*०प्रतिदिन विचार* (05/03/2024)*किसानी पर दोहरी मार* -राकेश दुबे 

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अपने अधिकार के लिए आंदोलनरत किसानों से प्रकृति भी खुश नहीं है पश्चिमी विक्षोभ के चलते मौसम में आए अप्रत्याशित बदलाव ने किसानों की लहलहाती फसलों की उम्मीदों पर पानी फेर दियाहै । देश और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में हुई बारिश-ओलावृष्टि ने गेहूं, चना, सरसों व सब्जियों आदि की फसलों की लगभग तैयार फसल को बिछा दिया। कभी आसमान की ओर देखकर बारिश की गुहार लगाने वाला किसान अब इस स्थिति से उबरने की प्रार्थना कर रहा है।

 

किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। मंडियों में गई सरसों की फसल भी बारिश से प्रभावित हुई है। आशंका जतायी जा रही है कि बारिश-ओलों से इस बार कुल उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस महीने के अंत तक कटने को तैयार सरसों की फसल का बीज व फूल तेज बारिश व ओले से गिरने की बात कही जा रही है। किसानों को आशंका है कि गेहूं की फसल की पैदावार घट सकती है और गेहूं का दाना काला पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर कई स्थानों पर बिजली गिरने से लोगों के मरने की भी खबरें हैं। लहलहाती फसल के बिछने से किसान अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहे हैं। किसान व विपक्षी दल यथाशीघ्र स्पेशल आनवारी कराकर मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं। फसलों के नुकसान का ब्योरा ई-क्षतिपूर्ति पोर्टल पर अपलोड करने का आग्रह किसानों से किया गया है। किसान संगठनों के नेता प्रति एकड़ पचास हजार रुपये मुआवजे की मांग कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि मौसम विभाग ने अब आसमान साफ रहने की उम्मीद जताई है।

 

वैसे से इतना साफ़ दिख रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग का संकट अब हमारे खेतों तक दस्तक देने लगा है। आमतौर पर इस मौसम में बारिश-ओलावृष्टि कम ही देखने को मिलती थी। कहा जा रहा है कि पश्चिमी विक्षोभ के चलते बादल नीचे आ गए हैं और उच्च स्तर पर तापमान कम हो गया है। जिसकी वजह से बादलों की नमी ओलों में बदल गई। बहरहाल, जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट से मुकाबले के लिये सरकार को गंभीर प्रयास करने की जरूरत है।

 

यूं तो ऐसे मौसम का सीधे तौर पर मुकाबला करना संभव नजर नहीं आता, लेकिन इससे बचाव के लिये किसानों को भी प्रेरित करना होगा। जिससे वे ऐसी फसलों का चयन कर सकें, जो मौसम की तीव्रता का सामना कर सकें। वहीं सरकारों को भी मौसमी अनिश्चितता से किसानों को राहत देने के लिये अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।

 

वे किसान जो क्षतिपूर्ति पोर्टल पर नुकसान की सूचना दर्ज नहीं करा पाते, उनके मुआवजे को लेकर उदारता पूर्वक विचार करना होगा। इसके अलावा जिन किसानों ने फसलों का बीमा करवाया है, उन किसानों को समय रहते बीमा राशि उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना भी जरूरी है। देश की खाद्य शृंखला को सुरक्षित बनाने के लिये यह नितांत जरूरी है। अन्यथा लगातार घाटे का सौदा बनती खेती से किसान का मोहभंग होते देर नहीं लगेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम चुनाव की तरफ बढ़ते देश में किसानों को राहत तुरत-फुरत मिल सकेगी।

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