यह पहली दीवाली नहीं है कि अमावस्या तिथि दो दिन पड़ रही है 15-20 साल में यह संयोग बनता रहता है। भारतीय पंचांग चंद्रमा की गणना से बनता है। ज्योतिषाचार्य हजारों सालों से यह गणना बिना केलकुलेटर और कम्प्यूटर से करते आ रहे हैं। उनकी यह गणना केलकुलेटर और कम्प्यूटर से भी ज्यादा शुद्ध होती है। जिस कारण तिथियां दो दिन हो जाती हैं। गांव या शहर के मंदिरों के पुजारी जो तिथि बता देते हैं उस तिथि पर लोग त्योहार मना लेते हैं। ऐसा कहीं नहीं होता कि आधा गांव एक दिन मनाये फिर आधा गांव दूसरे दिन। लेकिन इस दीवाली की दो दिन पड़ने वाली अमावस्या तिथि को न्यूज़ चैनल वालों ने कुछ इस तरह से पेश कर दिया कि यह सब पहली बार हो रहा है। और चैनल पर ज्योतिषाचार्यों की ही बहस करा दी। शायद न्यूज़ चैनल वालों का मकसद भारतीय पंचांग की हंसी उड़ाना रहा है। तो भाइयों पूरा गांव या शहर के गणमान्य लोग मंदिरों में जाकर तय कर लें कि किस दिन दीवाली मनानी है। क्योंकि दीवाली का आनंद तो तभी है जब पूरा गांव और शहर के लोग एकसाथ दीवाली मनाये। और हां पूजा के बाद आतिशबाजी जरूर करें जो पर्यावरण का ज्ञान पेले उसके पिछबाड़े पर एक रस्सी बम फोड़ दें। शुभ दीपावली

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