आगे विधायक, पीछे नोटों का सूटकेस लेकर भावी सीएम
1 नवंबर 1956 को चार प्रांत मध्यभारत, मध्यप्रांत, विंध्यप्रदेश और भोपाल को मिलाकर नया मध्य प्रदेश बना। इसे बने महज 10 साल ही हुए थे कि प्रदेश के लोगों ने पहली बार सियासी बगावत देखी थी।
दरअसल, उस समय डीपी मिश्र की सरकार को राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने गिरा दिया था। गोविंद नारायण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। ये मप्र की पहली गैर कांग्रेसी संविद सरकार थी।
एमएलए रेस्ट हाउस में आवाज गूंजती थी ‘पकड़ो-पकड़ो’ मप्र के पूर्व नौकरशाह एमएन बुच अपनी किताब ‘वेन द हार्वेस्ट मून इज ब्लू’ में लिखते हैं कि जब सरकार गिराने की जद्दोजहद चल रही थी तब गोविंद नारायण एमएलए रेस्ट हाउस नंबर एक की सीढ़ियों पर नोटों से भरा सूटकेस लेकर बैठते थे। उन्हें विधायक चाहिए थे, लिहाजा विधायकों की धरपकड़ भी होती थी। गोविंद नारायण सिंह की आवाज रात में गूंजती थी – ‘पकड़ों-पकड़ो भागने न पाए’।
एमएन बुच किताब में लिखते हैं कि छतरपुर के एक विधायक थे। उनके पीछे-पीछे गोविंद नारायण सिंह दौड़े, नोटों से भरा सूटकेस लेकर, कि भाई तुम यह ले लो और तुम हमारे तरफ आ जाओ। संविद सरकार भी 19 महीने ही चल सकी। डीपी मिश्र तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन 275 रुपयों की वजह से नहीं बन सके। आज मप्र के गठन को 69 साल पूरे हो चुके हैं।
इस मौके पर पढ़िए एमपी के ऐसे मुख्यमंत्रियों की कहानी जो अपनी कार्यशैली या फिर अनोखे अंदाज की वजह से चर्चा में रहे।

अपने मंत्रिमंडल के सहयोगी मंत्री को भूल गए 31 जनवरी 1957 को जब डॉ. काटजू भोपाल के बैरागढ़ हवाई अड्डे पर उतरे, तो उन्हें भोपाल में जानने वाला कोई नहीं था। उसी दिन डॉ. काटजू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। चूंकि नेहरू और कांग्रेस हाईकमान का यह आदेश था, इसलिए ऊपरी तौर पर मध्यप्रदेश के सभी नेताओं ने काटजू को मुख्यमंत्री तो स्वीकार कर लिया पर मन से वे उन्हें कभी नहीं स्वीकार कर सके थे।
काटजू के बारे में कहा जाता था कि बड़ी उम्र की वजह से वो भूल जाते थे। एक बार जब वो खंडवा गए तो तत्कालीन कलेक्टर सुशील चंद्र वर्मा उनकी गाड़ी ड्राइव करते हुए बुरहानपुर पहुंचे। यहां रेस्ट हाउस में अफसरों से परिचय हो रहा था। कलेक्टर वर्मा सीएम काटजू से दूर खड़े थे। सभी से परिचय हुआ तो काटजू ने वर्मा से कहा- आपने परिचय नहीं दिया। वर्मा बोले- सर, मैं कलेक्टर.. मैंने ही गाड़ी चलाई है।
ऐसा ही एक किस्सा छतरपुर सर्किट हाउस में हुआ। वहां के स्थानीय विधायक और मंत्री दशरथ जैन जब एक प्रतिनिधि मंडल को लेकर सीएम से मिलने गए। दशरथ जैन ने ही सीएम से लोगों का परिचय कराया। आखिर में डॉ. काटजू ने जैन से पूछा – और आप? इस पर दशरथ जैन ने कहा- मैं दशरथ जैन हूं, डॉ. साहब।
काटजू बोले- एक दशरथ जैन तो हमारे मंत्रिमंडल में भी हैं। दशरथ जैन आश्चर्य से बोले- मैं वही दशरथ जैन हूं। इस पर डॉ. काटजू ने कहा- पहले क्यों नहीं बताया, क्या मैं जानता नहीं।

