राजीव बोले-तुम 3 महीने टिक नहीं पाओगे; वीपी ने बिगाड़ा गांधी परिवार का खेल

एक दौर में उत्तर प्रदेश कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ हुआ करता था। 33 साल UP में कांग्रेस की सरकार रही। पंडित नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक, पूरा नेहरू-गांधी कुनबा UP से चुनाव लड़ता और जीतता रहा।
1984 में पार्टी ने 85 में से 83 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। उस साल कांग्रेस को 51% वोट मिले थे। तब उत्तराखंड UP का हिस्सा था।
आज 2024 में सोनिया गांधी के राजस्थान से राज्यसभा जाने के बाद UP में कांग्रेस का एक भी सांसद नहीं बचा। न लोकसभा में, ना राज्यसभा में।
403 विधानसभा सीटों वाली UP में कांग्रेस के सिर्फ 2 विधायक हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में 6.4% और विधानसभा चुनाव में महज 2.3 % वोट मिले थे।
इस बार UP में कांग्रेस महज 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जो आजादी के बाद सबसे कम है।
आज का ‘यक्ष प्रश्न’- UP में कांग्रेस क्यों खत्म हो गई…

12 अप्रैल 1987, रक्षा मंत्री वीपी सिंह राष्ट्रपति भवन से देर शाम घर लौटे। उन्होंने कुर्ता बदला और बेटे अभय से कहा- ‘गाड़ी निकालो।’
एक मारुति वैन घर के बाहर खड़ी थी, जो अभय के एक दोस्त की थी।
वीपी सिंह ने पत्नी से कहा कि वे प्रधानमंत्री से मिलने जा रहे हैं।
तब रेड क्रॉस रोड पर 5 और 7 नंबर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी रहते थे। कार साधारण थी, इसलिए सुरक्षाकर्मियों ने रोक लिया, लेकिन अगली सीट पर बैठे वीपी सिंह को वे पहचान गए।
वहां मौजूद कर्मचारी को वीपी सिंह ने एक लिफाफा दिया, जिस पर ‘प्रधानमंत्री’ लिखा था। कर्मचारी ने लिफाफा लेते हुए सवाल की मुद्रा में उनकी तरफ देखा। इस पर वीपी सिंह ने कहा- ‘इसमें मेरा इस्तीफा है।’
उस रोज राजीव गांधी अपने आवास में नहीं थे। वे देर रात लौटे, तो उन्हें वीपी सिंह का इस्तीफा मिला।
राजीव ने उसे पढ़ा और सीधे राष्ट्रपति के पास भेज दिया। उन्होंने ना तो वीपी सिंह को फोन किया और ना ही बुलाकर इस्तीफा देने की वजह पूछी।

4 दिन बाद यानी, 16 अप्रैल 1987, स्वीडन रेडियो ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया- ‘बोफोर्स सौदे के लिए भारत की टॉप लीडरशिप और रक्षा अधिकारियों को रिश्वत दी गई है।’
सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया। राजीव गांधी की सरकार घिर गई। तब वीपी सिंह के रक्षा मंत्री पद से इस्तीफे को बोफोर्स सौदे से जोड़कर देखा गया।
एक महीने बाद यानी, 16 मई 1987 को कांग्रेस ने दिल्ली में एक बड़ी रैली की। मंच पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे और नीचे कार्यकर्ताओं के बीच वीपी सिंह।
राजीव ने कहा- ‘भारत की आजादी कब छिनी, जब मीरजाफर और राजा जयचंद जैसे गद्दारों ने विदेशी ताकतों से हाथ मिलाया। आप ऐसे लोगों से सतर्क रहें। यह लोग विदेशी ताकतों से हाथ मिलाकर देश के हितों को बेच रहे हैं।’
बिना नाम लिए राजीव की ये लाइनें वीपी सिंह के लिए थीं। इससे वीपी सिंह काफी निराश हुए और सभा से उठकर बाहर चले गए। उन्होंने तय कर लिया कि अब वे राजनीति से दूर चले जाएंगे, लेकिन नियति ने कुछ और ही लिखा था।
22 मई 1987, वीपी सिंह, बेटे को MBBS की डिग्री मिलने की खुशी में परिवार के साथ दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डिनर के लिए जा रहे थे। वे कार में बैठे ही थे कि प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया- ‘प्रधानमंत्रीजी तत्काल आपसे मिलना चाहते हैं।’
वीपी ने पत्नी से कहा- ‘आप चली जाओ, मैं बाद में डिनर में शामिल हो जाऊंगा।’

