मुख्यमंत्री का गोल्डन हेमंत काल

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लंबी कवायद, विचार विमर्श के बाद हेमंत खंडेलवाल को प्रदेश बीजेपी का निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया गया है. लंबे समय तक टलते-टलते आखिरकार चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई. अटकलें का दौर समाप्त हुआ.
संगठन की ही सरकार और मुख्यमंत्री होता है लेकिन मुख्यमंत्री सरकार से ज्यादा संगठन पर नजर रखता है. सत्ता,संगठन में समन्वय सैद्धांतिक बात है. लेकिन पावर में टकराव स्वाभाविक परिणिति है. हर मुख्यमंत्री यही कोशिश करता है कि संगठन में ऐसा ही अध्यक्ष चुना जाए जिसके साथ उसकी केमिस्ट्री जमती रहे.
इस नजरिए से अध्यक्ष का यह निर्वाचन सीएम मोहन यादव को मजबूती देता हुआ दिखाई पड़ रहा है. इसे मोहन का गोल्डन हेमंत काल कहा जा सकता है. पंद्रह महीने को छोड़कर लगभग तेईस साल से प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ बीजेपी में कई बार सत्ता, संगठन में तनाव भी देखे गए थे. कई ऐसे अध्यक्ष बनाए गए, जो उस समय के मुख्यमंत्री की मंशानुरूप नहीं थे.
मध्य प्रदेश में लंबे समय के बाद चुनाव में गए मुख्यमंत्री को चुनावी विजय के बाद हटाकर नए नेतृत्व के रूप में मोहन यादव को कमान सौंपी गई. अध्यक्ष के रूप में वी.डी. शर्मा पहले से ही कार्य कर रहे थे. शर्मा पहली बार तब अध्यक्ष बनाए गए थे, जब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे. यद्यपि दोनों के बीच में समन्वय बेहतर ही बना रहा लेकिन फिर भी बीच-बीच में ऐसे मामले आते रहे, जिसमें तनाव भी देखे गए.
सामन्यतः ऐसा होता है कि जो मुख्यमंत्री चुनाव में जाता है, विजयी होने के बाद उसे ही मौका दिया जाता है. लेकिन मध्य प्रदेश में इससे उल्टा हुआ. सरकार में नया नेतृत्व लाया गया. ऊपर से भले ही सत्ता बदलाव कितना सामान्य हो लेकिन जब पावर छूटता है तो कम तकलीफ नहीं होती.
बात नए अध्यक्ष की करें तो हेमंत खंडेलवाल वैश्य समाज से आते हैं. उस क्षेत्र से आते हैं जहां बीजेपी प्रभावशाली है. सीएम मालवा से आते हैं, तो नए अध्यक्ष मध्य क्षेत्र से हैं. नए अध्यक्ष लो प्रोफाइल दिखते हैं. यदपि पूर्व सांसद हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सक्रियता अब तक परिलक्षित नहीं हो रही थी. बीजेपी की यही खासियत है कि वह नए नेतृत्व को बढ़ाती है.
जिस दिन उसको नेतृत्व सौंपा जाता है, उस दिन अगर उसकी सक्रियता के पैमाने पर देखा जाएगा तो कई बार ऐसा लगता है कि, वह थोपा गया है. ऐसा ही नव निर्वाचित अध्यक्ष के मामले में भी कहा जा सकता है. इसके पहले भी जब वी.डी. शर्मा अध्यक्ष बनाए गए थे, तब भी अध्यक्ष पद के लिए उन्हें कमजोर व्यक्तित्व माना जा रहा था, यद्यपि उन्होंने अपने परफॉर्मेंस से इसको गलत साबित किया.
अध्यक्ष के निर्वाचन के राजनीतिक विश्लेषण का सबसे मुख्य बिंदु यही है, कि इससे मुख्यमंत्री को ताकत मिली है या पैरेलल पावर सेंटर की कोई संभावना बनती है. इस पैमाने पर तो यही दिखाई पड़ता है कि, सीएम मोहन यादव की पसंद को ही बीजेपी शीर्ष नेतृत्व ने मंजूरी दी है. यह बात तो पहले से ही राजनीतिक क्षेत्रों में लगभग स्थापित हो चुकी है कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का उन्हें वरद हस्त है.
