सोयाबीन तेल पर परिवार का खर्च 2 हजार रुपए बढ़ेगा
किसानों के आंदोलन के बीच सोयाबीन तेल की कीमत 5 दिन में 100 से बढ़कर 125 रुपए प्रति लीटर हो गई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि तेल की कीमतें 150 रुपए के पार जाएंगी। इसका असर ये होगा कि हर महीने 5 लीटर तेल की खपत करने वाले परिवार पर 150 से 180 रुपए का भार बढ़ेगा। मतलब हर साल आपके घर के बजट में सिर्फ सोयाबीन तेल की कीमतें बढ़ने से 2 हजार रुपए का इजाफा होगा।
किसानों को इसका कितना फायदा होगा? सोया इंडस्ट्री को कितना मुनाफा होगा? खाने के दूसरे तेलों पर इसका क्या असर होगा? देश में सबसे ज्यादा 42% सोयाबीन पैदा करने वाले मध्यप्रदेश में इसका अर्थशास्त्र कैसे बदल रहा है? बीते 5 साल से खस्ताहाल पड़ी सोया इंडस्ट्री में कैसे चमक आ गई है? इन तमाम सवालों का जवाब जानिए, इस रिपोर्ट में…

पहले जानिए, क्यों महंगा हो रहा सोयाबीन तेल
केंद्र सरकार ने 14 सितंबर को कच्चे खाद्य तेलों पर इम्पोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) को 5.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 27.5 प्रतिशत कर दिया है। इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाए जाने के ऐलान के साथ ही एक हफ्ते में रिफाइंड सोयाबीन तेल के दाम 25 से 30 रु. प्रति लीटर बढ़ गए हैं। सोयाबीन के मंडी भाव में भी 700 रु. से 900 रु. की तेजी आ गई है।
इसके अलावा कच्चे सोयाबीन ऑयल, कच्चे पाम ऑयल और कच्चे सनफ्लॉवर ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) को 0% से 20% तक बढ़ा दिया है, जिससे कच्चे तेल पर प्रभावी शुल्क दर 27.5% हो गई है। इसके साथ ही रिफाइंड पाम ऑयल, रिफाइंड सनफ्लॉवर ऑयल और रिफाइंड सोयाबीन ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 12.5% से बढ़कर 32.5% तक हो गई है।
बाजार में बिकने वाले सोयाबीन तेल में 40 से 60 फीसदी पाम ऑयल मिलाया जाता है। सरकार के इस फैसले से पहले पाम ऑयल की कीमत 3985 रुपए प्रति सौ लीटर यानी करीब 40 रुपए प्रति लीटर थी। इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ने के साथ कीमतें 900 रुपए प्रति 100 किलो तक बढ़ जाएगी।

इम्पोर्ट ड्यूटी और बेसिक कस्टम ड्यूटी बढ़ाने से कैसे बढ़े दाम
सोयाबीन एक्सपर्ट आलोक ठक्कर कहते हैं कि भारत में ऑयल सीड इंडस्ट्री पिछले कुछ साल से बीज खरीदकर तेल उत्पादन करने से ज्यादा विदेशों से तेल आयात कर उसे रिफाइनिंग करने में ट्रांसफॉर्म हो गई है। इसकी वजह है कि यहां से सीड खरीदकर उसका कच्चा तेल बनाना इंडस्ट्री को महंगा पड़ता है।
इसे ऐसे समझिए कि 1 किग्रा सोयाबीन 50 रुपए में इंडस्ट्री ने खरीदा। इसमें से सिर्फ 17 से 18 प्रतिशत ही तेल निकलता है। बाकी 80 से 82 फीसदी सोयाबीन की खली यानी सोया डिओसी (डि ऑयल केक) निकलती है। इंडस्ट्री फायदे में तब रहेगी, जब तेल और डिओसी की कीमत बाजार में 50 रुपए से ज्यादा मिले।
जो इंडस्ट्री सोयाबीन से तेल निकाल रही थी, वह इम्पोर्ट ड्यूटी की वजह से घाटे में थी। इसकी पूर्ति के लिए उन्होंने सोयाबीन तेल में विदेशों से आयात किया 40 फीसदी पाम ऑयल या 60 से 80 फीसदी सस्ता कच्चा सोयाबीन तेल मिलाकर बेचना शुरू कर दिया था। इसकी वजह से बाजार में सोयाबीन तेल की कीमतें कम थीं।

एडिबल फूड ऑयल आयात करने में भारत नंबर 1
भारत 2020-21 में 165 लाख टन फूड ऑयल इम्पोर्ट करने के साथ दुनिया का सबसे बड़ा इम्पोर्टर बन गया है। इस साल 80 हजार करोड़ रुपए का फूड ऑयल इम्पोर्ट किया गया। इसमें सबसे ज्यादा 59 प्रतिशत हिस्सा पाम ऑयल का है।
भारत अपनी कुल जरूरत 256.41 लाख टन का सिर्फ 42 प्रतिशत ही उत्पादित करता है। 58.0 प्रतिशत तेल विदेश से आयात करना पड़ता है। भारत दुनिया में तिलहन का 5-6 प्रतिशत योगदान देता है।

