आजकल अखबार और न्यूज़ चैनल प्रमुख रूप से दो उद्देश्यों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गए हैं।
कड़वा सच-
आजकल अखबार और न्यूज़ चैनल प्रमुख रूप से दो उद्देश्यों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गए हैं।
पहला -पहुंच, पकड़, दबदबा,उगाही
दूसरा- सरकारी विज्ञापन
बावजूद अपवादस्वरूप कुछ ऐसे भी हैं जिनका उद्देश्य इनसे अलग हो। पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से आए महानुभावों के कारण पत्रकारिता आज थोड़ी शुद्व, सुरक्षित है और उसकी सांस चल रही है। वरना पत्रकारिता क्षेत्र में गैर पत्रकारों की बाढ़ सी आ गई है। मस्का,चश्का बिस्कुट सरीखे ऐसे तथाकथित लोग पत्रकारों के बीच जबरन घुसे बैठे हैं। प्रेसवार्ता के दौरान इनके द्वारा पूछे जाने वाले अनाप शनाप सवालों से इन्हें कोई भी आसानी से पहचान सकता है। दुकानदारी ,व्यवसायी संस्थानों को
थोड़ी बहुत जन पक्षधर पत्रकारिता का दिखावा इसलिए करना होता है क्योंकि उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिए नौटंकी भी तो जरूरी है। वरना जनता अखबारों, टीवी चैनलों की तरफ क्यों झांकेंगी। मीडिया की आड़ में आद्योगिक, व्यापारिक प्रतिष्ठान धड़ल्ले से चल रहे हैं। अफसोस इस बात का है कि ऐसे संस्थानों को सरकार विज्ञापनों से पाट रही है। जिन्हें विज्ञापनों की आवश्यकता नहीं है। दरअसल, ऐसा इसलिए है क्योंकि ये सरकार-प्रशासन से बचने के लिए मीडिया की दुकान खोलकर बैठे हैं। ताकि सड़क,बिल्डिंग, तेल,फैक्ट्री, ठेकेदारी चलती रहे। कोई उनकी तरफ न देखे। पत्रकारिता को सबसे अधिक नुकसान ऐसी ही पूंजीवादी ताकतों से हो रहा है। इसी ताकत ने प्रेस को पत्रकारिता के लिए नहीं वरन अपनी स्वार्थसिद्धि का प्रमुख औजार बना लिया गया है। देश,समाज,व्यक्ति से इन्हें कभी लेना देना था ही नहीं। बेचारे विशुद्ध पत्रकार पिसे जा रहे हैं। सरकारों को क्या पता नहीं कि पत्रकार पूंजीपति और पूंजीवादी कभी पत्रकार नहीं हो सकता। आवश्यकता इस बात की है कि विशुद्ध रूप से पत्रकारिता करने वाले लघु,मध्यम मीडिया संस्थानों को सहायता प्रदान की जाए। जनता तो चाहती है पत्रकार उसके पक्ष में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे लेकिन जब अखबार खरीदकर पढ़ने की बारी आती है तो वही जनता मुंह फेर लेती है। जनता चाहती है अखबार सिस्टम को धूल चटा दे उसकी ही सुने लेकिन जब पत्रकार या अखबार पर कोई संकट आ जाए तो पाठक चुप। पाठकों के दोहरे चरित्र से स्वस्थ पत्रकारिता की कल्पना कैसे की जाए। सच तो यह है कि सरकारी विज्ञापन बन्द कर दिए जाएं तो 99 फीसदी मीडिया पर ताले लग जाएं। पाठक अखबारों को चलाने का जिम्मा कभी नहीं उठा सकते।vijay shukla
