श्रीराम कथा – चतुर्थ दिवस !

श्रीराम कथा – चतुर्थ दिवस !
श्री दंदरौआ सरकार धाम, जिला – भिण्ड (मध्य प्रदेश)
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री” के श्रीमुख से
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण पर आधारित श्रीराम कथा का “चतुर्थ दिवस” अत्यन्त भावपूर्ण, ज्ञानवर्धक एवं आत्मप्रबोधक रहा।
“पूज्य आचार्यश्री जी” ने कहा कि “दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुरः।” मनुष्य जीवन अनमोल अवसर है। बुद्धिमान वही है, जो अपने भीतर छिपी भगवदीय सामर्थ्य, शुभता और दिव्यता को जाग्रत कर जीवन को सार्थक बना सके। इसलिए शास्त्रसम्मत, गुरु उपदिष्ट एवं महापुरुषानुशासित मार्ग का अनुसरण ही जीवन का परम साध्य है। सत्संग को ही पूज्यपाद ने मानव जन्म की धन्यता का मूल बताया “सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं, निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः।।”
सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है।
कब, कौन, कहाँ, कैसे और क्या? यह सब गुरू को ज्ञात होता है। गुरू मौन में ही शिष्य के सभी संशयों को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। गंगाजल की महिमा वेदों में अद्भुत है। “नमामि गंगे तव पाद पंकजम्, सुरसुरैर्वन्दित दिव्य रूपं।
भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं, भावानुसारेण सदा नराणाम्।।”
गंगाजल के पान और स्नान का, नर्मदा की परिक्रमा और तप का तथा शिप्रा का स्मरण पुण्यदायी है।
आश्रम में जीवन जीने की कला सिखाई जाती है। आश्रमों में अध्ययन, अध्यापन, अभ्यास और व्यवहार का कार्य निरन्तर चलता रहता है। क्रोध मारक होता है, हिंसक होता है। क्रोध में हमेशा हानि ही होती है। क्रोध और तूफ़ान के समाप्त होने के बाद ही पता चलता है कि कितनी क्षति हुई, अथवा कितनी हानि हुई है। मुक्ति के 4 प्रकार हैं – सायुज्यता, शारूप्यता, शालोक्यता और कैवल्य।
आज की कथा में श्री दंदरौआ सरकार धाम के पीठाधीश पूज्य स्वामी श्री रामदास जी महाराज, मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष आदरणीय श्री नरेन्द्र सिंह तोमर जी तथा अनेक सन्त-महात्मा एवं श्रद्धालुजन उपस्थित रहे।
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