वीपी सिंह सीधे राजीव गांधी के घर पहुंचे। उन्हें देखते ही राजीव ने मुस्कुराते हुए पूछा- ‘आजकल तुम्हारी बहुत जयजयकार हो रही है, तुम्हारी इच्छाएं बढ़ गई हैं, क्या करने का इरादा है?’
उन्होंने जवाब दिया- ‘मैं कांग्रेस में हूं। आप कहेंगे तो राजनीति छोड़कर इलाहाबाद चला जाऊंगा। चुपचाप पढ़ूंगा-लिखूंगा। आपको यकीन नहीं हो, तो मैं हरिद्वार चला जाता हूं। अगर आप काम देना चाहते हैं, तो मुझे आंध्र प्रदेश या कर्नाटक भेज दीजिए। दोनों राज्य आपके हाथ से निकल गए हैं। मैं उन्हें लाकर आपको दे दूंगा।’
राजीव गांधी ने कहा- ‘तुम तीन महीने टिक नहीं पाओगे।’
इस पर वीपी ने कहा- … ‘अगर आपका यही चैलेंज है, तो मैं स्वीकार करता हूं और इसे पूरा करके दिखाऊंगा।’
राजीव ने गुस्से से मेज पर घूंसा मारा। वीपी सिंह को लगा कि अब यहां रुकना ठीक नहीं है। वे उठे और सीधे घर चले आए।
इस किस्से का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और पूर्व सांसद संतोष भारतीय ने अपनी किताब ‘वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं’ में किया है।

बागी हुए वीपी सिंह, UP उपचुनाव में 3 सीटें हार गई कांग्रेस
राजीव गांधी से मुलाकात की घटना के बाद वीपी सिंह ने बागी तेवर अपना लिए। उन्होंने गांधी परिवार के करीबी रहे अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान जैसे कांग्रेसी नेताओं के साथ मिलकर जनमोर्चा बनाया।
इधर राजीव के साथ बोफोर्स घोटाले में इलाहाबाद से सांसद रहे अमिताभ बच्चन का नाम भी जुड़ गया। अमिताभ की छवि खराब हो रही थी। दबाव में आकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
जून 1988 में इलाहाबाद सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई। जनमोर्चा की तरफ से वीपी सिंह और कांग्रेस की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री मैदान में उतरे।
राज परिवार से आने वाले वीपी सिंह के पास भले ही पॉलिटिकल कैडर नहीं था, लेकिन UP की सियासत में उनकी मजबूत पैठ थी। वे 1980 से 1982 तक मुख्यमंत्री रह चुके थे।
इससे पहले 1977 में वे जनता पार्टी की लहर के दौरान भी इलाहाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन करीब 90 हजार वोटों से हार गए थे।
इलाहाबाद उपचुनाव, राजीव गांधी के लिए साख का सवाल था। उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी थी। UP की कांग्रेस सरकार भी पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन जीत मिली वीपी सिंह को। तब फैजाबाद और मेरठ जिले में हुए उपचुनाव भी कांग्रेस हार गई थी।

वीपी सिंह ने कहा- मेरे पास राजीव गांधी के स्विस बैंक का अकाउंट नंबर है, दबाव में आ गए राजीव
11 अक्टबूर 1988, वीपी सिंह ने जन मोर्चा, लोकदल और कांग्रेस के एक धड़े को मिलाकर ‘जनता दल’ बनाया। तब मंडल कमीशन का गठन हो चुका था। यूपी में मुलायम सिंह और मायावती OBC-दलित नेता के रूप में उभर रहे थे।
इसी बीच 3 नवंबर 1988 को वीपी सिंह ने पटना में एक रैली की। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी का स्विस बैंक में खुफिया खाता है।
अगले दिन सीनियर जर्नलिस्ट सुरेंद्र किशोर ने जनसत्ता में लिखा, ‘स्विस बैंक कॉर्पोरेशन के इस खाते का नंबर 99921 पीयू है। इसमें बोफोर्स सौदे के कमीशन से मिले करीब 8 करोड़ रुपए जमा हैं। ये खाता लोटस के नाम पर है।’
वीपी ने चुनौती दी कि लोटस और राजीव का मतलब एक ही है। अगर यह बात गलत निकली, तो वो संन्यास लेने को तैयार हैं।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर अपनी किताब ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में लिखते हैं, ‘वीपी ने बोफोर्स के मुद्दे को देश की जनता के सामने ऐसे पेश किया कि ये भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया।’

राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला खुलवाया, मुस्लिम कांग्रेस से दूर हो गए
इलाहाबाद उपचुनाव में हार के बाद राजीव गांधी दबाव में थे। बोफोर्स को मुद्दा बनाकर वीपी ने उनकी मुसीबत और बढ़ा दी थी।
1989 लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम वक्त बचा था। जनता दल पूरी ताकत से कैंपेन कर रही थी।
इसकी काट निकालने के लिए राजीव गांधी ने फरवरी 1989 में राम मंदिर का ताला खुलवा दिया। उन्हें लगा कि शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने से नाराज हिंदू इससे खुश हो जाएंगे।
दरअसल 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद गुजारा भत्ता के एक मामले में इंदौर की शाहबानो के हक में फैसला दिया था। मुस्लिम उलेमाओं ने इसे अपने पर्सनल लॉ में दखल मानते हुए पूरजोर विरोध किया था।
दबाव में राजीव गांधी ने मई 1986 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इसके बाद उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगने लगे। हिंदू संगठनों विरोध में सड़कों पर उतर गए थे।
हालांकि राम मंदिर का ताला खोलने का दांव राजीव के लिए उल्टा पड़ा। इस फैसले से मुस्लिम वोटर्स कांग्रेस से दूर हो गए।

नवंबर 1989, देश में लोकसभा चुनावों के साथ ही UP में विधानसभा चुनाव हुए। दोनों ही चुनावों यानी, केंद्र और यूपी में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा।
1984 के लोकसभा में UP में 83 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 15 सीटों पर सिमट गई। जबकि विधानसभा में 269 से 94 सीटों पर सिमट गई।
राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। जनता दल के वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने और यूपी में उन्होंने मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया। यानी, केंद्र और यूपी दोनों जगह जनता दल की सरकार बनी।


मंडल बनाम कमंडल, कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग ढह गई
प्रधानमंत्री बनने के करीब 10 महीने बाद अगस्त 1990 में वीपी सिंह ने OBC आरक्षण के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान कर दिया।
दस साल से धूल खा रही बीपी मंडल की रिपोर्ट ने सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया।
तब वीपी सिंह की सरकार लेफ्ट और BJP के समर्थन पर टिकी थी। दोनों ही उसे बाहर से समर्थन दे रहे थे।
रणनीति के तहत BJP ने मंडल कमीशन का विरोध नहीं किया, लेकिन कांग्रेस ने आपत्ति जता दी। राजीव गांधी ने वीपी सिंह की तुलना जिन्ना से कर दी। इससे OBC वोटर्स कांग्रेस से नाराज हो गए।
BJP भांप गई थी कि मंडल कमीशन की वजह से उसे नुकसान होगा, इसलिए विरोध करने के बजाय वह इसकी काट निकालने में जुट गई।

25 सितंबर 1990 को BJP नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या के लिए राम रथयात्रा की शुरुआत की। इसे मंडल बनाम कमंडल की राजनीति कहा गया। बाद में आडवाणी ने कहा भी था कि मंडल कमीशन नहीं आता, तो हम रथयात्रा नहीं करते।
23 अक्टूबर 1990 को रथयात्रा के दौरान बिहार के समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया।
अगले दिन लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी गिरफ्तार हो गए। इसके बाद BJP ने समर्थन वापस लेकर वीपी सिंह की सरकार गिरा दी।

30 नवंबर 1990 को अयोध्या में गोलीकांड हुआ और 11 कारसेवकों की जान चली गई। BJP ने मुलायम सिंह पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए। वो, उन्हें मुल्ला मुलायम कहकर प्रचारित करने लगी।
दरअसल आजादी के बाद से ही ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित कांग्रेस के कोर वोटर्स माने जाते थे। सियासी भाषा में इसे कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता था। इसी के बल पर कांग्रेस ने लंबे समय तक UP में राज किया।
लेकिन मंडल और कमंडल ने कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग को ध्वस्त कर दिया।
रथ यात्रा की वजह से ब्राह्मण BJP के पाले में चले गए। मुस्लिम वोटर्स सपा के पास और दलित वोटर्स मायावती की तरफ शिफ्ट हो गए।
इसके बाद कांग्रेस UP में फिर कभी वापसी नहीं कर पाई। साल-दर-साल उसकी सीटें और वोट शेयर घटता गया। आज कांग्रेस के पास एक सांसद और दो बिधायक बचे हैं।



