०प्रतिदिन विचार(20/04/24) बच्चों को तो बख़्शिये, जनाब…!-राकेश दुबे

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दुर्भाग्य है कि भारत में नियामक कानून न होने की वजह से अनेक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां बच्चों की सेहत से खिलवाड़ कर रही हैं। ब्च्चों की सेहत बनाने के दावे के साथ ये मुनाफे का कारोबार करती आ रही हैं। इनमें बोर्नविटा और इसी तरह के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेय पदार्थ भी शामिल रहे हैं। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों को हाल ही में निर्देश दिया है कि बोर्नविटा और इसी तरह के पेय पदार्थों को स्वास्थ्य पेय श्रेणी से हटाया जाए।
इस कदम से ऐसे उत्पादों को लेकर पारदर्शिता सुनिश्चित करने और उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाने की दिशा में सार्थक पहल हुई है।हुआ यूँ कि , राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की जांच के बाद सामने आया था कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत स्वास्थ्य पेय की कोई आधिकारिक परिभाषा नहीं है । जिसका फायदा कारोबारी कंपनियां अपने उत्पादों को स्वास्थ्यवर्धक बताकर उठाती रही हैं। कैसी विडंबना है कि जिस उत्पाद को कंपनियां स्वास्थ्यवर्धक बताकर वर्षों तक अभिभावकों से मुनाफा कमाती रही, वही उत्पाद बच्चों के लिये स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी पेश करता रहा है।
इसी महीने की शुरुआत में, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने भी खुलासा किया था कि डेयरी, अनाज या माल्ट आधारित पेय पदार्थों को स्वास्थ्य या ऊर्जा बढ़ाने वाले पेय के रूप में लेबल नहीं किया जाना चाहिए। स्वास्थ्यवर्धक व ऊर्जा बढ़ाने वाले पेय के नाम पर बड़ा गोरखधंधा होता रहा है। साथ ही स्वास्थ्यवर्धक पेय के नाम पर अतिरिक्त कीमत वसूली जा रही है। विश्वास किया जाना चाहिए कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की सार्थक पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे तथा उपभोक्ताओं के दोहन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। निश्चित रूप से तंत्र की काहिली और निगरानी करने वाले विभागों की मिलीभगत से यह खेल दशकों से बदस्तूर जारी था। देर से ही सही, तंत्र ने उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिये पहल की और विश्वास किया जाना चाहिए कि अन्य मामलों में भी उपभोक्ता हितों को बढ़ावा दिया जाएगा।
स्वास्थ्यवर्धक बताकर बेचा जा रहा बोर्नविटा तो तब विवादों में घिर गया था जब इसके पोषण संबंधी दावों, खासकर इसमें मौजूद चीनी की मात्रा के बाबत सवाल पूछे गए थे। इस विवाद ने ही कालांतर ऐसे एनर्जी ड्रिंक्स की हकीकत का पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत बतायी। सवाल उठे कि कैसे ऐसे उत्पादों की बिक्री और लेबलिंग की जा रही है। हालांकि, बोर्नविटा ने इस प्रतिक्रिया और विवाद के बाद अपने उत्पाद में चीनी की मात्रा को घटाया था। लेकिन भ्रामक आधार पर स्वास्थ्यवर्धक की लेबलिंग के मुद्दे ने पूरे उद्योग जगत को अपने निशाने पर ले लिया। उल्लेखनीय है कि बाजार में ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द विशेष रूप से कार्बोनेटेड और गैर-कार्बोनेटेड दोनों तरह के स्वाद वाले पानी आधारित पेय पदार्थों को संदर्भित करता है। विडंबना यह है कि इन पेय पदार्थों को अकसर स्वास्थ्य पेय के नाम पर बाजार में उतारा जाता है और सामान्य पेय पदार्थों की तुलना में इनकी कीमत अधिक रखी जाती है। जबकि इन पेय पदार्थों में चीनी की अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिये गंभीर चुनौती पैदा करती है। खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। जिसमें छोटी उम्र में मोटापा, मधुमेह और दांतों से जुड़े कई रोग पैदा हो सकते हैं। दरअसल, देश में इन उत्पादों को लेकर नियामक दिशानिर्देश के अभाव से इस समस्या को विस्तार मिला है। जिसके चलते उपभोक्ता भ्रामक विज्ञापनों के जाल में फंस जाते हैं। निश्चित रूप से नये स्पष्टीकरण निर्देशों से उपभोक्ताओं को अपने उत्पादों को चुनने के लिये नये विकल्प मिल सकेंगे। निस्संदेह, भविष्य में सरकार व अन्य हितधारकों को खाद्य उत्पादों की लेबलिंग और वर्गीकरण के लिये व्यापक मानक स्थापित करने होंगे। निश्चित रूप से नियामक संस्थाएं लेबलिंग के लिये निर्माताओं, खुदरा विक्रेताओं और ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों को जिम्मेदार ठहराकर नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा की दिशा में सार्थक पहल कर सकती हैं। यह पहल जितनी जल्दी संभव हो, जनहित में की ही जानी चाहिए।

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