☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 22 मई, 2024 (बुधवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – किसी बीज के लिए ऋतु की अनुकूलता बड़ी सहायक होती है। धरती बीज को अपनी उर्वरा शक्ति से वृक्ष बनाने का प्रयत्न करती है, किन्तु ऋतु की अनुकूलता के बिना उसका पुरुषार्थ फलीभूत नही होता। आत्म-उन्नयन की समस्त बाधाएँ साधक के संकल्प के समक्ष गौण हो जाती हैं। यदि हमारे पुरुषार्थ फलीभूत नही होते तो इसका अर्थ यह है कि हमारे प्रयत्न और संकल्प में कुछ कमी रह गई, हमने लक्ष्य को सर्वोपरि नही रखा अथवा हमारी प्राथमिकता कुछ और थी। अत: चिरस्थायी समाधान के लिये विवेक और पुरुषार्थ के साथ लक्ष्य को सर्वोपरि रखें ! उच्चतर लक्ष्यों की संसिद्धि के लिए धैर्य एवं निरन्तर प्रयत्न आवश्यक हैं। एक आत्म-विश्वासी, धैर्यवान और साहसी साधक के मार्ग में आने वाली सभी कठिनाइयाँ जैसे आलोचना और प्रशंसा उसे प्रभावित नहीं करती हैं। इसलिए अपने शुभ उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए उत्साह के साथ आगे बढ़ें। जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य ज्ञान पाने के साथ-साथ उसे जीवन में धारण कर स्व का विकास करना है। ‘पुरुषार्थ’ से व्यक्ति का विकास तो है ही, साथ ही समाज का भी उत्कर्ष भी है। इसलिए ‘मोक्ष’ ही पुरुषार्थ की अन्तिम परिणति है यही आध्यात्मिक जीवन का अन्तिम और उच्चतम उदेश्य भी माना गया है। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि लक्ष्य के साथ जीने वाला व्यक्ति ही अपने सामाजिक और आर्थिक स्तर में लगातार वृद्धि करता रहता है तथा सम्मान का पात्र बनता है। जैसे ही आपको आपके जीवन के लक्ष्य का ज्ञान हो जायेगा, आप अपने भीतर एक असीमित ऊर्जा एवं स्फूर्ति को अनुभूत करेंगे। यही ऊर्जा आपको आपके लक्ष्य तक पहुँचायेगी। उन्नति के पथ पर सदैव अग्रसर रहने का शुभाशीष देते हुए पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा कि उन्नति के लिए प्रयास न करना ही अवनति है। आपके द्वारा किया गया उपक्रम आपको उन्नति ही दिलाएगा। अनुशासन व समय की महत्ता का पालन कर अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ से आप अपने उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। अनन्त सम्भावनाओं और अपूर्व सामर्थ्य का नाम है – जीवन। अतः इस के प्रति हर-पल सचेत रहें। मनुष्य का जीवन बहुत अनमोल है। परमात्मा ने बहुत द्रवित होकर हमें मनुष्य शरीर प्रदान किया है। इसलिए हमें अपने इस मानव शरीर का सदुपयोग कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए। पता नहीं कितनी योनियों में भटकने के बाद, कई जन्मों का अंधकार मिटाने का यह अवसर परमात्मा ने हमें प्रदान कर अपनी करुणा का प्रदर्शन किया है। परन्तु, मनुष्य उसकी इस कृपा का मूल्यांकन नहीं कर पाता और एक-एक क्षण को व्यर्थ गँवाता जा रहा है। मानव जन्म विराट बनने की तैयारी है। सम्पूर्ण बनने की तैयारी है, समग्रता की तैयारी है, ईश्वरत्व की तैयारी है। इस जीवन में असीम सम्भावनायें छिपी हुई हैं। किसी भी क्षण को दुबारा नहीं जीया जा सकता है। इसलिए अपना एक क्षण भी बहुत अनमोल है। समय के निरन्तर सदुपयोग द्वारा ही उचित समय पर लक्ष्य प्राप्ति सम्भव है ..।
? पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा – भक्ति में भावना का बहुत महत्व होता है। भक्ति भय से नहीं, भावना से होती है। भक्ति एक तरह की क्रान्ति है, स्वयं को रूपांतरित करने के लिए। इसलिए भक्त को भक्ति का भाव जानना परम आवश्यक है, अन्यथा वह धर्मभीरू बन जाता है। फिर उसे हर समय देवता के नाराज होने की आशंका होती है। चार प्रकार के भक्त होते हैं। एक – जो दु:ख से घबराकर भगवान का नाम भजते हैं। दूसरा – अर्थार्थी, यानी, वह किसी कामना से भजन करते हैं। तीसरा – जिज्ञासु यानी जिज्ञासा के कारण भगवान का स्मरण करते हैं। और, चौथा भक्त – सबसे उत्तम भक्त है, जो ज्ञानपूर्वक, अनन्य प्रेम से परमात्मा का नाम जपता है। वह भगवान से संसार की वस्तुएँ न माँगकर भगवान को ही माँगता है। मन्दिरों में भीड़ बढ़ी है। भगवान के दर्शन करने के लिए लम्बी कतारें लगती हैं, लेकिन भक्ति की भावना में कमी आई है। भावना के बिना किए गए कर्म का मर्म समझ में नहीं आता। भक्ति में भावना का बहुत महत्व है। मुख से नाम उच्चारण करें और हृदय में भाव आ जाए। पहली बात तो यह कि हम अपने भीतर भक्ति उतारें और अपनी भक्ति को भावना से जोड़ दें। यहाँ से शुरू होगा वह भरोसा कि हमारी पीठ पर किसी बहुत बड़ी शक्ति का हाथ है। हमारे आस-पास ईश्वर की कृपा का सुरक्षा घेरा चलता है, इसलिए भक्ति को ठीक से समझा जाये। पवित्र भावना से यदि भक्ति की गई तो परिणाम भी शत-प्रतिशत मिलेंगे, वरना भक्ति भी वाणिज्य, व्यापार हो जायेगी और सौदा करने वाले लोग सदैव भयभीत पाए जाते हैं। पूज्य “प्रभुश्री जी” प्रायः कहा करते हैं कि जगत में प्रपंच का अन्त ही नहीं है, पर साधना का अन्त है। साधना का अन्त है – साध्य की प्राप्ति। यदि हम अपने स्वभाव की सच्ची साधना करें तो हमें सिद्घि और समाधान दोनों ही मिल जाते हैं। पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा कि भागवत ईश्वर को अनन्त कहकर प्रणाम करती है, क्योंकि वह प्रत्येक जीवन सन्दर्भ में नूतन और व्यापक है। वह अनेक नाम रूप वाला होकर हम सब पर छाया हुआ है। जो सबमें रहता है, वही पूरा कहलाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की यात्रा ईश्वर होने तक की यात्रा है। हम अपने-अपने रास्तों में कुछ भी बनते चले जायें पर हमारी पूर्णता ईश्वर हो जाने में है और धरती पर आते ही हमें ईश्वर होने के सभी साधन भी मिल जाते हैं। परन्तु, उन साधनों को पहचाने बिना पूर्णता की यात्रा हमेशा अधूरी रह जाती है। भारतीय संस्कृति को परिभाषित करते हुये “पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा कि वह प्रत्येक वस्तु में वैभव को खोज लेती है। हमारी संस्कृति प्रत्येक पदार्थ को आदर देते हुये उसे प्रसाद बना देती है। प्रत्येक वस्तु ईश्वर की पूजा के फूल जैसी है। यदि हम उसमें निष्ठापूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं तो प्रत्येक वस्तु वन्दनीय, पूजनीय और महनीय हो जाती है ..

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