आपातकाल के 50 साल: दोस्त जेल में तड़पकर मर गया

0
Spread the love
QuoteImage

जेल में मुझे और मेरे दोस्त असमद वारसी को टाइफाइड हो गया था। उसकी तबीयत ज्यादा खराब थी। उसे समय पर इलाज नहीं मिला और मेरी आंखों के सामने तड़प-तड़पकर उसकी मौत हो गई।

QuoteImage

ये कहते हुए मप्र पर्यटन विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष तपन भौमिक थोड़े इमोशनल हो जाते हैं। दरअसल, भौमिक मीसाबंदी हैं, जिन्होंने आपातकाल के दौरान 16 साल की उम्र में आंदोलन किया था। उनके साथ केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी जेल गए थे। भौमिक कहते हैं, थाने में पुलिसवालों ने शिवराज को एक-एक फीट नाप कर लट्ठ बरसाए थे।

इन दोनों के साथ शिवराज के पूर्व निजी सचिव संतोष शर्मा भी थे। जब वो जेल गए तब उनकी उम्र महज 14 साल थी। शर्मा कहते हैं, पुलिस ने लॉकअप में हमारे कपड़े उतार दिए थे। कड़कड़ाती सर्दी में कंबल तक नहीं दिया था। आपातकाल के दौरान मप्र के करीब 5 हजार लोगों को नजरबंद किया गया तो करीब ढाई हजार लोगों को जेल में रखा गया था।

25 जून को आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर भास्कर ने मप्र के उन चुनिंदा नेताओं से बात की जो मीसाबंदी के तौर पर महीनों तक जेल में रहे। पढ़िए रिपोर्ट…

मुझे पकड़ने के लिए कलेक्टर ने पिताजी को धमकाया गोपाल दंडोतिया कहते हैं 25 जून 1975 को जब इमरजेंसी लागू हुई थी तब मैं 24 साल का था। मैं विद्यार्थी परिषद में सक्रिय था। पिताजी कलेक्ट्रेट में क्लर्क थे। मैं अपने दोस्त के साथ भूमिगत हो गया था। शिवपुरी का पूरा प्रशासन मेरी तलाश कर रहा था। तत्कालीन कलेक्टर ने मेरे पिता से कहा कि अपने बेटे को सरेंडर करने के लिए कहिए, वरना आपको नौकरी से निकाल देंगे। मेरे पिता नहीं माने।

मुझे जब पता चला तो मैंने अपने दोस्त दिनेश को कहा सरेंडर करेंगे, मगर चुपचाप नहीं। 26 जुलाई 1975 को मैं और मेरा दोस्त शिवपुरी के भरे बाजार में ‘नरक से नेहरू करे पुकार, मत कर बेटी अत्याचार’ नारा लगाते हुए निकले तो सन्नाटा छा गया। हम सौ मीटर ही चले होंगे कि पुलिस ने हमें पकड़ लिया और जेल ले गई।

उस समय शिवपुरी में जिला जेल नहीं थी। हमें तीन महिला कैदियों के बैरक में रखा गया था। बैरक में 19 लोगों को एक साथ रखा गया था। पर्याप्त जगह नहीं थी। जितने भी लोग बंद थे वो सभी 30 साल से कम उम्र के थे।​​​​​​

गोपाल दंडोतिया (दाईं तरफ) अपने दोस्त दिनेश गौतम के साथ काली पट्टी बांधकर सत्याग्रह के लिए निकले थे।
गोपाल दंडोतिया (दाईं तरफ) अपने दोस्त दिनेश गौतम के साथ काली पट्टी बांधकर सत्याग्रह के लिए निकले थे।

बाहर का माहौल पता नहीं था, जेल ही घर बन गया था दंडोतिया बताते हैं कि हमारे साथ भगवान दास जी पाराशर, वेदनाथ, अशोक पांडे जैसे आरएसएस के कार्यकर्ता जेल में बंद थे। जेल में भी इन्होंने आरएसएस का शिक्षा वर्ग लगाना शुरू कर दिया। हम लोग सुबह 5 बजे उठते थे, गीता पाठ करते थे। हर किसी को रोज गीता के दो श्लोक याद करना पड़ते थे।

बाहर का क्या माहौल था इसकी हमें जानकारी ही नहीं थी। जितने लोगों को जेल में बंद किया जा रहा था उनमें से कई लोगों ने तो माफी मांग ली और जेल से रिहा हो गए। हमें बेहद गंदा खाना दिया जाता था। एक तरह से ये यातना थी। हमने फैसला लिया सभी लोग मिलकर खाना बनाएंगे।