तीसरी बार सीएम बनने से चूके खंडवा के रहने वाले भगवंतराव मंडलोई पहली बार 31 दिन के लिए सीएम बने थे। दिसंबर 1956 में पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल का निधन हो गया था, तब मध्य प्रदेश को संभालने के लिए सामने आए कई दावेदारों में से आलाकमान ने मंडलोई को चुना था। हालांकि, इसके बाद मंडलोई को मौका न देते हुए कैलाश नाथ काटजू को सीएम बनाया गया।
डॉक्टर काटजू के पांच साल के कार्यकाल के बाद 1962 में जब आम चुनाव हुए उसमें कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की, लेकिन सिटिंग चीफ मिनिस्टर कैलाशनाथ काटजू जावरा सीट से चुनाव हार गए। कांग्रेस ने 288 में केवल 142 सीटें जीती थीं। यानी पूर्ण बहुमत भी नहीं था। काटजू के चुनाव हारने के बाद भगवंतराव मंडलोई दूसरी बार 18 महीनों के लिए सीएम बने।
अक्टूबर 1963 में कांग्रेस का कामराज प्लान आने के कारण मंडलोई को जाना पड़ा और काटजू को फिर से मध्यप्रदेश की कमान देने की तैयारी होने लगी। इसी बीच राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले द्वारका प्रसाद मिश्र ने ऐसी बिसात बिछाई कि उन्हें 1963 में मुख्यमंत्री चुन लिया गया।

राजमाता को चैलेंज देना पड़ा भारी द्वारका प्रसाद मिश्र का मुख्यमंत्री बनना मध्यप्रदेश में कांग्रेस के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वे दो बार सीएम रहे। जब पहली बार सीएम बने तो भोपाल के श्यामला हिल्स पर निशात मंजिल नाम के बंगले में रहते थे। ये एक किराए का मकान था। ये बंगला आज भी भोपाल के अशोका लेक व्यू होटल के ऊपर स्थित है। मिश्रा पहले और आखिरी सीएम थे जो किसी प्राइवेट मकान में किराए पर रहे।
दरअसल, उनसे पहले जो सीएम थे वो आइना बंगला में रहते थे, जो आजकल वीआईपी गेस्ट हाउस है। आइना बंगले के बारे में ये कहा जाने लगा था कि यह अशुभ है, क्योंकि कोई भी मुख्यमंत्री जो यहां रहता है वो ज्यादा दिनों तक सीएम की कुर्सी पर नहीं रहता। यही वजह थी कि डीपी मिश्रा ने किराए का मकान लिया था।
डीपी मिश्रा ने यूथ कांग्रेस के सम्मेलन में पचमढ़ी में राजे-रजवाड़ों को लेकर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि ये लोग कभी कांग्रेस के नहीं हो सकते। उस समय राजमाता विजयाराजे सिंधिया पहली पंक्ति में बैठी थी। उन्हें ये बात अच्छी नहीं लगी। राजमाता ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- मैंने तभी तय कर लिया था कि मैं ये टिप्पणी हवा में नहीं जाने दूंगी।

एमपी की पहली सियासी बगावत, मिश्र की कुर्सी गई मप्र की पहली सियासी बगावत 1967 में हुई थी। यूथ कांग्रेस के पचमढ़ी अधिवेशन में राजे रजवाड़ों का अपमान करने के बाद डीपी मिश्र ने राजमाता को अपने दफ्तर में बुलाकर अपमान किया था। विजयाराजे सिंधिया ने ठान लिया कि वे मिश्र की सरकार गिराकर रहेंगी। गोविंद नारायण सिंह ने उनका साथ दिया।
विधानसभा के मानसून सत्र शुरू होने से पहले कांग्रेस के 36 विधायक गायब हो गए थे। इन विधायकों को अपने पाले में लाने के लिए विजयाराजे सिंधिया और डीपी मिश्र के बीच एक जबरदस्त सियासी खींचतान हुई। कांग्रेस 10 विधायकों की वापसी कराने में कामयाब भी हो गई थी। डीपी मिश्र के संसदीय सचिव राजेंद्र प्रसाद शुक्ल अपनी किताब में लिखते हैं कि राजामाता के पाले में 36 विधायक हो गए थे।
उन्हें भोपाल में दो सीक्रेट जगहों पर रोका गया था। राजमाता ने तब विधायकों से कहा था “जो खाना-पीना है, यहां सब कुछ मिलेगा, यहीं रहो। बाहर न जाने की सख्त हिदायत दी गई थी। इस दल-बदल में डाकुओं का भी गिरोह भी मदद कर रहा था। विधायक विश्रामगृह में उस समय बहुत से डकैत दल और उनके सरगना ठहरे हुए थे, जो इस बात की निगरानी कर रहे थे कि कोई भी विधायक आवास से बाहर न जाने पाएं।