बीजेपी में जब तक किसी नेता को उन दोनों का आशीर्वाद मिला हुआ है, तब तक उसके खिलाफ किसी भी राजनीतिक षड्यंत्र की कोई गुंजाइश नहीं बनती है. इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुरेश सोनी का नाम चर्चा में आता है. ऐसा कहा जाता है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव को उनका आशीर्वाद प्राप्त है. नए अध्यक्ष के मामले में भी ऐसा ही माना जा रहा है. किसी भी नेता का परफॉर्मेंस तो वक्त के साथ प्रमाणित होता है लेकिन इस निर्वाचन ने प्रदेश की राजनीति में अध्यक्ष की दौड़ में शामिल कई नेताओं के मनसूबों पर पानी फेर दिया है.
जिन नेताओं के नाम उछल रहे थे, अगर उनमें से किसी को भी अध्यक्ष पद पर बैठने का मौका मिल जाता है तो मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए भविष्य का रास्ता इतना आसान नहीं हो सकता था. सीनियारिटी, जूनियरटी की बातें वैसे ही होती रहती हैं, इससे यह भी लगता है कि बीजेपी शीर्ष नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में नए नेतृत्व को विकसित करने का फैसला किया है.
जो नेता पहले पावरफुल हुआ करते थे अब उन्हें सरकार के पावर से ज्यादा जनता की सेवा में पावर लगाने का वक्त आ गया है. जाति समीकरण के हिसाब से भी अभी तक सामान्य वर्ग के अध्यक्ष बने हुए थे. सामान्य वर्ग से ही नया अध्यक्ष बनाया गया है. सरकार और संगठन में जातीय संतुलन बनाने की दृष्टि से भी यह कदम उपयुक्त लगता है.
सीएम डॉ. मोहन यादव ने अपने लिए राजनीतिक परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया है, अब सारा फोकस सरकार की परफॉर्मेंस पर होना जरूरी है. सत्ता संगठन को समन्वय के साथ इस दिशा में आगे बढ़ना पड़ेगा.
किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी परिणाम ही महत्वपूर्ण होता है. नए अध्यक्ष की दिशा और परफॉर्मेंस का तो विश्लेषण अभी नहीं किया जा सकता है. विधायक के रूप में भी उनकी सक्रियता बहुत उल्लेखनीय तो नहीं कहीं जा सकती है. संगठन का दायित्व समन्वय, संवाद और कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करने का ज्यादा है.
बीजेपी में अध्यक्ष की व्यवस्था के साथ ही संगठन महामंत्री की व्यवस्था है, जो वास्तविक रूप से संगठन को कंट्रोल करती है. ऐसी व्यवस्था कांग्रेस में नहीं है, वहां अध्यक्ष ही सर्वोपरि होता है. लेकिन बीजेपी में अगर किसी को अध्यक्ष के खिलाफ शिकायत है तो वह भी संगठन महामंत्री को कर सकता है. एक तरीके से प्रैक्टिकल रूप में महामंत्री, संगठन की वैचारिक धारा के सतत प्रवाह को नियंत्रित करता है.
अगला चुनाव साढ़े तीन साल बाद होना है. नए अध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष के लिए होता है. लगता है कि, हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में पार्टी अगले चुनाव में जा सकती है. कम से कम चुनाव की तैयारियों को तो इन्हीं के नेतृत्व में पूरा किया जाएगा.
मोहन यादव के सामने सिंहस्थ के ग्रैंड सक्सेस का चैलेंज है. राजनीतिक गणित का कोई भी सूत्र अगर समझा जाए तो मोहन यादव ने कई राजनीतिक धुरंधरों को अपनी राजनीतिक परिभाषा से परिचित करा दिया है.

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