मोरारजी की तरह स्वमूत्र पीते थे शरद पवार:इंदिरा को चुनौती देकर बने सबसे युवा CM; कभी चुनाव नहीं हारे, लेकिन भतीजे ने मात दी

तारीख- 29 मई 1991, जगह- तमिलनाडु का श्रीपेरुमबुदुर, समय- सुबह करीब 10 बजे।
एक चुनावी रैली के दौरान आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। इसके ठीक बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 252 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। राजीव गांधी की पत्नी सोनिया राजनीति में आने से इनकार कर चुकी थीं। अब बड़ा सवाल था कि कांग्रेस प्रधानमंत्री किसे चुनेगी।
17 जून 1991 के टाइम्स ऑफ इंडिया में महाराष्ट्र के CM और तब कांग्रेसी नेता शरद पवार के हवाले से खबर छपी थी कि महाराष्ट्र के सांसद तय करेंगे कि दिल्ली में देश का नेतृत्व कौन करेगा। 18 जून को फिर शरद पवार को PM प्रोजेक्ट करने वाली खबर छपी। महाराष्ट्र से दिल्ली तक चर्चा थी कि शरद पवार PM पद के लिए ‘सूटेबल बॉय’ हैं।
कांग्रेस सांसदों की वोटिंग कराई गई। सोनिया गांधी के समर्थन वाले पीवी नरसिम्हा राव को शरद पवार से 35 वोट ज्यादा मिले। इस तरह शरद पवार देश के PM बनते-बनते रह गए। हालांकि उन्हें इस सरकार में रक्षामंत्री बनाया गया।
शरद पवार अपनी किताब ‘अपनी शर्तों पर’ में पूर्व राज्यपाल पीसी अलेक्जेंडर के हवाले से लिखते हैं कि सोनिया नहीं चाहती थीं कि कोई स्वतंत्र दिमाग वाला कांग्रेसी नेता देश का प्रधानमंत्री बने।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट विनय सीतापति अपने किताब ‘हॉफ लायन’ में लिखते हैं, ‘सोनिया गांधी को लगता था कि राव अपनी जगह जानते हैं। सरकार और संगठन में लंबे समय तक रहने के दौरान उन्होंने कभी गांधी परिवार के खिलाफ बगावती तेवर नहीं दिखाए। शरद पवार इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते थे।’
देश के ताकतवर राजनीतिक परिवारों की सीरीज ‘परिवार राज’ के आठवें एपिसोड में महाराष्ट्र के शरद पवार परिवार की कहानी…

3 दिन के शरद पवार राजनीतिक बैठकों में जाने लगे थे
शरद पवार का जन्म 12 दिसंबर 1940 को महाराष्ट्र के बारामती में हुआ। शरद पवार 11 भाई-बहनों में से एक थे। उनके पिता गोविंदराव पवार महाराष्ट्र कोऑपरेटिव सोसाइटी में अधिकारी थे।
अपने जन्म के 3 दिन बाद से ही शरद राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे थे। दरअसल, 12 दिसंबर को शरद पैदा हुए थे और 15 दिसंबर 1940 को उनकी मां शारदा की पुणे लोकल बोर्ड में एक जरूरी मीटिंग थी।
वे इतने छोटे थे कि उन्हें घर पर अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था। ऐसे में मां उन्हें मीटिंग में ले गईं। शरद ने अपने बचपन के दिनों से देखा था कि कैसे उनके पिता गोविंदराव ने मराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों के बीच अपनी मजबूत पैठ बनाई थी।
पुणे के बृहण महाराष्ट्र कॉलेज से बैचलर की पढ़ाई करने के समय से ही शरद पवार राजनीति में एक्टिव हो गए थे। शरद पवार अपनी किताब ‘अपनी शर्तों पर’ में लिखते हैं कि कॉलेज में उनके बारे में कहा जाता था कि वह एक एवरेज स्टूडेंट, लेकिन एक्टिव पॉलिटीशियन हैं।