21 महीने बाद जेल से छूटा तो लाखों लोगों ने स्वागत किया दंडोतिया कहते हैं कि हम लोग 21 महीने तक जेल में रहे। देश में आम चुनाव हुए और इंदिरा की सरकार चुनाव हार गई थी। जब हम लोग बाहर आए तो पूरा शिवपुरी हमारे स्वागत के लिए उमड़ पड़ा था। 21 महीने पहले जिस चौराहे से हमें नारे लगाते हुए पुलिस ने गिरफ्तार किया था उसी चौराहे पर हमारा भव्य स्वागत हुआ।

मुझे याद है कि हर कोई मुझे मिठाई खिला रहा था। मैं एक डिब्बे से केवल एक टुकड़ा खा रहा था। इस तरह 50 किलो मिठाई के टुकड़े मैंने खाए होंगे। वो अभूतपूर्व क्षण था। मैं उस दृश्य को कभी भूल नहीं सकता। जेल से छूटने के बाद मैंने तय किया कि मैं लॉ की पढ़ाई करूंगा। इसके बाद सफर आगे चलता रहा। साल 2014 से 2016 तक मैं मप्र का चुनाव आयुक्त रहा। दंडोतिया कहते हैं –

QuoteImage

एक बात का मलाल जरूर है कि हमने तानाशाही, महंगाई, आपातकाल, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इतने सारे कष्ट झेले, लेकिन अब अपने आसपास देखता हूं तो हमारे साथ ये लड़ाई लड़ने वाले लोग ही अब भ्रष्टाचार, महंगाई को व्यावहारिक बोलते हैं, कई तो उसमें शामिल हो गए हैं।

QuoteImage

शिवराज समेत 6 दोस्तों को जेल में डाला मप्र पर्यटन विकास निगम के पूर्व चेयरमैन तपन भौमिक कहते हैं कि जिस समय मुझे जेल में डाला गया तब मेरी उम्र 16 साल थी। मेरे साथ पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान भी थे। उनकी उम्र भी 16 साल थी। हमारे स्कूल में पढ़ने वाले संतोष शर्मा ने आंदोलन में हिस्सा लिया था। वो उस समय 14 साल के थे।

जब आरएसएस ने जेल भरो आंदोलन का आव्हान किया तो हमने खुद ही आंदोलन कर गिरफ्तारी देने का फैसला किया। हमारे स्कूल से 9 बच्चों ने हिस्सा लिया था। पुलिस ने हम सभी को गिरफ्तार कर लिया। हमें हबीबगंज थाने ले जाया गया। वहां के तत्कालीन टीआई ने शिवराज को एक-एक फीट नाप लेकर लट्ठ मारे थे।

जेल में हमारे साथ कुशाभाऊ ठाकरे, बाबूलाल गौर, कैलाश सारंग जैसे नेता बंद थे। जेल में मेरे साथ मेरा दोस्त असमद वारसी भी था। उसे टाइफाइड हो गया और समय पर इलाज न मिलने से मैंने अपने दोस्त को अपनी आंखों के सामने तड़प-तड़प कर मरते देखा। आपातकाल के दौरान जेल में 37 लोगों की मौत हुई थी।

जेल से छूटे तो हमें वीर बालक कहा गया जब हम जेल में थे तो उम्मीद नहीं थी कि हम लोग कभी रिहा होंगे। जेल को ही हमने अपना घर बना लिया था। रोज सुबह जल्दी उठना, बौद्धिक सुनना, गीता पाठ करना, रामायण पाठ करना, यही हमारी दिनचर्या हो गई थी। जेल में रहते हुए शिवराज जी ने तो पूरी गीता याद कर ली थी। हम 185 लोग जेल आए थे उसमें से 100 से ज्यादा लोग माफी मांगकर रिहा हो गए। हमने माफी नहीं मांगी।

21 मार्च 1977 को हम लोग जेल से बाहर निकले। जब बाहर आए तो हम लोगों को ट्रक के डाले पर बैठा दिया गया था। लोग मुझे वीर बालक कह रहे थे। पूरे भोपाल में हमारे स्वागत के लिए करीब 200 से ज्यादा मंच लगे थे। बाबूलाल गौर ने उस वक्त हमे शाबाशी दी थी। जेल से छूटकर हमने तय किया कि हम संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बनेंगे। मैं भाजपा का प्रदेश कार्यालय मंत्री भी रहा।

जिस पुलिस वाले ने मुझे पकड़ा उसे दो प्रमोशन मिले शिवपुरी के रहने वाले हरिहर शर्मा बताते हैं कि उस समय मेरी उम्र 21 साल थी। इमरजेंसी लगाने के 5 महीने बाद 14 नवंबर 1975 को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर आरएसएस ने प्रत्यर्पण अभियान शुरू किया था, यानी ये जेल भरो आंदोलन था। आरएसएस ने मुझे इस आंदोलन का संयोजक बनाया था।

