहत, विज्ञापन नैतिक, सत्य और गैर-भ्रामक होने चाहिए। सरकारी विज्ञापन (जैसे जनसंपर्क विभाग के) केवल अनुमत चैनलों पर दिए जा सकते हैं। अनधिकृत चैनलों पर विज्ञापन देना नियमों का उल्लंघन है, जिसके लिए जुर्माना या चैनल बंदी हो सकती है। MIB ने 2017-2022 के बीच 9 चैनलों को कोड उल्लंघन के लिए हवा से हटाया था।

 

*पर साहब का नया फार्मूला है*- “जितना चरण, उतना चैन।” यहाँ लाइसेंस नहीं, लॉयल्टी चलेगी। MIB की किताब साहब की मेज पर रखी है, लेकिन उस पर चाय का कप और पान का डिब्बा रखा हुआ है। किताब सिर्फ डेकोरेशन पीस है।

 

फाइल कहाँ जाती है? ऊपर? नहीं! अब तो फाइल साहब के कमरे में ‘स्वयं सेवा’ के सिद्धांत पर घूमती है। और जो साहब को आईने में दिखाने की कोशिश करे कि ये गलत है, तो समझ लीजिए, उसका नाम ब्लैकलिस्ट की रेसिपी में डाला जा चुका है।

 

किसी ने साहब से पूछा “सर, नियम-कायदे क्यों नहीं लागू हो रहे?” साहब ने जवाब दिया “क्योंकि बिरयानी में नमक डालेंगे तो तड़का फीका हो जाएगा।”मतलब साफ है नियम डाल दिए, तो खेल खत्म। और खेल तो वो है, जो सबको दिखाई भी न दे और सबका फायदा भी हो।

 

अब कहानी में एक और ट्विस्ट। ऊपर से एक वरिष्ठ अधिकारी को तैनात किया गया। सबको लगा कि अब सुधार होगा। लेकिन हुआ ये कि वरिष्ठ साहब को सिर्फ मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों की सैर कराई जा रही है, ताकि वो समझने में ही समय निकाल दें और असली खेल चलता रहे। जनता सोचती है कि ये “प्रोटोकॉल का सम्मान” है, लेकिन असल में ये ‘प्रोटोकॉल परेड’ है। छोटे साहब खेल खेलते रहेंगे, और बड़े साहब को रिबन काटने का मौका मिलता रहेगा।

 

जनसंपर्क विभाग का असली नाम अब ‘जनसमर्पण विभाग’ होना चाहिए। यहाँ पत्रकारिता नहीं, चरण-चारित्र्य का कोर्स चलता है। और परीक्षा का रिजल्ट विज्ञापन के रूप में मिलता है।

जो पास हुए, उनके टीवी चैनल पर सरकारी विज्ञापन चमके। जो फेल हुए, वो WhatsApp ग्रुप पर भी एड नहीं पाएंगे।

 

पत्रकारों के लिए नया स्लोगन:

“साहब के संग लगे रहो, विज्ञापन संग बहते रहो।”

 

जनसंपर्क विभाग का हाल ऐसा है जैसे मालवा की दाल-बाफला में नमक भूल गए हों।

बाहर से सब दिखता है चूरमा, घी, दाल लेकिन पहला निवाला लेते ही समझ आता है कि स्वाद गायब है।

यहाँ भी सब कुछ है फाइलें, टेंडर, गाइडलाइन, नियम लेकिन असली स्वाद यानी ईमानदारी का नमक गायब है और जब भ्रष्टाचार की सब्जी में नमक नहीं होता, तो उसे खाने वाले यानी आम जनता का क्या हाल होता होगा, ये सब जानते हैं।

 

साहब कहते हैं “हम नियमों के अनुसार काम करते हैं।”

हम कहते हैं “हाँ, नियम वही हैं जो साहब खुद लिखते हैं और खुद मिटाते हैं।”

और जनता कहती है “नमक डाल दो साहब, कम से कम बिरयानी खाने लायक तो हो।”

 

*यह जनसंपर्क का हाल है जहाँ नियम फाइल में मर गए, साहब की हंसी में खेल गए, और विज्ञापन की मलाई में सबके हाथ गीले हो गए। बाकी आप समझदार हैं। नमक की कमी सिर्फ खाने में नहीं, ईमानदारी में भी है।*

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