20 साल के शरद पवार ने अपने भाई को चुनाव में हरवाया
1960 में शरद पवार ने कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। 1960 में कांग्रेसी नेता केशवराव जेधे का निधन हुआ और बारामती लोकसभा सीट खाली हो गई। उपचुनाव में पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी PWP ने शरद के बड़े भाई बसंतराव पवार को टिकट दिया, जबकि कांग्रेस ने गुलाबराव जेधे को उम्मीदवार बनाया।
उस वक्त वाईबी चव्हाण महाराष्ट्र के CM थे। उन्होंने बारामती सीट को अपनी साख का मुद्दा बना लिया था। शरद अपनी किताब ‘अपनी शर्तों पर’ में लिखते हैं कि मेरा भाई कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार था। हर कोई सोच रहा था कि मैं क्या करूंगा? बड़ी मुश्किल स्थिति थी।
भाई बसंतराव ने मेरी परेशानी समझ ली। उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि ‘तुम कांग्रेस की विचारधारा के लिए समर्पित हो। मेरे खिलाफ प्रचार करने में संकोच मत करो। इसके बाद मैंने कांग्रेस के चुनाव प्रचार में जान लगा दी और गुलाबराव जेधे की जीत हुई।’

महज 27 साल की उम्र में शरद पवार 1967 में बारामती विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। पिछले 5 दशकों में शरद पवार 14 चुनाव जीत चुके हैं। शुरुआती दिनों से ही शरद एक समझदार पॉलिटीशियन रहे हैं।
पवार ने राजनीति में एक्टिव होने के बाद देखा था कि कांग्रेस नेता वसंत राव पाटिल को CM की कुर्सी तक पहुंचाने में सहकारी संस्थाओं ने अहम भूमिका निभाई थी। इसीलिए पवार ने 1980 के दशक के अंत से सहकारी संस्थाओं पर कंट्रोल करने की कोशिश शुरू कर दी।
इसके बाद ही पवार ने दुग्ध संघों, सहकारी चीनी और कपड़ा मिलों, जिला बैंकों और चीनी और अन्य मिलों को ऋण प्रदान करने वाले शीर्ष बैंक महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (MSCB) पर नियंत्रण हासिल करके अपने राजनीतिक साम्राज्य का विस्तार किया।
38 साल के पवार इंदिरा को चुनौती देकर बने सबसे युवा मुख्यमंत्री
साल 1978 की बात है। कांग्रेस पार्टी दो हिस्से में बंट गई- कांग्रेस (इंदिरा) और कांग्रेस (रेड्डी)। हरिदेव जोशी, शरद पवार जैसे नेता कांग्रेस (रेड्डी) में ही रह गए। मार्च 1978 में महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए। किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। जनता पार्टी को सरकार बनाने से रोकने के लिए दोनों कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई।
नई सरकार में कांग्रेस (रेड्डी) गुट के वसंतदादा पाटिल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस सरकार में शरद पवार पहली बार उद्योग मंत्री बने। सरकार बनने के बाद दोनों ही गुटों के नेता एक दूसरे के खिलाफ बयान देने लगे। सरकार में विवाद बढ़ने से ज्यादातर मंत्रियों के लिए असहज स्थिति होने लगे।
अभी सरकार के बने 4 महीने ही हुए थे कि 12 जुलाई को शरद पवार ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। शरद पवार ने कहा कि इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी के समर्थन से सरकार चलाना सही नहीं लग रहा है। सीनियर जर्नलिस्ट मिन्हाज मर्चेंट ने अपने आर्टिकल में दावा किया कि मुख्यमंत्री बनने की शरद पवार की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने उन्हें इस गठबंधन सरकार को तोड़ने के लिए उकसाया।
इसके बाद पवार ने कांग्रेस के 40 विधायकों को तोड़कर जनता पार्टी, पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और CPM की मदद से एक सरकार बनाई। 288 सीटों वाली विधानसभा में शरद के साथ 180 विधायक थे। इस तरह सिर्फ 38 साल की उम्र में शरद पवार मुख्यमंत्री बन गए। उनके CM बनने के बाद बिजनेसमैन जेआरडी टाटा ने कहा था, ‘एक दिन यह लड़का प्रधानमंत्री बनेगा।’ 1978 तक उनसे पहले इतनी कम उम्र में देश का कोई नेता मुख्यमंत्री नहीं बन पाया था।

