पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – जीवन का प्रत्येक पल अनन्त सम्भावनाओं से आपुरित है। हम जैसे ही शुभ संकल्प करते हैं; सकल दिव्यता प्रकट होने लगती है ..! शुभ संकल्पों का उदय ही दिव्य पुरुष के निकट पहुँचने का कारण है। प्रसन्नता, हमारे मष्तिष्क की ही प्रवृति है जो कि हर परिस्थिति में प्रसन्न रहने के दृढ़ संकल्प से उत्पन्न होती है। विश्वास के गर्भ से संकल्प का जन्म होता है। आपकी शक्ति आपके संकल्प में छिपी होती है, क्योंकि संकल्प ही आपकी दिशा और दशा तय करते हैं। आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य रचता है। पुरुषार्थ ही जीवन है। इसका अभाव ही मृत्यु है। पुरुषार्थहीन व्यक्ति जीवित रहते हुए भी मरे के ही समान होता है। शुभ संकल्प को पूर्ण करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए। पुरुषार्थ में जीवन की पूर्णता है। बाह्य पुरुषार्थ हमें समृद्धि की ओर जबकि आंतरिक पुरुषार्थ हमें समाधि के शिखर तक ले जाता है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – असफलता सिर्फ ये प्रमाणित करती है कि सफल होने के लिए हमारा संकल्प पर्याप्त दृढ़ नहीं था। कुछ चीज़ें परिश्रम और योग्यता के परे होती हैं। बड़े कार्य क्षमता से नहीं बल्कि दृढ़ता से सम्पन्न होते हैं। नींद और निन्दा पर जो व्यक्ति विजय पा लेते हैं, उन्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नही सकता। जीवन की सिद्धि और समाधान के लिए उन्नत विचार और पवित्र भावना ही हितकर है। जब हम निष्काम सेवा व साधना करते हैं, तो भगवान की तीन सबसे बड़ी विभूतियाँ हमें मिलती हैं। एक श्रेष्ठ, उन्नत, सात्विक, पूर्ण विवेकशील बुद्धि, मेघा या प्रज्ञा। दूसरी विभूति है, श्रेष्ठ बलवान व पूर्ण निरोगी शरीर तथा तीसरी विभूति है – श्रेष्ठ माता-पिता व समर्थ श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु का आश्रय। इस जन्म में श्रेष्ठ भोगों को भोगने से सौभाग्य का उदय नहीं होने वाला, अपितु जितना भी हम भोग भोगते हैं, उतने ही हमारे पुण्यों का क्षय हो जाता है। मनुष्य का मन अपूर्व क्षमतावान है, उसमें जो संकल्प जाग जाये, उनसे उसे विमुख करना बहुत कठिन कार्य है। इसीलिए सन्त-सत्पुरुष मन को शुभ व श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – हर कार्य संकल्प लेकर करना चाहिए, इससे सफलता अवश्य प्राप्त होती है। संकल्प में दृढ़ शक्ति होती है। जीवन में मनुष्य का संकल्प पवित्र और लक्ष्य बड़ा होना चाहिए। पुरुषार्थ ही जीवन का मूल मंत्र है। यही मनुष्य का सच्चा सहायक है। पुरुषार्थ सब अभावों की पूर्ति करता है। उद्यम अर्थात् पुरुषार्थ से ही सम्पूर्ण कार्य सफल होते हैं, मनोरथों से नहीं। किसी काम के बारे में कल्पना कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता, उसके लिए पूरी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे लोग जो अपने भाग्य या अवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं, वे असफलता की तैयारी और अपनी शक्तियों को कुँठित कर देने के सिवा कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते। जिसमें पूरी शक्ति से काम करने की दृढ़ लगन है, उसके मार्ग में चाहे कितना भी प्रबल विरोध का प्रवाह आये, वह उसकी गति को अवरुद्ध नहीं कर सकता, पीछे नहीं हटा सकता। आप आगे बढ़ने का प्रयत्न जितनी दृढ़ता के साथ करेंगे। सफलता उतनी ही आपके समीप आती जायेगी …।