पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “चैत्रे मासे जगद ब्रह्म संसर्ज प्रथमेsहनि।’
सर्वविध आह्लादकारी बसंत ऋतु के साथ प्रकृति में सर्वत्र नावीन्यता एवं उल्लास को अभिव्यक्त करती हुई सृष्टि निर्माण की आद्य बेला वैदिक हिन्दू नववर्ष, नूतन संवत्सर 2081 की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
“नव उल्लास, नव विचार, नवोत्साह, नव उमंग, नव ऊर्जा, नव संवत्सरोयं शुभं भवतु ..!” नव संवत्सर का यह सूर्य आपके सकल भ्रम, भय व अल्पता का भंजन कर जीवन को शुभता, साधन-सम्पन्नता और दिव्यता से युक्त बनायें ! चैत्र नवरात्रि अपनी शक्तियों की अभिवृद्धि करने का पवित्र पर्व है । यह शक्ति (देवी दुर्गा) की उपासना करने की पावन बेला है, जिसका अर्थ है – शक्ति और मंत्र जाप, ध्यान, सात्विक जीवनशैली का पालन, प्रार्थना और यज्ञ के माध्यम से माँ का आशीर्वाद प्राप्त करना। माँ ही आद्यशक्ति है, सर्व गुणों का आधार, राम-कृष्ण, गौतम, कणाद आदि ऋषि – ऋषिकायों, वीर-वीरांगनाओं की जननी है। माँ ही पराशक्ति है, इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। उनके बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। माँ पराम्बा ही भक्ति और आन्तरिक शक्ति के रूप में आपके भीतर विद्यमान है। उस शक्ति का सम्मान करें और आन्तरिक संतुलन लाकर उसे बढ़ाने का प्रयास करें। ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड में साँस लेने वाले प्रत्येक तत्व में शक्ति का संचार किया है। एक छोटा सा बीज भी परिवर्तन की अद्भुत शक्ति से परिपूर्ण है। समय के साथ बीज एक पौधे के रूप में विकसित होता है, सुगन्ध और मिठास से भरे फूल और फल देता है। तो एक छोटे से बीज में बहुत बड़ी शक्ति प्रकट होती है। कुछ बीजों में मीठी सुगन्ध के साथ सुन्दर फूल बनने की शक्ति होती है, जबकि कुछ में कड़वे फल बनने की क्षमता होती है। कुछ बीज आपके मुख में मीठा स्वाद छोड़ने की शक्ति रखते हैं और कुछ विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसी महान शक्तियाँ मनुष्य में भी विद्यमान हैं। चैत्र नवरात्रि के पावन बेला में अपनी शक्ति को जागृत करने के प्रयास में दिव्य शक्ति की पूजा करें। इस शक्ति को अपने आन्तरिक संसार में शिव के साथ संगम बनाएँ, और फिर इसका उपयोग अपने आत्म-विकास के लिए करें। जब कोई अपनी अंतर्निहित क्षमता का उपयोग करना सीखता है, तो यह अविश्वसनीय परिणाम लाता है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – “माँ” यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम−रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। “माँ” वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। “माँ” की ममता और उसके आँचल की महिमा को शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। माँ केवल आसमान में कहीं स्थित नही हैं, उसे कहते हैं कि “या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयते …” – अर्थात्, “सभी जीव-जन्तुओं में चेतना के रूप में ही माँ देवी तुम स्थित हो”। नवरात्रि माँ के अलग-अलग रूप को निहारने का सुन्दर त्योहार है। जैसे कोई शिशु अपनी माँ के गर्भ में 9 महीने रहता है, वैसे ही हम अपने आप में, परा प्रकृति में रहकर – ध्यान में मग्न होने का इन 9 दिनों का महत्व है। वहाँ से फिर बाहर निकलते हैं तो सृजनात्मकता का प्रस्सफुरण जीवन में आने लगता है। माना जाता है कि नवरात्र में किए गए प्रयास, शुभ-संकल्प बल के सहारे देवी दुर्गा की कृपा से सम्पूर्ण होते हैं। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि जितने भी राक्षसी प्रवृति हैं, उसका हनन करके विजय का उत्सव मनाते हैं। हर एक व्यक्ति जीवनभर या पूरे वर्षभर में जो भी कार्य करते-करते थक जाते हैं तो इससे मुक्त होने के लिए इन 9 दिनों में शरीर की शुद्धि, मन की शुद्धि और बुद्धि में शुद्धि आ जाए, सत्व शुद्धि हो जाए; इस तरह के शुद्धिकरण करने का, पवित्र होने का त्योहार है – यह नवरात्रि …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – नवरात्रि अर्थात् देवी की नवधा शक्ति जिस समय एक महाशक्ति का रूप धारण करती है, उसे ही नवरात्रि कहते हैं। नवरात्रि नवनिर्माण के लिए होती है, चाहे आध्यात्मिक हो या भौतिक। आदिकाल से ही मनुष्य की प्रकृति शक्ति साधना की रही है। शक्ति साधना का प्रथम रूप दुर्गा ही मानी जाती है। मनुष्य तो क्या देवी-देवता, यक्ष-किन्नर भी अपने संकट निवारण के लिए मॉ दुर्गा को ही पुकारते हैं। हमारे देश में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में ही उद्बोधित किया गया है – “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वम् मम देव देव …”।। हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियाँ, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बाद भी ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनन्त महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है …।