शरद पवार के इस फैसले ने एक तरह से इंदिरा गांधी को चुनौती दी। 2 साल बाद 1980 में 353 सीट जीतकर इंदिरा गांधी एक बार फिर देश की प्रधानमंत्री बनीं। PM बनते ही इंदिरा ने फरवरी 1980 में आर्टिकल 356 के जरिए महाराष्ट्र समेत 9 राज्यों की सरकार को बर्खास्त कर दिया। ये सभी वो राज्य थे, जहां इंदिरा के विरोधी दलों की सरकार थीं।
सरकार बर्खास्त करने के पीछे की वजह इन राज्यों में नरसंहार और कमजोर कानून व्यवस्था को बताया गया। इस तरह पहली बार CM बने शरद पवार की सरकार गिर गई।
मोरारजी के कहने पर खुद का पेशाब पीते थे शरद पवार
अपनी किताब ‘ऑन माय टर्म्स’ में शरद पवार ने बताया है कि ‘1977 में मोरारजी देसाई देश के PM बने थे। अपने कार्यकाल में वो महाराष्ट्र के दौरे पर आए। एयरपोर्ट पर मैं भी उनके साथ था। हम लोग शराबबंदी के मुद्दे पर बात कर रहे थे। उसी समय मेरे सीने में कुछ दर्द हुआ तो मैंने अपना हाथ सीने पर रख लिया। मोरारजी ने कहा कि तुम शिवाम्बू थेरेपी करो। इससे सही हो जाओगे। शिवाम्बू थेरेपी में लोग अपना ही पेशाब पीते है।’
कुछ दिनों बाद जब मोरारजी और पवार मिले तो पवार ने कहा कि ‘मैंने आपके बताए मुताबिक शिवाम्बू थेरेपी शुरू कर दी है। अब पहले से आराम है। इतना सुनते ही मोरारजी खुश हो गए।’

कांग्रेस में शामिल हुए, फिर सोनिया को विदेशी बताकर अलग पार्टी बनाई
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद शरद पवार श्रद्धांजलि देने दिल्ली पहुंचे थे। महाराष्ट्र लौटने से पहले उनकी मुलाकात राजीव से हुई। राजीव उस वक्त प्रधानमंत्री थे। उन्होंने शरद से कांग्रेस जॉइन करने का आग्रह किया। शरद ने थोड़ा वक्त मांगा और वापस महाराष्ट्र लौट गए।
2 साल बाद 1986 में शरद पवार कांग्रेस में शामिल हुए और 26 जून 1988 से लेकर 25 जून 1991 के बीच दो बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। 1991 में राजीव की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए भी उनका नाम उछला, लेकिन सोनिया गांधी के समर्थन वाले पीवी नरसिम्हा राव ने बाजी मार ली।
कांग्रेस नेताओं के कहने पर 1997 में सोनिया गांधी ने कोलकाता अधिवेशन में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ली। सदस्यता लेने के कुछ दिनों बाद ही 14 मार्च 1998 को सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन गईं।