सरकार के इस फैसले से क्या असर पड़ेगा…
हाउस वाइफ बोलीं- बजट गड़बड़ा जाएगा
इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ने से एक हफ्ते में सोयाबीन तेल की कीमत 30 से 35 रु. बढ़ गई है। भोपाल की हाउस वाइफ प्रमिला शर्मा कहती हैं कि मेरे परिवार में 5 सदस्य हैं। हम हर महीने 5 से 6 लीटर सोयाबीन तेल का इस्तेमाल करते हैं। दस दिन पहले तक तेल सस्ता था। अब तेल 30 रु. प्रति लीटर महंगा मिला है यानी अब नए सिरे से बजट बनाना पड़ेगा।
दरअसल, तेल के दाम बढ़ने से एक परिवार के बजट पर हर साल 2000 से 2500 रुपए तक का भार आएगा। साथ ही रेस्टोरेंट-होटल में भी खाना महंगा मिलेगा। हालांकि, किसान नेता केदार सिरोही कहते हैं कि रोजमर्रा के खर्च में तेल का खर्च बहुत कम होता है। एक परिवार 5-7 एमएल में एक वक्त का खाना बना लेता है।
यानी देखा जाए तो बमुश्किल 3 रुपए का अधिकतम खर्च एक वक्त के खाने पर आएगा। इससे परिवार पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा लेकिन किसान को बहुत फायदा मिलेगा।

किसान पर क्या असर पड़ेगा..
इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से सोयाबीन की डिमांड बढ़ेगी
सोयाबीन एक्सपर्ट आलोक ठक्कर कहते हैं कि देश के कुल सोयाबीन का 42 फीसदी उत्पादन मध्यप्रदेश में होता है। साल 2023 में करीब 60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुआई हुई थी और 54 लाख टन उत्पादन हुआ। इस साल भी 62 लाख हेक्टेयर उत्पादन होने की उम्मीद है।
मंडी में सोयाबीन के सही दाम न मिलने से किसान परेशान थे। अब कच्चे सोयाबीन तेल पर आयात शुल्क बढ़ने से किसानों को मंडी में ज्यादा दाम मिलेंगे। वे कहते हैं कि फसल आने से पहले मंडी में सोयाबीन 3800 रु. प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदा जा रहा था। अब सरकार के फैसले के लिए इंदौर की ही मंडी का भाव देखें तो ये 4700 रु. प्रति क्विंटल हो चुका है। वहीं, सरकार ने भी सोयाबीन को एमएसपी 4892 रुपए प्रति क्विंटल पर खरीदने का फैसला लिया है।

इंडस्ट्री पर क्या असर होगा…
इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ने से इंडस्ट्री को मुनाफे की उम्मीद
सोया इंडस्ट्री से जुड़े राजन मालवीय बताते हैं कि एमपी में 57 सॉल्वेंट एक्सट्रेक्शन प्लांट हैं। इनमें बहुत कम 100 फीसदी क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। इस वजह से मई 2022 में सिवनी मालवा के बनापुरा स्थित एशिया का सबसे बड़ा सोया प्लांट 9 करोड़ रु. में नीलाम हो गया।
वे बताते हैं कि पिछले 5 साल से सोया इंडस्ट्री बुरे दौर से गुजर रही है। बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज प्रोडक्शन नहीं कर पा रही हैं। मालवीय के मुताबिक सोया इंडस्ट्री से दो प्रोडक्ट निकलते हैं- पहला सोया ऑयल और दूसरा सोया डिओसी (डि ऑयल केक)। सोयाबीन के दाम 80 फीसदी तक डिओसी की कीमतों पर निर्भर करते हैं।

मालवीय कहते हैं कि इंडियन सोया डिओसी 6 साल पहले विदेशी मार्केट में 34 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से निर्यात होता था, लेकिन 6 साल बाद सोया डिओसी के दाम घटकर 32 रुपए प्रति किलो हाे गए हैं। पहले डिओसी के निर्यात पर सरकार प्रोत्साहन राशि भी देती थी लेकिन अब वह भी बंद कर दी गई है। यह सोया इंडस्ट्री के लिए दोहरी मार थी।
इसके बाद इंडस्ट्री सीधे विदेश से सस्ता क्रूड सोयाबीन ऑयल खरीदने लगी, जिससे सोयाबीन के दाम घटने लगे। मालवीय के मुताबिक, अब एडिबल क्रूड ऑयल पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ने से तेल के दाम बढ़ेंगे और इंडस्ट्री को भी मुनाफे की उम्मीद है। इंडस्ट्री सोयाबीन की खरीदी बढ़े हुए दाम पर करेगी, जिससे किसानों को भी सही कीमत मिलेगी।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डीएन पाठक भी कहते हैं कि विदेश से सस्ता तेल इम्पोर्ट हो रहा था तो तेल को उसी कीमत पर इंडस्ट्री बेच रही थी। मुनाफे की उम्मीद डीओसी से थी, लेकिन डीओसी के दाम भी उतने नहीं मिल रहे थे। इसकी वजह से इंडस्ट्री की क्रशिंग पावर कम हो गई। अब इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ने से विदेश से तेल आयात करना महंगा होगा। इंडस्ट्री घरेलू बाजार की तरफ रुख करेंगी।

