श्रीसद्गुरु उवाच” – कर्म बीज की भाँति जीवन में सुख-दुःख की फसल उगाते हैं

08 जून 2025 (रविवार) ?
।। श्री: कृपा ।।
? “श्रीसद्गुरु उवाच” – कर्म बीज की भाँति जीवन में सुख-दुःख की फसल उगाते हैं मनसा, वाचा, कर्मणा पावित्र्य और स्वयं के प्रति जागरूकता नितांत अपेक्षित है। सचेत रहना एक स्थिर जीवन और एक स्वस्थ मन का आधार है। सचेत रहने का अर्थ है सदैव एक जागरूकता की भावना बनाए रखना जिस के द्वारा आप स्वयं के विचारों एवं कार्यों को देख रहे हों। हमारा चिंतन ऐसा होना चाहिए कि हम कभी भी दूसरों के मन को आहत न करें। दरिद्र के प्रति, दीन के प्रति, अभावग्रसित के प्रति संवेदनशील रहें, उनका सम्मान करें इससे बड़ा विचार और क्या होगा कि हमारी संस्कृति ने दरिद्र को भी नारायण कहा है।
जैसा बीज बोएंगे, फल वैसा ही आएगा। हम सब चाहते हैं कि हमें जीवन में केवल आनन्द ही प्राप्त हो, परन्तु सदा ऐसे कैसे हो सकता है। हम सब चाहते हैं जीवन में केवल परम् सुख और शांति ही मिले, परंतु ऐसा भी कहाँ होता है। हमारे चाहने में और कर्म में विरोध है। जो जस करहि, तस फल चाखा। कर्म हमारा बीज है। जो बोएंगे, वही देर-सवेर काटेगें। बीज बोने में और फल काटने में समय का अंतराल हो सकता है। हम भूल जाते हैं कि हमने क्या बोया था। परन्तु प्रकृति को और उसके नियमों को भूलने की आदत नहीं है। फल ही प्रमाण है कि हमने क्या बोया था। कर्म ही से हमारा बंधन है, कर्म ही से हमारी मुक्ति है। कर्म के अनुसार ही हमारी गति व स्थिति है।
हमारी वास्तविक पहचान तो कर्मो से ही है – न धन से, न पद से, न बल से और न हमारी ज्ञान विद्वता से। हमारा ज्ञान सार्थक तब ही है जब हम आचरण में उतारें। ज्ञान और कर्म दो पंखों की तरह हैं जिनके सहारे से ऊंची उड़ान भरी जा सकती है। गीता ने तो स्पष्ट ही कहा है, हमें कर्म की स्वतंत्रता है, फल की नहीं। कर्म ही हमारा बंधन है, कर्म ही मोक्ष है। कर्म ही धन है, कर्म ही हमारा गर्भाषय है। कर्म से ही गति है, सुगति है। श्रेष्ठतम कर्म ही यज्ञ है।
ईश्वर से हम प्रार्थना करते हैं कि हमें सद्बुद्धि दे। क्यों? इसलिए कि हमारे कर्म विवेकपूर्ण हों, जिसके द्वारा सतकर्म हों। एक व्यक्ति नास्तिक है, ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता, परंतु वह सतकर्म करता है। उसे क्या फल मिलेगा? शुभ कर्मो के अनुसार शुभ फल मिलेगा। दूसरा व्यक्ति है तो आस्तिक, लेकिन कर्म खोटे करता है। खोटे कर्म के फल भी खोटे होंगे। ईश्वर सदा न्याय करता है और स्वयं भी अपने नियमों के बंधन में है।
कर्मशील व्यक्ति कर्म करते हुए विश्राम कर लेता है। कर्म में ही उसका विश्राम, हर्ष और आनंद निहित है।’’ कर्म की निरंतरता आपको गतिशील प्रगतिशील बनाए रखती है। आप अपनी ऊर्जा दूसरों को प्रभावित करने में खर्च न करें। “वरन” अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को शुभकार्यों में लगायें कल आपकी सफलता लोगों को खुद प्रभावित करेगी। जब हम बिना फल की इच्छा से कर्म करते हैं तब निष्काम-फल यानि अमृत-फल की उत्पत्ति होती है जिसे प्राप्त कर हम परम-आनन्द अवस्था में स्थित होकर जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्त हो परमगति को प्राप्त हो सकते हैं…।
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