15 मई 1999 की बात है। दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यालय 24 अकबर रोड पर CWC की बैठक होती है। बैठक के बीच में ही सफेद गद्दे पर लेटे हुए शरद पवार वहां मौजूद पीए संगमा को देखकर मुस्कुराते हैं। शरद की यह मुस्कुराहट पार्टी में विद्रोह के लिए हरी झंडी थी। कुछ देर बाद संगमा बैठक में सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हैं। संगमा की बात सुनकर सोनिया ‘हक्का-बक्का’ रह गईं।
संगमा अभी बैठे ही थे कि पवार बोलने लगे सोनिया गांधी ने पार्टी में अध्यक्ष के तौर पर अच्छा काम किया है। हालांकि, विदेश में पैदा होने की वजह से विपक्षी पार्टी जब ये मुद्दा उठाएगी तो कांग्रेस इसका मुकाबला नहीं कर पाएगी। तारिक अनवर ने भी संगमा और शरद का समर्थन किया।
इस विरोध के बाद सोनिया ने एक कांग्रेस कार्य समिति को भावुक पत्र लिखकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सोनिया ने अपने पत्र में लिखा, ‘भले ही मेरा जन्म विदेशी धरती पर हुआ, लेकिन मैंने भारत को अपना देश चुना है। मैं आखिरी सांस तक भारतीय ही रहूंगी। भारत मेरी मातृभूमि है, मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है।’
पूर्व केंद्रीय मंत्री केवी थॉमस अपनी किताब- ‘सोनिया- द बिलवेड ऑफ द मासेस’ में लिखते हैं कि पवार की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी, उन्हें लगता था कि सोनिया प्रधानमंत्री बनीं तो उनके प्रधानमंत्री बनने का सपना कभी पूरा नहीं होगा। इसीलिए उन्होंने सोनिया को विदेशी मूल का बताकर उन्हें PM बनने से रोकने की कोशिश की।

सोनिया के समर्थन में दिग्विजय सिंह, शीला दीक्षित, अशोक गहलोत और गिरिधर गमांग जैसे बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने भी अपना इस्तीफा दे दिया। सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता भूख हड़ताल करने लगे। सोनिया से इस्तीफा वापस लेने की मांग कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से जोर पकड़ने लगी।
आखिरकार 20 मई 1999 को CWC ने शरद पवार, संगमा और अनवर को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया। तीनों नेताओं ने मिलकर 1999 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी NCP का गठन किया।
जब 64 साल के शरद को पता चला कि सिर्फ 6 महीने जिंदा बचेंगे
साल 2004 की बात है। लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही शरद पवार चुनाव की तैयारी में लग गए। शरद अपनी किताब ‘अपनी शर्तों पर: जमीनी हकीकत से सत्ता के गलियारों तक’ में लिखते हैं कि एक रोज चुनाव प्रचार के समय शरद के मुंह में तेज दर्द होने लगा। मैंने अपने पर्सनल डॉक्टर रवि बापटे से इसकी शिकायत की।
उन्होंने मेरा मुंह खुलवाकर देखा और फिर कुछ सामान्य जांच की। इसके बाद उन्होंने कहा कि मुझे फौरन मुंबई लौटना होगा। मुंबई में जांच के बाद कंफर्म हो गया कि मुझे मुंह का कैंसर है।
इसके बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में मेरे एक गाल की सर्जरी हुई। मेरे जांघ से मांस निकालकर वहां लगाया गया। मेरे सारे दांत निकाल दिए गए। जबड़े को हिलने से रोकने के लिए बड़ा सा कपास का गोला मेरे मुंह में रखा गया।
इस दर्दनाक वक्त को याद करते हुए शरद ने लिखा कि ऑपरेशन के कुछ दिनों बाद एक नौजवान डॉक्टर मेरा इलाज कर रहा था। मेरी डॉक्टरी रिपोर्ट चेक करते हुए उसने कहा कि अब आप सिर्फ 6 महीने के मेहमान हैं। मैंने उससे कहा कि मैं तुमसे भी ज्यादा समय तक जिंदा रहूंगा! इस ऑपरेशन के बाद शरद पवार का मुंह हल्का टेढ़ा हो गया।
शरद बताते हैं कि लंबे समय तक उन्हें अस्पताल और डॉक्टरों के बीच रहना होता था। मेरे चुनाव प्रचार से हटने के बाद तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं। इसके बाद हमने अस्पताल में ही पूरे देश के NCP के बड़े नेताओं की बैठक बुलाई। परिणाम ये हुआ कि महाराष्ट्र में NCP की टिकट से जीतकर 9 लोग संसद बने। शरद पवार केंद्रीय कृषि मंत्री बने।

