सद्गुरु संत शिरोमणि आचार्य श्री महामंडलेश्वरजी के मुखारबिंद के मोती

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☀️??सद्गुरु संत शिरोमणि आचार्य श्री महामंडलेश्वरजी के मुखारबिंद के मोती?हे,भारत श्रेष्ठ.!यजुर्वेद उद्घगौष करता है,की मनुष्य की भाँति अन्य सभी प्राणी,पशु-पक्षी भी प्रेम करुणा,अपनत्व,सुख और दु:ख को समान रूप से अनुभूत करते हैं।प्राणीमात्र के प्रति आत्मवत् व्यवहार से ही जीवन की संसिद्धि सम्भव है।पशु-पक्षियों की निरीह आँखों से स्पंदित वेदनाओं के मर्म को समझने का प्रयत्न करो यही भाव दैवत्व की प्रतिष्ठा करेगा।अन्य प्राणी मात्र देहधारी के प्रति क्रूरता संवेदनहीनता नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।आइये..!सृष्टि के सभी प्राणियों के प्रति प्रेम जगाएँ .!समष्टि के प्रति एकात्मता, ‘सर्वभूतहितेरता:’व’सर्वे भवन्तु सुखिन:’जैसे उदात्त भाव भारतीयों की विशेषताएं है।भारतीय मनुष्य व प्राणीमात्र के उन्नयन-उत्थान व उत्कर्ष के प्रति समर्पित हैं।प्रभु प्रेमियों..!जीवन निर्वाह ही जीवन का उद्देश्य नहीं।अतःदिव्य जीवन का निर्माण करें,जीवन को ढोयें नहीं,दिव्यता से जीयें।जब हम किसी को जीवन दे नहीं सकते,तब हमें किसी का जीवन लेने का बिल्कुल भी अधिकार नहीं है।जैसे हम जीना चाहते हैं,वैसे ही प्रत्येक प्राणी भी जीना चाहता है।इसलिए प्राणी मात्र की रक्षा में ही हमारी रक्षा निहित है। मनुष्य के बिना पशु जंगल में भी जीवित रह सकते हैं,लेकिन पशु-पंक्षियों के बिना मनुष्य जीवन जीना कठिन है।वन्य प्राणीयों से मनुष्य को कई प्रकार के लाभ हैं।क्षणिक स्वार्थ तथा स्वाद लोलुपता के कारण मनुष्यों द्वारा कई पशु-पक्षीयों की निरन्तर हत्या कर दी जा रही है।इस कारण कितने ही पशु-पक्षी विलुप्त होने की स्थिति में पहुँच गए हैं।इसलिए सभी को वन्य प्राणियों की रक्षा को लेकर काम करना चाहिए।आज वातावरण असंतुलित होता जा रहा है।हम सभी का यह कर्तव्य बनता है कि वन्य प्राणियों की रक्षा सहित प्रत्येक उत्सव में एक-एक पौधरोपण अवश्य करें।पर्यावरण की रक्षा में प्रत्येक प्राणी का महत्वपूर्ण योगदान है।आज के विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि जहाँ पर प्रकृति के साथ क्रूरता से छेड़छाड़ की जाती है,वहाँ पर बाढ़,भूकम्प,सूखा आदि विपदाओं को खुला निमंत्रण देना है।?किसी प्राणी को बचाना तीन लोक की सम्पत्ति के दान से भी बढ़कर है।प्राणी मात्र से प्रेम करना परमात्मा की पूजा-सेवा से भी बढ़कर है।?विश्व शान्ति के लिए अहिंसा से बढ़कर और कोई शास्त्र और शस्त्र नहीं हो सकता।प्रकृति में जो परिवर्तन आ रहा है,उस विनाश से बचना है तो प्राणी मात्र को बचाने का संकल्प लेना होगा।मनुष्य जन्म से ही प्रकृति की गोद में अपना विकास व जीवन व्यतीत करता रहा है।वन और धरती पर चारों तरफ फैली हरियाली मानव के जीवन को न केवल प्रफुल्लित करती है,अपितु उसे सुख-समद्धि से सम्पन्न करके उसे स्वास्थ्य भी प्रदान करती है।इसलिए वनों का संरक्षण करो,क्योंकि वनों का संरक्षण प्राणीमात्र के जीवन का संरक्षण है।?पेड़-पौधे,वन्य जीव एवं सकल दृश्य-अदृश्य सत्ता के रूप में परमात्मा ही सर्वत्र अभिव्यक्त है।समष्टि का प्रत्येक प्राणी आदरणीय है और पर्यावरण संतुलन में सबकी अपनी विशिष्ट भूमिका है।प्रकृति रक्षा जैव विविधता पारिस्थितिक-संतुलन सहेज कर रखना हमारा प्रथम धर्म है !