सत्ता के गलियारे से ..रवि अवस्थी

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** नेता पत्नी की पीड़ा

बीजेपी नेता अमित शाह व शिवराज सिंह चौहान अपना चुनावी नामांकन फॉर्म जमा करने सपत्नीक पहुंचे थे। इनके छाया चित्रों के साथ एक अन्य नेता की पत्नी ने एक्स पर अपनी भावनाएं साझा करते हुए लिखा..”जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को सपत्नी मनाना,सम्मान प्रेम और संरक्षण को दर्शाता है। ऐसे नेताओं को मेरा नमन जो पत्नी को इतना मान देते है।” दरअसल,महिला के पति भी मप्र की एक अहम सीट से चुनाव मैदान में हैं,लेकिन उन्हें यह अवसर नहीं मिला।

 

** एरिया बंदी की पीड़ा

किसी के खिलाफ अपनी भड़ास निकालना हो तो उसके पीठ पीछे ही यह काम करना ज्यादा सुरक्षित तरीका है। कांग्रेस के कई नेता भी आजकल यही कर रहे हैं। पार्टी के पूर्व सांसद अरुण यादव बीते दिनों नर्मदापुरम गए तो अपने वहां अब तक नहीं पहुंच पाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को जिम्मेदार ठहराया।

यादव की मानें तो वह पचौरी जी की इजाजत के बिना नर्मदापुरम नहीं जा सकते थे।और भी बहुत कुछ कहा गया।अब,एरिया बंदी वाली बीमारी तो भोपाल बीजेपी में भी पहले से है। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इसे दूर करने कई बार प्रयास किए,लेकिन रोग दूर नहीं हुआ। पचौरी जी अब बीजेपी में हैं।

 

** अजीब दास्तां है,ये!

गैस त्रासदी के बाद यानी बीते करीब 35 सालों से भोपाल बीजेपी के लिए सुरक्षित लोकसभा सीट बनी हुई है,लेकिन यह सुरक्षा यहां से निर्वाचित सांसदों के लिए एक तरह का ठहराव लेकर आई। बानगी जानिए,एससी वर्मा पार्टी के सलाहकार बन कर रह गए। सुश्री उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं भी तो चंद महीनों के लिए। इसके बाद उन्हें उप्र का रुख करना पड़ा। कैलाश जोशी जी की राज्यपाल बनने की हसरत पूरी न हो सकी। आलोक संजर व सुश्री प्रज्ञा ठाकुर को तो दूसरी बार मौका ही नहीं मिला। उम्मीद की जानी चाहिए,आगे यह मिथक टूटेगा।

 

** ‘लाड़ली बहनों’की बेरुखी

मप्र में लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान में महिलाओं के मतदान में 11 फीसद की गिरावट दर्ज की गई। जबकि इन्हीं ‘लाड़ली बहनों’ने पिछले विधानसभा चुनाव में बंपर वोटिंग कर सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। लोकसभा चुनाव में भी बहनों के उत्साह को कायम रखने हरदा की सभा में पीएम मोदी ने दांव चला,लेकिन यह कारगर नहीं हो सका। बीजेपी अब बहनों के रंज को कम करने के उपाय खोजने में जुटी है ताकि वोट प्रतिशत बढ़ सके।

 

** लग्न का भी रखें ध्यान

मौजूदा लोकसभा चुनाव में देशभर में वोटिंग को लेकर मतदाताओं की बेरुखी से राजनीतिक दल ही नहीं निर्वाचन आयोग भी चिंतित है। कम मतदान की एक बड़ी वजह शादियों के सीजन को बताया जा रहा है। मप्र में ही पहले व दूसरे चरण के चुनाव वाली तिथियों में शादियों की भी लग्न रही। इसके चलते दूसरे चरण में आयोग ने शादी वालों को वोटिंग में प्राथमिकता भी दी,लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। संभव है,अगले चुनाव का कार्यक्रम तय करते वक्त निर्वाचन आयोग को धार्मिक कैलेंडर भी सामने रखना पड़े ताकि वोट प्रतिशत बढ़ाने की उसकी कवायद पर यूं पानी न फिरे।

 

** डिजिटल बेस्ड जीवन

डिजिटल क्षेत्र में भारत की तरक्की से दुनिया भौंचक्की है। इस क्षेत्र में हुई तरक्की ने जीवन को जैसे सेल फोन,टेब पर पूरी तरह आश्रित कर दिया है। ऐसे में चुनाव भला कैसे अछूता रहे। बताया जाता है कि वोटिंग के लिए पहुंचे कई युवा मतदाता,सेल फोन के डिजिलॉकर में दर्ज अपनी आईडी के साथ मतदान केंद्रों पर पहुंचे,लेकिन चुनाव आयोग के इस मामले में अपडेट नहीं होने से उन्हें नाउम्मीदी हाथ लगी। मप्र बीजेपी अध्यक्ष व खजुराहो सांसद वीडी शर्मा ने अब आयोग को पत्र लिखकर डिजिलॉकर आईडी को भी वोटिंग में मान्यता दिए जाने की सिफारिश की है।

 

** आ जाओ,काम यहीं दे देंगे

वोटिंग परसेंटेज बढ़ाने के लिए जिला निर्वाचन अधिकारियों ने कई जतन किए। किसी ने बुजुर्गों के पैर धोकर उन्हें पीले चावल दिए तो किसी ने लकी कूपन तक की व्यवस्था की,लेकिन मतदाता नहीं पसीजे। अंतत: साख बचाने इन्हें उन श्रमिकों को याद करना पड़ा जो काम की तलाश में जिलों से पलायन कर गए। उनकी खोजबीन कर वादा किया गया-लौट आओ,काम यहीं दे देंगे। इक्का-दुक्का कलेक्टर अपने प्रयास में सफल भी हुए,लेकिन ज्यादातर जगह यह तरकीब भी काम नहीं आई। दरअसल,जमीनी हकीकत से वाकिफ श्रमिक भी जानता है कि काम या दाम तो एक दिवस का,बाकी दिन?

 

** उदारमना सीहोर

मप्र की सभी लोकसभा सीट किसी न किसी शहर के नाम पर हैं,लेकिन तीन लोकसभा सीटों (भोपाल,विदिशा व देवास) को अपने में समेटे सीहोर जिले को यह सौभाग्य नहीं मिला। यहां तक कि सीहोर विधानसभा से हमेशा बाहरी या दल बदल कर आए नेता ही विधायक बनते रहे।

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