शराब पीकर अंधा हो गया
सतेंद्र महतो एक हाथ से टटोलते हुए कुर्सी पर बैठने की कोशिश में हैं। इतने में उनकी पांच साल की बेटी गौरी दूसरा हाथ पकड़कर उन्हें कुर्सी पर बिठाती है। गौरी के सांवले रंग के चलते सतेंद्र प्यार से उससे कभी संवरकी तो कभी करियट्ठी कहते हैं। सतेंद्र बिहार के जिस हिस्से (छपरा) में रहते हैं, वहां संवरकी का मतलब सांवले रंग से है।
मैं कुछ बोलता उससे पहले सतेंद्र कहते हैं…
जब से दिखाई देना बंद हुआ है, ये करियट्ठी ही मेरी आंखें है। सांवली थी तो नाम संवरकी रख दिया। दुख तो इस बात का है कि अब इसका चेहरा भी नहीं देख सकता।

35 साल के सतेंद्र महतो बिहार में छपरा के रहने वाले हैं। सतेंद्र और इनके जैसे कई लोगों की एक दिन अचानक आंखों की रोशनी चली गई।
सतेंद्र ने दिसंबर 2022 में जहरीली शराब पी थी। साथ पीने वाले कई लोगों की तो जान तक चली गई। एक महीने सतेंद्र भी अस्पताल में भर्ती रहे। आखिरी में डॉक्टर ने कह दिया कि आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई है, अब कभी देख नहीं पाएंगे।
बीते सप्ताह बिहार में शराब पीने से 36 की मौत हो गई और 7 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई। इस बार के ब्लैकबोर्ड के लिए ऐसे ही कुछ लोगों से मिलने छपरा पहुंचा हूं, जिन्होंने जहरीली शराब पीकर अपनी आंखों की रोशनी गंवा दी।
बिहार में शराब पर बैन है। बेचना, खरीदना और पीना सबके लिए जेल होती है। लेकिन, ये तीनों ही काम धड़ल्ले से हो रहे हैं। सरकार शराब पीकर जान गंवाने वाले लोगों के परिजन को मुआवजा दे रही है। लेकिन, आंख की रोशनी खोने वालों को कुछ नहीं मिल रहा। बिहार में बीते तीन-चार साल में शराब पीकर आंख गंवाने वाले लोगों में से सतेंद्र भी एक हैं।
मुझे सतेंद्र से मिलना है। छपरा की बहरौली पंचायत के चौराहे पर खड़े लोगों से उसका पता पूछा तो उन्होंने कहा, वही सतेंद्र न जो दो साल पहले शराब पीकर अंधा हो गया।
मेरे हां कहते ही उन्होंने खेत से जाती पगडंडी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये रास्ता पकड़ लीजिए, सीधे उसके घर पहुंच जाएंगे। पगडंडी के सहारे कुछ ही देर में सतेंद्र की झोपड़ी के सामने पहुंच गया। यहां उसके दादाजी से मेरी मुलाकात हुई।
पूछने पर कहते हैं, ‘उसकी मां खेत गई हैं। वो नदी तक गया है। दिन भर यहीं चौकी पर लेटा रहता है। कभी-कभी गांव के लड़के उसे लेकर चले जाते हैं। वो मछली मारते हैं, ये किनारे पर बैठा रहता है।’

इतने में सतेंद्र की मां कमली देवी आ गईं। कुछ देर बाद सतेंद्र भी आ गए। 12 दिसंबर 2022 तक वे बिलकुल ठीक थे। एक-दो दिन बाद गांव में शादी थी। आगे की कहानी सतेंद्र ने ही बताई…
‘गांव में जिनके यहां शराब पी, उनके घर जब भी कोई कार्यक्रम होता, काम करने जाता था। उस दिन जनेऊ था। पूरे दिन काम करने के बाद शाम को बताया गया कि आज ‘बेवस्था’ है। उन लोगों ने अंग्रेजी शराब पी और मुझे शराब का एक पाउच दे दिया।
पाउच पीकर सो गया। सुबह उठा तो सिर भारी और पेट में जलन होने लगी। शौच के लिए गया तो उल्टियां शुरू हो गईं। करीब आधे घंटे बाद घर पहुंचा और गिर गया। जब होश आया तो कुछ दिख ही नहीं रहा था।
सब घबरा गए। मां मशरक (स्थानीय कस्बा) के अस्पताल लेकर गईं। एक लाख रुपए खर्च हो गए। लेकिन, इस बात का सुकून था कि आंखों से फिर से दिखने लगा। डॉक्टर ने कहा था कि आंखों का बहुत ध्यान रखना है। क्या करते किस्मत में तो ये अंधापन ही लिखा था, भुगत रहे हैं और जिंदगी भर भुगतेंगे।’

