भेड़ पालकों की राजस्थान वापसी ( श्याम चौरसिया)
कार्तिक से जेष्ठ तक मप्र के संशाधनों ओर वनस्पति का उपभोग करने वाले राजस्थानी भेड़ पालकों की वतन वापसी का श्री गणेश हो चुका है। मंदसौर, शाजापुर, आगर, राजगढ़,गुना, शिवपुरी से राजस्थान जाने मार्गो पर इन दिनों भेड पालकों के रंग बिरंगे, लुभावने रेवडो का कब्जा है। हर रेवड में कम से कम 04 सो भेड, दर्जनों उट, रक्षा के लिए कुछ श्वान होते है।
रेवड़ की कमान युवकों ओर महिलाओं के हाथों में होती है। बरसते मेघ की चिंता किए बिना इनका कारवाँ चलता ही रहता है। शाम होते होते माकूल जगह देख रेवड़ डेरा डाल देता है।महिलाओं के सधे हाथ खाट, तंबू आदि सजा जलावन का प्रबंध कर लेते है। सुबह भोजन से निवर्त होकर रेवड़ अपनी मंजिल वतन राजस्थान की ओर कूच कर देता है।
मस्ती भरा जीवन। मोटा खाना। मोटा पहनना। काया को स्वस्थ,निरोगी रखने का मंत्र, प्रकर्ति के करीब रहो।
भेड़ पालक कार्तिक से जेष्ठ तक मप्र के विभिन्न जिलों के जंगलों में डेरा डाल भेड़ो,ऊट चराते है। भेड़ो की ऊन निकाल बेचते है। सावन से कार्तिक तक राजस्थान में ही रहते है। इनके विवाह संस्कार भादो की श्री कृष्ण जन्माष्ठमी पर सम्पन्न होते है। मप्र की तरह राजस्थान में जम कर बारिस होने से हर भेड़ पालक बहुत खुश है।
90% भेड़ पालक, रेवड़ के मालिक नही बल्कि हाली होते है। मालिक चुरू, राजसमंद, पाली, बीकानेर,जोधपुर आदि जिलों के कुबेर होते है। उनका धंधा भेड पालन के अलावा इमारती पत्थरो की खदानों, ट्रांसपोर्ट, सहित अन्य लाभ कारी व्यवसाय होता है मालिको का रुतबा सत्ता के गलियारों में जबरजस्त होता है। कुछ मालिक सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष भी है।
रेवड़ को हांकने ओर प्रबंध में युवकों,महिलाओं का ही योगदान होता है। बुजुर्ग,बच्चे गांव में ही रहते है। गर्भवती महिलाओं को गांव भेज देते है। मोबाइन क्रांति ने भेड़ पालकों के दैनंदिनी जीवन मे क्रांति ला दी। कभी स्कूल का मुंह न देखने वाली महिलाएं भी वाट्सअप, फेसबुक से अपनो से जुड़ी रहती है।