शुरुआत में ये किसी को पता नहीं था। धीरे-धीरे सभी को पता चला तो पुलिस मेरी तलाश करने लगी और लोग मुझे बचाने लगे। एक दिन में पिछोर से शिवपुरी आ रहा था। मैं बस में खड़े-खड़े सफर कर रहा था। पुलिस की चेकपोस्ट आई तो एक 60 साल के बुजुर्ग ने अपनी सीट पर मुझे बैठाया और मेरी आढ़ लेकर खड़े हो गए ताकि मैं पुलिस की नजरों से बच सकूं।

दरअसल, आरएसएस ने मुझे एक डुप्लिकेटिंग मशीन दी थी। इसके जरिए हम हाथ से सरकार के खिलाफ पर्चे छाप कर दुकान, घर, स्कूल और कॉलेजों में बांटते थे। पुलिस और मेरे बीच दो महीने तक लुका-छिपी का खेल चलता रहा आखिरकार 6 जनवरी 1976 को मैं गिरफ्तार हो गया। पुलिसवालों ने मुझे मीसाबंदी के घर डुप्लिकेटिंग मशीन ले जाते हुए देख लिया था।

अखबार की पट्टियों पर लिखकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई जब मुझे मजिस्ट्रेट के सामने कोर्ट में पेश किया गया तो मेरा कोई वकील नहीं था। मैंने जो पर्चा छापा था उसे एक वकील ने पढ़ा और कहा कि इसमें कुछ गलत तो नहीं है। उसी वक्त जज ने कहा कि आप ही हरिहर का केस लड़ लो। ये सुनकर वकील साहब भाग खड़े हुए। ग्वालियर जेल में हमें न तो खाना मिल रहा था और न ही दूसरी सुविधाएं।

हमारे साथ जेल में बंद बाबूलाल शर्मा अखबार की खाली पट्टी रोज काटकर अपने पास रखते थे। एक दिन उन्होंने सारी पट्टियां बनियान के ऊपर चिपकाई और उसपर एक रिट पिटीशन लिखी। इसमें लिखा था कि जेल में बंद मीसाबंदियों को न पढ़ने लिखने के लिए किताब मिल रही है ना खाने के लिए भरपेट भोजन। इसे प्रचारकों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट को भेज दी। कोर्ट ने इस मान्य किया।

आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी देते आरएसएस के कार्यकर्ता।
आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी देते आरएसएस के कार्यकर्ता।

अटल जी ने नाम लिया और दूसरे दिन जेल से रिहा हरिहर कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने जनवरी में आम चुनाव का ऐलान कर दिया था, लेकिन हम लोगों को जेल से छोड़ा नहीं गया था। विपक्ष के नेता चुनाव में जुट गए थे। ग्वालियर के छत्री बाजार में अटलजी की सभा थी। उन्होंने अपने भाषण में इंदिरा गांधी पर खूब हमले किए। उस सभा में लगभग पूरा ग्वालियर ही उमड़ पड़ा था।

इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के बाद अचानक चुनाव का ऐलान कर सहानुभूति पाने की कोशिश की थी। कांग्रेस के नेता इसी तरह का प्रचार कर रहे थे। इस सभा में अटल जी ने मंच से कहा कि ये चुनाव की घोषणा एक मजाक है। हमारे कार्यकर्ता हरिहर शर्मा अभी भी जेल में बंद है। अटल जी ने सभा में मेरे नाम का जिक्र किया और दूसरे ही दिन हमें जेल से रिहा कर दिया गया।

कड़ाके की सर्दी में हमारे कपड़े उतरवा लिए थे संतोष शर्मा बताते हैं कि मेरी उम्र 14 साल थी। मैं महात्मा गांधी हायर सेकेंडरी स्कूल बरखेड़ा में संघ का मुख्य शिक्षक हुआ करता था और शाखा लगाता था। इसी कारण मन में उत्साह था कि संघ के आह्वान पर हमें भी आंदोलन करना चाहिए। मैंने अपनी ही क्लास के 6 और लड़कों को चौक बाजार में आंदोलन के लिए तैयार किया।

हमने अपने हाथ से एक दूसरे को तिलक लगाया, माला पहनी, सर पर काला कपड़ा बांधकर सत्याग्रह पर निकल पड़े थे। हमारे पास 2 हजार पर्चे थे। हमने हवा में पर्चे उड़ाए, नारे लगाए। कुछ देर बार पुलिस आई और 14-15 साल के बच्चों को हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार कर ले गई। जेल में हमारे साथ खूंखार अपराधियों जैसा बर्ताव किया गया।