कांग्रेस के हाथ से यूपी फिसलने की कुछ वजहें और भी हैं-
1. कांग्रेस के पास भी RSS जैसा संगठन था, लेकिन उसे बचाया नहीं
पॉलिटिकल एनालिस्ट नवीन जोशी बताते हैं- ‘कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण है कि उसने वक्त के साथ खुदको नहीं बदला। इंदिरा और राजीव गांधी के बाद कोई डायनेमिक लीडर कांग्रेस में नहीं हुआ।
कांग्रेस के पास पहले कैडर हुआ करता था। जैसे आज BJP के लिए RSS काम करता है, वैसे ही कांग्रेस सेवा दल, कांग्रेस के लिए काम करता था। इस कैडर के बल पर ही गली-मोहल्लों में कांग्रेस की सभाएं होती थीं।
जमीन से जुड़े कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम करते थे, लेकिन कांग्रेस लीडरशिप की अनेदखी की वजह से कांग्रेस सेवा दल धीरे-धीरे खत्म हो गया। अब गांवों-कस्बों में कांग्रेस का नाम लेने वाला कोई बचा ही नहीं।
2. दिल्ली से UP की राजनीति करना कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल
पॉलिटिकल एनालिस्ट रशीद किदवई बताते हैं- ‘कांग्रेस ने कभी भी UP की राजनीति नहीं की। पंडित नेहरू से लेकर राहुल-प्रियंका गांधी तक, सभी ने UP को दिल्ली से मैनेज करने की कोशिश की। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल थी। जैसे-जैसे UP में क्षेत्रीय दलों का उभार होता गया, कांग्रेस का जनाधार खत्म होता गया।’
क्या UP में कांग्रेस की वापसी मुश्किल है…
इस सवाल के जवाब के लिए हमने सियासी गणित और ग्राउंड पर लोगों से बातचीत का सहारा लिया।
गणित के हिसाब से कांग्रेस, UP में लोकसभा और विधानसभा, दोनों ही चुनावों में सबसे खराब दौर से गुजर रही है।
कांग्रेस ने 1952 के UP विधानसभा में 388 सीटें जीती थीं। उसे 1980 में 309 और 1985 में 269 सीटें मिलीं, लेकिन उसके बाद कांग्रेस कभी तीन अंक के आंकड़े को पार नहीं कर पाई। 2022 में तो कांग्रेस सिंगल डिजिट में सिमट गई।

ग्राउंड पर कांग्रेस की क्या स्थिति है, इसे जानने के लिए हमने लखनऊ, अमेठी और रायबरेली का रुख किया…
लखनऊ स्टेशन से विधानसभा भवन की ओर बढ़ने पर PM मोदी के बड़े-बड़े पोस्टर नजर आते हैं, जिस पर मोदी की गारंटी लिखी हुई है।
दीवारों पर BJP के समर्थन वाले स्लोगन लिखे हैं, लेकिन इधर-उधर नजर दौड़ाने पर भी कांग्रेस का कोई पोस्टर नजर नहीं आता।
यहां के लोगों से जब हमने सवाल पूछा, तो जवाब मिला- ‘UP में BJP और सपा ही चुनाव में है, कांग्रेस का माहौल क्या ही दिखेगा।’
हालांकि, अमेठी में लोगों का झुकाव कांग्रेस की तरफ दिखता है। यहां लोग गांधी परिवार और BJP दोनों को पसंद करते हैं। किसी तीसरे दल का दबदबा यहां नहीं है।
अमेठी के फुर्सतगंज इलाके में रहने वाले शीतला प्रसाद कहते हैं, ‘अब UP में तो कांग्रेस नहीं बची। कोई नेता जमीन पर दिखता ही नहीं। कुछ नेता चुनाव के वक्त आते हैं और फिर चले जाते हैं। अमेठी के लोग कांग्रेस को चाहते हैं, लेकिन 5 साल में राहुल-प्रियंका यहां कितनी बार आए, मैंने तो उन्हें यहां नहीं देखा।’

अमेठी की तरह रायबरेली में भी कांग्रेस के प्रति लोगों का झुकाव है। लोगों का कहना है कि गांधी परिवार की वजह से ही रायबरेली की देश में पहचान है।
कठवारा पंचायत के रहने वाले विष्णु दयाल शुरू से ही कांग्रेस को वोट देते आ रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की कैंपेनिंग को लेकर उनकी नाराजगी साफ झलकती है।
वे बताते हैं- ‘जिस तरह कांग्रेस पार्टी अभी चुनाव लड़ रही है, उससे तो लगता है कि उसने खुद ही झोली भर के UP की सीटें BJP को दे दी हैं। सिर्फ चुनाव के वक्त रायबरेली की चर्चा होती है। इंदिरा और राजीव गांधी ने जो काम किया है, उसी फसल को कांग्रेस आखिर कब तक काटेगी।’
आपको बता दें कि ऐन मौके पर नॉमिनेशन के आखिरी दिन यानी 3 मई को कांग्रेस ने अमेठी और रायबरेली के लिए अपने प्रत्याशियों की घोषणा की।
रायबरेली से राहुल गांधी और अमेठी से केएल शर्मा चुनाव लड़ रहे हैं। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश तो है, लेकिन कांग्रेस को कितना फायदा होगा, यह तो 4 जून को नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।

