☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 20 मई, 2024 (सोमवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्

 

।। श्री: कृपा ।।

? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्।

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।।

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ।।”

 

समस्त आध्यात्मिक साधनों की फलश्रुति भगवद् प्राप्ति है। जीवन की उच्चतर अवस्थाएँ जैसे – आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर कृपा अनुभूति और जितेन्द्रियता आदि दिव्य उपलब्धियाँ परमात्मा के अनुग्रह द्वारा सहज संभाव्य हैं। अतः सर्वतोभावेन समर्पित रहें । “मोहिनी एकादशी” की हार्दिक शुभकामनाएँ ..! जो वाणी, व्यवहार और आचरण स्वयं को अच्छा नहीं लगता वैसा अन्य के साथ ना करें। अन्य के आदर, अधिकार और स्वाभिमान की रक्षा आध्यात्मिक उत्कर्ष के सहज साधन हैं। दूसरों को सुनने की क्षमता, आदर देने का अभ्यास होना चाहिये। दूसरों के सम्मान-स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा करना सीखें, यही अध्यात्म का पहला पाठ है। जीवन में आपको तब तक आदर नहीं मिलेगा, जब तक आप दूसरों के प्रति संवेदनशील नहीं बनोगे। भगवान बुद्ध ने तो यहाँ तक कहा है कि हमारे हृदय में शत्रु के लिए भी प्रेम होना चाहिए, क्योंकि जिन्हें आप जानते हो, आपके माता-पिता, परिवार, मित्र, बन्धु-बांधव आदि सबसे तो आप प्रेम करते ही होंगे, लेकिन सच्ची संवेदनशीलता वो है जब आपके हृदय में सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रेम होगा। यहाँ तक कि अपने शत्रु के लिए भी। जो किसी का अहित नहीं करता, किसी को पीड़ित अथवा प्रताड़ित नहीं करता, अनुचित उपार्जन से दूर रहता है, धर्माचरण द्वारा धन कमा कर उसी में सन्तुष्ट रहता है, स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को महत्व देता है, तब प्रसन्नता, सुख, शाँति, स्थिरता एवं संतुलन उसे ही प्राप्त होता है। ऐसा सत्यनिष्ठ व्यक्ति आत्माह्लाद के अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा का भी पात्र बन जाता है। सारे धर्म हमें मानवता एवं एकता का पाठ पढ़ाने के लिए ही बनें हैं। कोई भी धर्म कभी भी जात-पात, रंग-भेद, सम्प्रदाय के नाम पर लोगों में भेद-भाव उत्पन्न नहीं करता। सब एक ही बात बताते हैं कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। हम सभी उस एक परम पिता परमेश्वर की सन्तानें हैं। ना कोई बड़ा, ना कोई छोटा सबमें वह समान रूप से समाया हुआ है। सबको एक साथ मिलकर रहना है तो हमें अहिंसा का मार्ग अपनाना होगा। ये पूरी दुनिया एक बड़ा कुटुम्ब है। इसका अर्थ ये भी है कि हमें मिल-जुल कर शान्ति से रहना चाहिए, तभी हम सच्चे अर्थों में उन्नति कर पायेंगे, प्रसन्न रह पायेंगे और तभी दुनिया का उपकार होगा। श्रीरामचरितमानस, श्रीभगवतगीता और गुरुग्रन्थ साहिब आदि सभी पवित्र धर्म ग्रन्थों में यही बात अलग-अलग प्रकार से कही गयी है …।

 

? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – जो व्यक्ति मन, वचन व कर्म से सच्चाई का व्यवहार करता है। नम्रता, उदारता, सज्जनता एवं सत्य जिसके स्वभाव की शोभा है, वह व्यक्ति स्वयं भी अपनी दृष्टि में सम्मानित रहता है। अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित व्यक्ति केवल वही हो सकता है जो कभी किसी के साथ छल-कपट नहीं करता है। किसी के धन पर दृष्टि डालना पाप समझता है। जो लोभ, लालच तथा स्वार्थ की भावना से पीड़ित नहीं है, उसका अपने प्रति यह विश्वास ही आत्म-सम्मान का आधार होता है और वह समाज में यथोचित सत्यनिष्ठा के अनुरूप व्यवहार करता है। अपने सदाचरण से जिसने दूसरों के हृदय में अपने लिए सम्मान, सद्भाव एवं आदर उत्पन्न किया है तो दूसरों की वे भावनायें अदृश्य रूप में ऐसी शीतल, शाँतिदायक तथा आनन्दमयी विद्युत तरंगों को उत्पन्न करेंगी जो मानसिक स्वास्थ्य बनकर उस तक उसी प्रकार पहुँचती रहेंगी, जिस प्रकार चन्दन-वन के निकट खड़े व्यक्ति के पास शीतल मन्द सुगन्ध। उस स्वास्थ्यप्रद वातावरण में सदाचारी को जो सुख, शाँति एवं आह्लाद प्राप्त होगा, वह किसी स्वर्गिक आनन्द से कम न होगा। पृथ्वी का परमानन्द पाने के लिए मनुष्य को सत्यनिष्ठ, सन्मार्गगामी, सदाचारी तथा परोपकारी बनना ही चाहिये। दूसरों के लिए कुछ करने की भावना ही परोपकार है। परोपकार खेत में बोए जाने वाले बीज के समान है। जब परोपकार किया जाता है तो कुछ भी दिखाई नहीं देता है, परन्तु जब इसकी फसल पक जाती है तो यह सद्भावना एवं प्रेम के रूप में लहलहाने लगती है। अतः सफल व्यक्ति वह नहीं जिन्होंने अगणित धन-सम्पत्ति जमा कर ली हो या समाज में मान-सम्मान पाकर प्रतिष्ठा स्थापित कर ली हो, बल्कि परोपकार जेठ की दुपहरी में ठण्डी व शीतल छाँव के समान है जहाँ पर कुछ देर आराम और विश्राम किया जा सकता है। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि मनुष्य योनी मुक्ति व भवसागर पार होने के लिए है। धर्म के बिना जीवन का स्वरूप इहलोक व परलोक सिद्धि अमान्य है। धर्म ही सभी भाँति के पदार्थों व सुखों का समागम है। अर्थ की अधिकता मानव को व्यसनी व व्यभिचारी ना बना दे, इसके लिए धर्म का अंकुश अति आवश्यक है। अतः जब धर्म से कामनाएँ सीमित होगी, तब मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होगी …।

 

? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – अन्य में परिवर्तन और अनुकूलता की अपेक्षाएँ दुःख की जननी है। परिवर्तन स्वयं में सृजन उत्पन्न करें; जैसे ही चेतना अंतर्मुखी होगी, स्वयं में निहित शान्ति, आनन्द और ऐश्वर्य जैसी दिव्य सत्ता अनुभूत होने लगेगी। अतः विवेक-विचार और यथार्थ का आश्रय ही हितकर है। उन्होंने प्रसन्न रहने के कुछ प्रभावी उपाय बताए। जैसे – प्रसन्नता के लिए स्वस्थ रहना नितान्त आवश्यक है। यहाँ स्वस्थ से अभिप्राय शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही प्रकार से स्वस्थ रहने से है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए शारीरिक परिश्रम करना चाहिए, जबकि योग व ध्यान करने से मन को शान्ति मिलती है।

1. हमेशा सकारात्मक रहें।

2. आप जो हैं वही बनकर रहें, दूसरों की प्रतिकृति बनने का प्रयास न करें।

3. हमेशा अपने से नीचे वालों को ध्यान में रखें।

4. प्रसन्न होने के लिए धन की नहीं, शान्ति और संतोष की खोज करें।

5. परिश्रम से जी न चुराएँ।

6. दूसरों के पास क्या है, उस पर ध्यान देने की बजाय जो आपके पास है उसका आनन्द उठाएँ।

7. नकारात्मक विचारों वाले लोगों से दूर रहें।

8. अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोषी न ठहराएँ।

9. प्रतिदिन अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करें।

10. कुछ समय अपने लिए भी निकालें।

11. परिवार व मित्रों के साथ समय बिताएँ।

12. कोई न कोई ऐसा व्यक्ति आपके जीवन में अवश्य हो जिससे आप अपनी मन की बात बताएँ।

13. कुछ समय निकाल कर अपने परिवार के साथ कहीं घूमने जाएँ।

14. अपने आराध्य की पूजा अवश्य करें।

15. कुछ समय योग व प्राणायाम के लिए निकालें।

16. सपनों की दुनिया से बाहर निकल कर यथार्थ में जीयें। और,

17. भविष्य की चिन्ता छोड़कर वर्तमान में रहें …।

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