वो नवंबर का महीना था आज से 50 साल पहले कड़ाके की ठंड पड़ती थी। हमारे सारे कपड़े उतरवा दिए। हमारे साथ दो कैदी बंद थे उन्हें कंबल दिए गए। हमें ठंड से बचाव के लिए कंबल तक नहीं दिया। हम लोगों ने भी हार नहीं मानी पूरी रात दंड-बैठक और सूर्य नमस्कार कर शरीर को गर्म करते रहे। रात भर खाने को नहीं मिला। अगले दिन 2 पूड़ी और सब्जी मिली।

तपन भौमिक और संतोष शर्मा दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे।
तपन भौमिक और संतोष शर्मा दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे।

मीसाबंदी के तौर पर भी संघर्ष करना पड़ा मैं जेल से रिहा होकर सामान्य जीवन जीने लगा था। आगे की पढ़ाई के लिए अपनी स्कूल से टीसी मांगी तो उन्होंने टीसी पर मीसाबंदी लिख दिया, जिससे मेरा कहीं एडमिशन नहीं हुआ। मैंने उसके लिए लड़ाई लड़ी और स्कूल में दाखिला लिया। कुछ साल बाद मेरी सरकारी नौकरी लगी। डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के समय जब मुझसे मेरे पुलिस रिकॉर्ड के बारे में पूछा गया तो मैंने सच्चाई बताई कि मैं मीसाबंदी रहा हूं।

मेरे कागज देखते ही उन्होंने मुझे शासकीय सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। मैंने हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका लगाई। 17 महीने की लंबी लड़ाई के बाद मुझे सरकारी नौकरी मिली। मेरी पोस्टिंग ऐसी जगह की गई जहां सुविधाएं ही नहीं थी। वहां मैंने ईमानदारी से काम किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक फैसला, जो बना इमरजेंसी की नींव इमरजेंसी की पटकथा लिखी गई थी 12 जून 1975 को। इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इस दिन इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद्द कर दिया था। साथ ही 6 साल के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इंदिरा के खिलाफ राय बरेली से चुनाव लड़ने वाले राज नारायण ने यह याचिका दायर की थी।

उन्होंने आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया है। 24 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस कृष्णा अय्यर ने कहा कि जब तक कोर्ट में मामला चलेगा तब तक इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती हैं। लेकिन उन्हें संसद में किसी भी चर्चा और बिल पर वोट करने का अधिकार नहीं होगा।

इसी के अगले दिन यानी 25 जून को जयप्रकाश नारायण ने नई दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार के खिलाफ बड़ी रैली बुलाई थी। तब देश में महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोगों में गुस्सा पनप रहा था। जयप्रकाश पूरे देश में घूम-घूमकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। जेपी ने रैली में रामधारी सिंह दिनकर की कविता का अंश पढ़ते हुए कहा – ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’।

दिल्ली के रामलीला मैदान में 25 जून को हुई रैली में लोगों को संबोधित करते हुए जयप्रकाश नारायण।
दिल्ली के रामलीला मैदान में 25 जून को हुई रैली में लोगों को संबोधित करते हुए जयप्रकाश नारायण।

दूसरे दिन आकाशवाणी पर इमरजेंसी लगाने की घोषणा इंदिरा गांधी अब चौतरफा घिर चुकी थीं। इधर जेपी की रैली खत्म हुई और उधर इंदिरा गांधी राष्ट्रपति भवन पहुंचीं। 25-26 जून की दरमियानी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के आदेश पर दस्तखत करा लिए। 26 जून सुबह 6 बजे कैबिनेट की आपातकालीन बैठक बुलाई गई।

अभी तक देश को इस फैसले की भनक तक नहीं थी। इंदिरा गांधी ने ये फैसला लेने से पहले अपने मंत्रिमंडल से सलाह तक नहीं ली थी। करीब आधे घंटे चली कैबिनेट बैठक के बाद इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी पर देश में इमरजेंसी लगाने की घोषणा की। इसके साथ ही आजाद भारत के इतिहास के सबसे बुरे दौर की शुरुआत हो गई।

विपक्षी नेताओं समेत कांग्रेस के नेताओं को भी जेल में डाल दिया गया, प्रेस पर पाबंदी लगा दी गई, नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए गए और देश में लोकतंत्र खत्म हो गया।

इमरजेंसी की घोषणा करती हुईं इंदिरा गांधी।
इमरजेंसी की घोषणा करती हुईं इंदिरा गांधी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481