हमें प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम, दया,करुणा का भाव रखना चाहिए,क्योंकि मानवता का यही धर्म है।यदि मानव को संसार की सारी जड़-चेतन प्रकृति का ज्ञान क्यों न हो जाये,पर यदि उसके हृदय में दया नहीं है तो मनुष्य का वह ज्ञान परमात्मा के सम्मुख किसी काम न आवेगा।इसलिए प्राणी मात्र पर दया करें;क्योंकि आपके ही परिश्रम,पुरुषार्थ एवं परमार्थ द्वारा ही आपको स्वर्ग, मुक्ति अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।इस प्रकार के निर्देश तो उन धर्मों में भी हैं जो अभारतीय हैं और जहाँ अन्न तथा फल-फूलों का अभाव रहता है।भारतवर्ष धन-धान्य पूर्ण देश है।यहाँ वनस्पतियों एवं अन्नों की प्रचुरता रही है,तब भला यहाँ के धर्म में जीवों पर निर्दयता का समर्थन किस प्रकार किया जा सकता है? ??चूँकि दया धर्म का मूल है और हिन्दू धर्म इसी मूल पर स्थित है।आत्मा अमर है।वह एक समान ही सभी में विद्यमान है।आत्म-तत्व की दृष्टि से संसार के सभी प्राणी समान ही हैं।सबमें ईश्वर का समान अंश विद्यमान है।चींटी से लेकर हाथी तक में एक उसी आत्म-तत्व का प्रकाश हो रहा है।इस प्रकार एकात्मा का सम्बन्ध होने पर पशुओं का उत्पीड़न किया जाये तो इससे बढ़कर और कौन-सा अधर्म हो सकता है.?किसी प्राणी को अकारण कष्ट देने वाले की आत्मा निर्बल हो जाती है।क्रूरता करने से मनुष्य के अंतर्मन पर जो अशुभ संस्कार पड़ते हैं,वे आजीवन साथ तो रहते ही हैं,अन्तकाल में भी स्मरण आते हैं,जिससे मनुष्य की जीवात्मा अधोगति की ओर ही जाती है।पशु-पक्षियों के साथ निर्दय व्यवहार करने वाला मनुष्य कितना ही साहसी,लापरवाह और उपेक्षाशील क्यों न हो,उसका तर्क-कुतर्क उसकी आत्मा को उस पाप से नहीं बचा सकता और अन्त में उसे इस लोक में दण्ड न भी मिले तो परलोक अथवा पुनर्जन्म में उसका भोग उसे अवश्य ही भोगना होगा।जीवों के साथ क्रूरता का व्यवहार करने वाले व्यक्ति का हृदय भावनाशून्य होकर कठोर हो जाता है।ऐसा हृदयहीन व्यक्ति न तो आत्मिक उन्नति करता है और न ही समाज में अपने आचरण को शालीन रख सकता है।आज के उन्नति एवं विकास के युग में जो विनाश की सम्भावनाएँ संसार के सिर पर मँडराती दिखाई देती हैं,नाना प्रकार के वायरस’का मूलभूत कारण मनुष्य की हृदयहीनता ही है,जिसको उसने पशु-पक्षियों पर अत्याचार करने के फलस्वरूप पाया है।जब तक मनुष्य अपने में जीव दया,समस्त प्राणियों के प्रति सहानुभूति की वृत्तियों का विकास नहीं होगा तब तक,बहुत कुछ भौतिक उन्नति करने पर भी वास्तविक सुख-शाँति की प्राप्ति नहीं हो सकती।उसका आत्मिक आध्यात्मिक,धार्मिक तथा सामाजिक जीवन यों ही हिंसा की आग में जल-जलकर नष्ट होता रहेगा।किसी भी धर्म का मूल’दया’है।और सच्ची सुख-शाँति का निवास प्रेम सहानुभूति,सहृदयता में है; क्रूरता,अत्याचार अथवा निर्दयता में नहीं।जो व्यक्ति अन्य पशु-पक्षियों के प्रति सहानुभूति एवं दया का भाव नहीं रख सकता,वह संसार में किसी के प्रति सद्भाव भी रखने में असमर्थ ही रहेगा।जहाँ अन्याय अत्याचार,निर्दयता एवं स्वार्थपरता है,वहाँ विनाश का ही बोलबाला रहेगा।जहाँ सुमति एवं सद्भावनाएँ हैं,सुख-सम्पत्ति का निवास एवं विकास भी वहीं सम्भव है;क्योंकि यह एक सत्य एवं शाश्वत सिद्धान्त है।??जय राजेश्वर राधे राधे जय श्री कृष्णा राम राम हरि”ॐ”??

EKTA

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