आंख की रोशनी जाने और वापस आने के बीच सतेंद्र की पत्नी की मौत हो गई। वे कुछ कहते इससे पहले ही उनकी मां कहती हैं….
‘बहू की जान तो सदमे में चली गई। दो बेटी पहले से थीं। तीसरी भी बेटी ही हुई। बहू ने मेरे सामने ही नवजात बेटी को थप्पड़ मारकर बोली- मेरे नसीब में बेटी ही लिखी है क्या? मैंने कहा भी कि जैसे दो पाली-पोसी हैं, वैसे ये भी पल जाएगी। सदमे में अगले दिन उसकी जान चली गई। ये इतना रोया कि जो रोशनी आई थी वो चली गई। तीन लाख रुपया खर्च हुए। खेत बेच कर इलाज कराया लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ।’
मां के चुप होते ही सतेंद्र मेरी आवाज सुन अपना चेहरा मेरी तरफ करते हुए कहते हैं…
उस रोज बहुत रोया। अगले दिन से दिखना बंद हो गया। मां ने एक बेटी बहन के यहां भेज दी और दूसरी मौसी के यहां। बीच वाली बेटी साथ रहती है, मेरे हर काम में वो ही मदद करती है।

सतेंद्र के घर से करीब दो किलोमीटर की दूर गांव का दूसरा छोर है। यहां बनिया बस्ती है। चौराहे पर 38 साल के शंकर शाह जनरल स्टोर है। शराब से इनकी भी आंखों की रोशनी चली गई। पत्नी सरिता दुकान संभालती हैं।

दुकान के बाहर चौकी पर शंकर शाह बैठे हैं। दूसरी तरफ टीन शेड के सहारे एक पोस्टर लगा है- राधा रानी जनरल स्टोर। किनारे लिखा है, प्रोपराइटर- शंकर जी। पोस्टर पर शंकर की तस्वीर देखते बनती है। घने और करीने से काढ़े गए बाल और ठुड्डी के पास हाथ रखकर शंकर ने बहुत शौक से यह तस्वीर खिंचाई होगी। लेकिन, अब वो न तो अपनी तस्वीर देख सकते हैं और न ही दुकानदारी।
पूरे दिन दुकान के बाहर बैठे रहते हैं। पूछने पर कहते हैं…
आहट होती है तो समझ जाते हैं ग्राहक आया है। बोलने पर पहचान भी जाते हैं। मन करता है कि एक बार चेहरा भी देख लेते। बचपन से मेहनत करते रहे और जवानी में अंधे हो गए।

गुजरात की सूत मिल में बीते 18 साल से काम कर रहे शंकर शाह छुट्टी लेकर सूरत से घर आए थे। गांव में शादी-ब्याह का माहौल था। शंकर की इच्छा हुई कि शराब पी जाए और उन्होंने तीन अलग-अलग बैठक में शराब पी। घर आए और अगले दिन पूरे इलाके से मौत की खबरें आने लगीं।
शंकर कहते हैं कि उस दिन सुबह से उल्टी-दस्त होने लगे। पुलिस सरकारी हॉस्पिटल ले गई। पत्नी और बच्चों ने प्राइवेट अस्पताल ले गए। तीन महीने इलाज चला, लेकिन रोशनी नहीं लौटी। नेपाल तक जा कर आंख दिखा चुके हैं।

बातचीत के बीच शंकर की पत्नी सरिता चाय लाती हैं। कप पकड़ते समय थोड़ी सी चाय शंकर के हाथ पर छलक गई। वे सरिता पर गुस्सा होने लगे। सरिता भी गुस्से से कुछ कहना चाहती है लेकिन बोलती कुछ नहीं।
थोड़ी देर बाद सरिता कहती हैं, ‘कहीं आना-जाना मुश्किल है। रिश्तेदार पहले पूछते भी थे तो अब कोई झांकने नहीं आता। सबको लगता है कि पैसा मांग लेंगे। दो लाख का कर्ज हो गया था, 80 हजार का बचा है। रोज कमाना रोज खाना है, क्या करें कुछ समझ नहीं आता।
आपने शराब पीने से मना नहीं किया के जवाब में सरिता कहती हैं…
बोल ही तो सकती हूं। कहती रहती थी, मत करिए। आज देखिए, क्या हालत हो गई है।