5 साल बाद ही NCP पर हावी होने लगा शरद पवार का परिवार
NCP बने करीब 5 साल हो गए थे। भतीजे अजित पवार पार्टी में शरद के बाद नंबर दो नेता की हैसियत रखते थे। 2004 विधानसभा चुनाव में NCP ने कांग्रेस से 2 सीटें ज्यादा जीती थीं। इसके बावजूद शरद पवार ने CM पद कांग्रेस को दे दिया था। अजित ने कहा कि शरद ने उन्हें CM बनने से रोकने के लिए ये फैसला लिया।
2009 में दोबारा ऐसी स्थिति आई जब अजित पवार डिप्टी CM बनना चाहते थे, लेकिन शरद ने छगन भुजबल को डिप्टी CM बनवा दिया। शरद ने डिप्टी CM नहीं बनाने पर पार्टी छोड़ने की धमकी दी। आखिरकार अजित के आगे शरद को झुकना पड़ा और 2010 में उन्हें डिप्टी CM बनाया गया।
तीसरा मौका 2019 में आया, जब अजित पवार ने पार्टी छोड़ने की धमकी दी। 22 नवंबर 2019 को मुंबई में उद्धव ठाकरे और शरद पवार के बीच 40 मिनट की बैठक हुई। इस बैठक के बाद अखबारों में हेडलाइन छपी कि उद्धव ठाकरे राज्य के नए CM बनाए जा सकते हैं।
23 नवंबर की सुबह अचानक खबर आई कि शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने 12 विधायकों के साथ BJP को समर्थन दे दिया है। सुबह-सुबह फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने डिप्टी CM की शपथ ले ली।
इस घटना के बाद शरद पवार ने कहा कि ये कोई नई बात नहीं है, मैंने कई मौकों पर ये सब देखा है। शरद के इस बयान से साफ था कि पहले भी उन्होंने ऐसी बगावत देखी है और इसे रोकना उनके लिए मुश्किल नहीं है।
शरद पवार ने अपनी मराठी आत्मकथा ‘लोक माझे संगति’ में इस घटना का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि 2019 में जब अजित पवार बागी हुए तो उनके साथ बागी हुए ज्यादातर पार्टी के विधायक उनके संपर्क में थे। अजित को वापस लाने की जिम्मेदारी मेरी पत्नी प्रतिभा पवार ने खुद अपने कंधों पर ले रखा थी।
शरद ने बताया कि अजित और प्रतिभा के बीच काफी अच्छे रिश्ते थे। प्रतिभा कभी राजनीतिक मामलों में नहीं पड़ीं, लेकिन पहली बार उसने मोर्चा संभाला। आखिर में अजित वापस लौटे और अपनी गलती के लिए माफी मांगी। ये मेरे लिए काफी था।
इस तरह शरद पवार ने 12 विधायकों के साथ बगावत करने वाले अपने भतीजे की बाजी को पलट दिया। इस घटना से साफ हो गया कि NCP मतलब पवार परिवार और पवार परिवार मतलब NCP है।

