मोहन राज में सुधरती शिक्षा व्यवस्था और गुरुकुल का डंडा?

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*मोहन राज में सुधरती शिक्षा व्यवस्था और गुरुकुल का डंडा?*

राजेन्द्र सिंह जादौन

कहते हैं कि शिक्षा समाज का आईना होती है, लेकिन अगर आईने में चेहरा ही विकृत दिखने लगे तो समझ लेना चाहिए कि समस्या चेहरे में नहीं, आईने में है। मध्यप्रदेश में इन दिनों शिक्षा व्यवस्था के सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। मंचों से भाषण दिए जाते हैं, योजनाओं की घोषणाएं होती हैं और आंकड़ों का ऐसा जाल बुना जाता है कि लगता है मानो प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में कोई क्रांति कर चुका हो। लेकिन जब जमीन पर हकीकत सामने आती है, तो ये सारे दावे खोखले नजर आने लगते हैं।

उज्जैन के महर्षि सांदीपनी राष्ट्रीय वेदविद्या संस्थान का मामला भी कुछ ऐसा ही है, जिसने इन दावों की परतें खोल दी हैं। यह कोई साधारण स्कूल नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहां वेदों की शिक्षा दी जाती है, जहां गुरु-शिष्य परंपरा की बात होती है, जहां से संस्कारित और अनुशासित पीढ़ी तैयार करने का दावा किया जाता है। लेकिन इसी गुरुकुल के एक कमरे में जो हुआ, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हम किस तरह की शिक्षा और संस्कार की बात कर रहे हैं।

एक छात्र का कसूर सिर्फ इतना था कि वह किसी दूसरे के बिस्तर पर सो गया था। एक मामूली सी गलती, जिसे समझाकर सुधारा जा सकता था, उसे सजा में बदल दिया गया। वार्डन और शिक्षक के पद पर बैठे व्यक्ति ने डंडा उठाया और छात्र पर बरसाना शुरू कर दिया। छात्र दर्द से चीखता रहा, लेकिन डंडा रुकने का नाम नहीं ले रहा था। यह कोई कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसा दृश्य है जो कैमरे में कैद हो गया और सामने आ गया। सोचने वाली बात यह है कि अगर यह वीडियो सामने नहीं आता, तो क्या यह घटना भी बाकी घटनाओं की तरह चुपचाप दबा दी जाती?

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यही अनुशासन है? क्या यही संस्कार हैं? अगर किसी बच्चे को सुधारने का तरीका मारपीट है, तो फिर शिक्षा और भय में क्या अंतर रह जाता है? गुरुकुलों की सख्त दिनचर्या का हमेशा जिक्र किया जाता है, जिसमें ब्रह्म मुहूर्त में उठना, संध्यावंदन करना और नियमों का पालन करना शामिल है। यह सब अच्छी बात है, लेकिन जब अनुशासन का मतलब डर और हिंसा हो जाए, तो वह शिक्षा नहीं रह जाती, वह सिर्फ नियंत्रण का एक तरीका बन जाता है।

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि वीडियो सामने आने के बाद भी संस्थान की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई। जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। यह खामोशी अपने आप में बहुत कुछ कहती है। यह बताती है कि समस्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था की है, जो ऐसे व्यवहार को नजरअंदाज करती है या उसे सामान्य मान लेती है।

अगर यही घटना किसी बड़े निजी स्कूल में होती, तो शायद अब तक कार्रवाई हो चुकी होती, मीडिया में बहस छिड़ जाती और जिम्मेदार लोगों पर सख्त कदम उठाए जाते। लेकिन यहां मामला एक गुरुकुल का है, जहां “संस्कार” और “परंपरा” के नाम पर बहुत कुछ छिपा लिया जाता है। यही दोहरा मापदंड इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी है।

हम बार-बार नई शिक्षा नीति, डिजिटल इंडिया और आधुनिक शिक्षा की बात करते हैं, लेकिन जब एक बच्चे की चीखें हमारे सिस्टम को नहीं जगा पातीं, तो यह साफ हो जाता है कि बदलाव सिर्फ कागजों तक सीमित है। असली बदलाव तब होगा, जब शिक्षक यह समझेंगे कि उनका काम डर पैदा करना नहीं, बल्कि विश्वास बनाना है। गुरु वह होता है जो मार्गदर्शन करता है, न कि वह जो दंड देकर अपनी सत्ता स्थापित करता है।

यह घटना सिर्फ एक छात्र की पिटाई नहीं है, बल्कि उस सोच का आईना है जिसमें अभी भी यह माना जाता है कि डंडे से ही अनुशासन आता है। लेकिन सच्चाई यह है कि डंडे से सिर्फ डर पैदा होता है, और डर में पला हुआ बच्चा कभी आत्मविश्वासी नहीं बन सकता।

अगर वास्तव में शिक्षा व्यवस्था को सुधारना है, तो सबसे पहले इस मानसिकता को बदलना होगा। बच्चों को समझने की जरूरत है, उन्हें डराने की नहीं। शिक्षकों को यह याद रखना होगा कि वे सिर्फ पढ़ाने वाले नहीं हैं, बल्कि भविष्य गढ़ने वाले हैं।

वरना मंचों पर चाहे जितने भी दावे किए जाएं, जमीन पर सच्चाई यही रहेगी कि कहीं न कहीं कोई बच्चा डंडे की मार सह रहा होगा, और उसकी आवाज व्यवस्था के शोर में दब रही होगी। और तब सवाल उठता रहेगा कि आखिर यह सुधार किसके लिए हो रहा है और किस कीमत पर।

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