मिश्र ने मध्यावधि चुनाव की मांग की लेकिन नहीं हुए राजेंद्र प्रसाद शुक्ल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, एक अजीबोगरीब नजारा था। विधानसभा के गर्भगृह में जैसे रस्साकशी होती है, वैसा ही कुछ हो रहा था। हम लोग जुए में हारे हुए पांडवों के समान द्रौपदी को नग्न होते देख रहे थे और दिल थामकर सिर झुकाए बैठे थे।
विपक्ष के गोविंद नारायण सिंह ने खड़े होकर स्पीकर से कहा कि हम लोग जो कांग्रेस से दल-बदल करके इस तरफ आए हैं, हमारी जान को खतरा है। इसके बाद शिक्षा विभाग के विधेयक पर मतदान हुआ, जिसमें कांग्रेस की सरकार हार गई।
इसके तत्काल बाद द्वारका प्रसाद मिश्र सीधे राजभवन गए। उन्होंने इस्तीफा दिया और वहीं पर मध्यावधि चुनाव की मांग की। राज्यपाल ने त्यागपत्र मंजूर कर लिया और नई सरकार बनाने तक काम करते रहने को कहा। मगर, चुनाव नहीं हुए। गोविंद नारायण सिंह सीएम बने और 19 महीने तक सरकार चलाई।
गोविंद नारायण सिंह बाद में वापस कांग्रेस में चले गए। डीपी मिश्रा तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन अदालत के एक आदेश ने उनपर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
दरअसल, कसडोल उपचुनाव में उन्होंने चुनाव में तय सीमा से 275 रु. ज्यादा खर्च कर दिए थे। इसकी शिकायत के बाद अदालत ने ये आदेश दिया। कहा जाता है कि श्यामाचरण शुक्ल ने ही ये शिकायत अदालत तक पहुंचाई थी। जो बाद में मप्र के मुख्यमंत्री बने थे।

केवल 13 दिन तक ही मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि 1969 को आधी रात को मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह मुझसे मिले। उन्होंने कहा कि मैं इस सरकार (संविद सरकार) से तंग आ चुका हूं। अब वापस कांग्रेस में आना चाहता हूं। सबकुछ तय हुआ। मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष को मैसेज पहुंचाया और गोविंद नारायण ने कांग्रेस में वापसी की।
इस बीच डीपी मिश्र ने राजमाता सिंधिया, गोविंद नारायण सिंह और संविद सरकार के खिलाफ जबलपुर से भोपाल तक पदयात्रा की थी। जिसमें लोगों का हुजूम उमड़ा था। गोविंद नारायण के इस्तीफे के बाद नरेशचंद्र संविद सरकार के सीएम बने। उन्होंने सरकार संभालने की कोशिश की, लेकिन 13 दिनों में ही सरकार गिर गई। तकनीकी रूप से नरेशचंद्र मध्य प्रदेश के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री थे।

दो बार के सीएम पटवा को धोखे से राजनीति में आए सुंदरलाल पटवा, भारतीय जनता पार्टी के एक दिग्गज नेता थे। वे अक्सर यह बात कहते थे कि उन्हें धोखे से सियासत में लाया गया था। यह धोखा किसी राजनीतिक षड्यंत्र से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है। यह 1956 के आसपास की बात है। जनसंघ के नेता कुशाभाऊ ठाकरे चाहते थे कि पटवा जनसंघ के टिकट पर मनासा से चुनाव लड़ें।
ठाकरे के लाख समझाने के बाद भी 32 वर्षीय पटवा ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। ठाकरे ने संघ से दबाब डलवाया, पर पटवा नहीं माने। आखिरकार रामचरण बसेर को जनसंघ का टिकट मिला। जब पर्चा भरने की बारी आई तो बसेर के साथ डमी कैंडिडेट के तौर पर पटवा का पर्चा भी भरवा दिया गया।
फॉर्म वापस लेने के आखिरी दिन कुशाभाऊ ने बसेर का नामांकन वापस ले लिया और अंत में पटवा को चुनाव लड़ना पड़ा। इसके बाद पटवा रुके नहीं और दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