बेटी को पार्टी अध्यक्ष बनाते ही अजित ने चौथी बार कर दी बगावत
‘1 मई 1960 से 1 मई 2023 तक सार्वजनिक जीवन में लंबा समय बिताने के बाद अब मुझे थोड़ा ठहरने की जरूरत है। इसीलिए मैंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद को छोड़ने का फैसला किया है।’
2 मई 2023 को ये बात शरद पवार ने मुंबई के वाईबी चव्हाण सेंटर में कही। शरद पवार के इतना कहते ही NCP के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल, जितेंद्र अवहाद जैसे सीनियर नेता भावुक हो गए। वाईबी चव्हाण सेंटर में ही नेता और कार्यकर्ता धरने पर बैठ गए।
अजित पवार मंच पर आए और उन्होंने कहा कि शरद पवार अपने इस्तीफे के फैसले पर फिर से विचार करेंगे। करीब एक महीने बाद 10 जून को शरद पवार ने बेटी सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का नया कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। शरद के इस फैसले से अजित पवार नाराज हो गए।
ठीक 2 महीने बाद 2 जुलाई 2023 को अजित पवार ने 8 विधायकों के साथ की अपनी NCP पार्टी से बगावत कर दी। शिंदे सरकार में डिप्टी CM बनने वाले अजित पवार ने NCP पर अपना दावा ठोक दिया है। 29 साल पहले बनी NCP पार्टी टूट के कगार पर पहुंच गई है। अजित पवार ने 40 से ज्यादा विधायकों के समर्थन होने का दावा किया। चुनाव आयोग ने 6 फरवरी 2024 को कहा कि अजित पवार गुट ही असली NCP है।
6 महीने तक चली 10 सुनवाई के बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न घड़ी अजित गुट को दे दिया गया। इसके बाद आयोग ने शरद पवार के गुट के लिए NCP शरद चंद्र पवार नाम दिया। इस पार्टी का चुनाव चिन्ह तुतारी है। इस तरह NCP पार्टी टूटकर दो हिस्सों में बंटी तो दोनों पार्टी की कमान पवार परिवार के ही हाथ में रही।

अब जब पार्टी बंट गई है तो आगे जनता किसका साथ दे सकती है..
पूर्वी महाराष्ट्र यानी विदर्भ के 11 जिले लोकसभा में 10 सांसद भेजते हैं। वहीं, पश्चिम महाराष्ट्र के 5 जिलों में ही लोकसभा की 10 सीटें हैं। ये सीटें हैं पुणे, मावल, शिरूर, बारामती, सतारा, कोल्हापुर, सांगली, हातकलंगले, माढ़ा और सोलापुर (SC)।
2019 में भाजपा ने चार सीटों पर कब्जा किया था, जबकि शिवसेना व NCP को तीन-तीन सीटें मिली थीं।
इस बार 2024 लोकसभा चुनाव में मराठा क्षत्रप शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के बीच असली जंग है। बारामती सीट से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के सामने अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार चुनाव लड़ रही हैं।
महाराष्ट्र के सीनियर जर्नलिस्ट उमेश घोनगड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स, पॉलिटिकल कल्चर और पार्टियों में शरद पवार की जगह सबसे ऊंची है। पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा के कोऑपरेटिव सेक्टर में उनकी मजबूत पकड़ है। 40 साल से शरद पवार का शुगर लॉबी पर होल्ड है। ये शुगर लॉबी कई सीटों पर असर डालती है। ऐसे में शरद को कमजोर करना इतना आसान नहीं है।’

पार्टी में टूट के बाद NCP के एक सीनियर नेता नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘राजनीति में कुछ भी हो सकता है। जनता तय करती है कि किसे वोट देना है। मेरा मानना है कि बारामती के लोगों का शरद पवार और सुप्रिया सुले के साथ एक अलग तरह का रिश्ता है। वे भरोसा नहीं तोड़ेंगे।’
वहीं, अजित गुट के नेता और महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री मानते हैं कि शरद पवार के साथ लोगों को एक तरह का जुड़ाव है। साथ ही वह कहते हैं कि ये भी सच है कि जब बात क्षेत्र में काम करने या लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाने की हो तो इस मामले में अजित को कोई भी हरा नहीं सकता है।
