मध्यप्रदेश की एक स्वर्णिम परंपरा का एक स्वर्णिम विस्तार

इंदौर नगर निगम में बिना काम किये सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान हो जाने के मामले में ‘सभी निर्दोष’ वाली यह खबर यदि ‘पत्रकारिता की पतंगबाजी’ नहीं है,तो मध्यप्रदेश की एक स्वर्णिम परंपरा का एक स्वर्णिम विस्तार तो है ही।
जो लोग अपनी उम्र के सत्तर वर्ष पूरे कर चुके हैं,या उसके करीब हैं,उन्हें अपने बचपन में भ्रष्टाचार के दो कांड सुनाई पड़े होंगे- ‘टाटपट्टी कांड’ और ‘गुलाबी चना कांड’।
साठ के दशक में हुए भ्रष्टाचार के ये उतने ही बड़े बड़े अलग अलग दो कांड थे,जितना बड़ा नगर निगम का सौ करोड़ का शायद यह कांड है।
इनकी जांच के लिये भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अध्यक्षता में आयोग बने थे।आयोगों ने भ्रष्टाचार होने की साक्ष्य सहित अपनी रिपोर्टें भी दी थीं लेकिन वे रिपोर्टें आज तक बस्तों में बंद हैं। (भरोसा न हो तो सूचना के अधिकार में पूछ लें)।
इस बीच प्रदेश ने लगभग पन्द्रह मुख्यमंत्री देख लिये हैं।
‘व्यापमं’ कांड अपने देखते देखते ही हुआ है।सबने इसे होते हुए अपनी आंखों से देखा है।यह कांड सौ करोड़ रुपये से काफी ज्यादा का है।
इसमें मेडिकल कॉलेजों के सारे मालिक निर्दोष पाये जाकर छूट गये हैं।जबकि ‘लूट’ का सर्वाधिक हिस्सा शायद उन्हें ही मिला होगा।
शायद आपने देखा, पढ़ा या सुना हो कि इतना ही बड़ा एक ‘पेंशन-कांड’ भी हुआ था।उसकी जांच भी एक न्यायाधीश जी ने ही की थी और रिपोर्ट भी दी थी।इस बीच तकनीकी रूप से यह तीसरी सरकार चल रही है।लेकिन वह रिपोर्ट भी गायब है।
आकार में इतने ही बड़े या थोड़े छोटे और भी कई कांड हुए हैं, लेकिन उन सब में ‘सब निर्दोष’ हैं।
वैसे ही जैसे ‘नो बडी किल्ड जैसिका’।
‘होइहें वही,जो राम रचे राखा।