सरिता बताती हैं कि जब से पति शंकर की आंख की रोशनी गई है, कलह बढ़ गया है। शंकर बात-बेबात मर जाने कहते हैं। कल ही झगड़ा हो गया। दुकान के भीतर थी और ये बाहर बैठे थे। किसी को कुछ सामान देने में देरी हुई तो ये खुद ही देने के लिए उठ गए। बोल दिया कि दिख नहीं रहा है तो बैठे रहिए। उस पर ये कहने लगे कि मर गए होते तो अच्छा था।
सरिता की बात सुनते ही शंकर बीच में बोल पड़े। कहने लगे, ‘यही सब होता है। न चाहते हुए भी दो बात बोल देता हूं, किसको बोलूं? अब तो हर कोई कुछ न कुछ कह जाता है।’
मशरक थाना क्षेत्र में इसी महीने फिर शराब से मौतें हुई हैं। कुछ लोग फिर से अंधे हुए हैं। साल 2021 में शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक बिहार भर में तकरीबन 250 लोगों की जान गई है। इसके अलावा भी दर्जनों हैं जो देख नहीं सकते।

2022 के दिसंबर में कच्ची शराब पीने से सचिन की भी आंखों की रोशनी चली गई। सचिन 29 साल के हैं।
यहां पहुंचते ही सचिन के बारे में पूछा, उनकी पत्नी राधिका ने बताया कि वे थोड़ी दूरी पर ताश खेलने वालों के बगल में बैठे हैं। वे सचिन को लेने चली जाती हैं।
घर के नाम पर फूस की झोपड़ी है। दस साल से कम उम्र के दो बच्चे और पत्नी हैं। सचिन दो साल बाद एक भी काम खुद नहीं कर पाते।
राधिका हाथ पकड़कर सचिन को एक तरह से खींचते हुए लाती हैं। उनकी चाल से लग रहा है कि वे डर से रहे हैं।

सचिन बैठते ही कहते हैं, ‘अब तो दिन और रात समझ नहीं आती। सिर दुखने लगता है तो पता चलता है कि नींद पूरी नहीं हुई। हर काम के लिए सहारा चाहिए। सारे सपने धरे रह गए। घर बनवाना था, पत्नी के साथ घूमना था। मोटरसाइकिल लेनी थी। 80 साल के पिता हैं, कमा कर लाते हैं तो खर्च चलता है। जीते जी मरे जैसा हो गया हूं।’
सचिन की पत्नी राधिका कहती हैं…
हमारी जोड़ी को नजर लग गई। रंग-रूप देखकर ननद कहती थीं, हीरोइन की तरह दिखती हूं। पड़ोस के लोग कहते थे बहुत सुंदर जोड़ी है।

हम रात को बात करते थे कि घर बनवाएंगे, गाड़ी लेंगे। रिश्तेदारों को लेकर हम लोगों ने सोचा था कि कोई आए चाहे नहीं लेकिन हम सबके यहां जाएंगे। अब क्या कहें। मौत से बदतर हमारी जिंदगी है।
आज खाना बन गया तो कल क्या होगा सोचना पड़ता है। किसी के घर चूल्हा-चौका करती हूं तो एक वक्त का खाना मिल जाता है। कभी-कभी तो बच्चों को बिस्किट खिला कर सुलाती हूं।
आप आए हैं, मगर चाय भी नहीं पूछ सकती।

आखिर में शराबबंदी के सवाल पर सचिन ने बहुत साफ शब्दों में कहा, ‘अगर बंद होती तो मिलती कैसे? हमारे पास इतना पैसा नहीं था कि अंग्रेजी (शराब) पीते। खेत में पानी चला रहे थे, ठंड लग रही थी। पांच लोगों ने 40-40 रुपए इकट्ठा किए और मंगा ली। किसी को पता होता तो क्यों पीते। उनमें से चार तो मर गए। एक हम बचे हैं जो अंधे हो गए।’
सरकार चाहती है कि शराब बिके नहीं तो बिकती कैसे है?
पति के मुंह से सरकार सुनते ही राधिका बीच में बोल पड़ीं, ‘हम इनको अस्पताल ले गए तो पानी चढ़ाने लगे। सुबह चार बजे ले गए थे और अगले दिन शाम के चार बजे तक बस दो बोतल चढ़ी। आंख की रोशनी तब तक थी। रात को और कम हो गई और अगले दिन से दिखना बंद हो गया।’
हम सरकारी हॉस्पिटल से प्राइवेट में ले गए। अपने गहने बेचकर इलाज कराया, लेकिन तब तक रोशनी जा चुकी थी।
राधिका का गुस्सा उनकी आंखों में छलक गया। बगल में कुर्सी पर बैठे सचिन राधिका की तरफ अपनी गर्दन घुमाते हैं और चुप होने इशारा कर देते हैं। हमारी बातचीत यहीं खत्म हो जाती है।
