*डॉ. मोहन यादव क्यों नहीं बन पा रहे उतने लोकप्रिय? एक समीक्षा?*

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*डॉ. मोहन यादव क्यों नहीं बन पा रहे उतने लोकप्रिय? एक समीक्षा?*

 

समीक्षक – राजेन्द्र सिंह जादौन

 

मध्यप्रदेश की राजनीति में जब डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली, तब एक नई उम्मीद जगी थी। एक ऐसा चेहरा सामने आया जो शैक्षणिक रूप से मजबूत है, प्रशासनिक समझ रखता है और प्रदेश को “बीमारू राज्य” की छवि से बाहर निकालने का विजन भी प्रस्तुत करता है। उनके भाषणों में विकास, रोजगार, शिक्षा और निवेश की बात साफ सुनाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि इतने सारे सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, वे अब तक जनता के बीच उतनी गहरी लोकप्रियता क्यों नहीं बना पाए, जितनी अक्सर अन्य नेता कम समय में बना लेते हैं?

 

*इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है, बल्कि कई स्तरों पर छिपा हुआ है।*

 

*सबसे पहला कारण है* “काम और छवि के बीच का अंतर”। भारतीय राजनीति में यह एक पुराना लेकिन सटीक सच है कि सिर्फ अच्छा काम कर देना ही काफी नहीं होता, उस काम को जनता तक प्रभावी तरीके से पहुँचाना भी उतना ही जरूरी होता है। आज के दौर में राजनीति सिर्फ नीतियों और योजनाओं का खेल नहीं है, बल्कि धारणा (perception) का भी उतना ही बड़ा खेल है। अगर जनता तक आपकी उपलब्धियाँ सही तरीके से नहीं पहुँच रहीं, तो वे कागज़ों और फाइलों में ही सीमित रह जाती हैं।

 

यहीं आकर मीडिया रणनीति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रदेश में खबरों के प्रसारण का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय एजेंसियों पर निर्भर करता है, जिनमें ANI जैसी एजेंसी का दबदबा है। मुख्यमंत्री की बाइट्स और गतिविधियाँ अगर मुख्य रूप से ऐसी एजेंसियों के माध्यम से ही सामने आती हैं, तो उसका दायरा सीमित हो जाता है। बड़े चैनल, जिनके पास इन एजेंसियों की सदस्यता है, वे तो इन खबरों को प्रमुखता से दिखाते हैं, लेकिन छोटे और क्षेत्रीय चैनलों के लिए यह सामग्री या तो उपलब्ध नहीं होती या फिर कॉपीराइट की बाधाओं में उलझ जाती है।

 

परिणाम यह होता है कि जमीनी स्तर पर काम कर रहे पत्रकार, खासकर जिला और तहसील स्तर के संवाददाता, मुख्यमंत्री की गतिविधियों को उतनी मजबूती से नहीं दिखा पाते। इससे एक अजीब सा disconnect बन जाता है सरकार काम कर रही है, लेकिन उस काम की गूंज गांव-गांव तक नहीं पहुँच रही।

 

*दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है* जन-संपर्क की शैली। हर नेता की अपनी एक शैली होती है। कुछ नेता भीड़ में घुल-मिल जाते हैं, उनकी भाषा सरल होती है, वे सीधे दिल पर असर करते हैं। वहीं कुछ नेता प्रशासनिक दृष्टि से बेहद सक्षम होते हैं, लेकिन उनका संवाद थोड़ा औपचारिक रहता है। डॉ. मोहन यादव फिलहाल दूसरे प्रकार के नेता के रूप में दिखाई देते हैं। उनके भाषणों में तथ्य और योजनाएं तो होती हैं, लेकिन वह भावनात्मक जुड़ाव अभी उतना प्रबल नहीं दिखता, जो आम जनता को तुरंत आकर्षित कर ले।

 

राजनीति में भावनात्मक कनेक्शन बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जनता सिर्फ यह नहीं देखती कि आपने क्या किया, बल्कि यह भी महसूस करना चाहती है कि आप उनके अपने हैं या नहीं। जब तक यह “अपनापन” स्थापित नहीं होता, तब तक लोकप्रियता की ऊंचाई सीमित ही रहती है।

 

*तीसरा कारण है* तुलना की राजनीति। मध्यप्रदेश में पहले भी कई प्रभावशाली नेता रहे हैं, जिनकी छवि वर्षों में बनी है। जनता अक्सर नए नेतृत्व की तुलना पुराने चेहरों से करती है। ऐसे में किसी भी नए मुख्यमंत्री के लिए अपनी अलग पहचान बनाना एक चुनौती होती है। यह प्रक्रिया समय लेती है, लेकिन इसके लिए निरंतरता और अलग दृष्टिकोण की जरूरत होती है।

 

*चौथा पहलू है* डिजिटल और सोशल मीडिया का प्रभाव। आज के समय में लोकप्रियता का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर भी तय होता है। जो नेता इस प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं, जो अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाते हैं, वे जल्दी पहचान बना लेते हैं। अगर इस क्षेत्र में रणनीति कमजोर रहती है, तो लोकप्रियता की रफ्तार भी धीमी हो जाती है।

 

*अब सवाल उठता है कि क्या इसका पूरा दोष मीडिया सलाहकारों पर डाल देना सही होगा?*

*जवाब है आंशिक रूप से हां, लेकिन पूरी तरह नहीं।*

 

मीडिया सलाहकार की भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण होती है। अगर वह रणनीति ऐसी बनाता है जो सीमित प्लेटफॉर्म तक ही सिमट जाती है, तो नुकसान होता है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि नेतृत्व खुद भी संवाद के नए रास्ते अपनाए। सिर्फ एजेंसियों के भरोसे रहने के बजाय, सीधे संवाद, प्रेस कॉन्फ्रेंस, क्षेत्रीय मीडिया से बातचीत और जनसभाओं के माध्यम से अपनी बात पहुँचानी होगी।

 

असल में लोकप्रियता एक दिन में नहीं बनती। यह लगातार संवाद, भरोसे और उपस्थिति से बनती है। जनता यह देखती है कि नेता सिर्फ घोषणाएं कर रहा है या वास्तव में उनके बीच मौजूद भी है।

 

डॉ. मोहन यादव के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर यह है कि उनके पास विजन है, योजनाएं हैं और काम करने की क्षमता है। चुनौती यह है कि इन सबको जनता के दिल तक कैसे पहुँचाया जाए।

 

अगर मीडिया रणनीति को थोड़ा व्यापक बनाया जाए, छोटे और क्षेत्रीय पत्रकारों को बराबरी से मंच दिया जाए, और सबसे महत्वपूर्ण सीधे जनता से संवाद को प्राथमिकता दी जाए, तो उनकी लोकप्रियता में निश्चित रूप से वृद्धि हो सकती है।

 

राजनीति में एक पुरानी कहावत है “काम बोलता है, लेकिन उसे सुनाने वाला भी होना चाहिए।”

फिलहाल, ऐसा लगता है कि काम तो हो रहा है, लेकिन उसकी आवाज उतनी दूर तक नहीं जा पा रही।

 

*यही इस पूरी समीक्षा का सार है।*

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