BJP ने 2 एक्स्ट्रा सीटें जीतीं, राज्यसभा में भी बहुमत के करीब NDA

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15 सीटों पर मंगलवार को हुए राज्यसभा चुनाव में जमकर क्रॉस वोटिंग हुई। इससे BJP को हिमाचल और उत्तर प्रदेश में 2 अतिरिक्त सीटें मिल गईं। हिमाचल में बराबर वोट मिलने के बाद मटकी से पर्ची निकाली गई, जो BJP उम्मीदवार के पक्ष में गई। चुनाव के बाद हिमाचल में कांग्रेस की सुक्खू सरकार पर भी खतरा मंडराने लगा है।

2024 में राज्यसभा की कुल 56 सीटें खाली हुई थीं। इनमें 41 प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की 15 सीटों पर वोटिंग हुई थी, जिसमें क्रॉस वोटिंग का खेल हुआ। BJP ने 10 सीटें, कांग्रेस ने 3 और सपा ने 2 सीटें जीतीं।

भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे चुनाव के बाद अब राज्यसभा में कौन-सी पार्टी कितनी ताकतवर है, चुनाव में कैसे खेल हुआ और क्रॉस वोटिंग करने वालों का क्या होगा

राज्यसभा के सांसदों का चुनाव कैसे होता है?
राज्यसभा के चुनाव का फॉर्मूला समझ लेंगे तो ये भी साफ हो जाएगा कि चुनाव इतना रोचक कैसे बना। किसी राज्य में राज्यसभा की जितनी सीटें खाली हैं, उन पर राज्य के विधायकों की संख्या के अनुसार वोट डाले जाते हैं। ये फॉर्मूला थोड़ा पेचीदा लग सकता है, इसलिए उत्तर प्रदेश के उदाहरण से समझिए…

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की कुल 10 सीटें खाली थीं। यहां विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या 399 है। अब सवाल है कि एक राज्यसभा उम्मीदवार को जीतने के लिए कितने वोटों की जरूरत होगी।

एक सीट के लिए जरूरी वोटों की संख्या निकालने के लिए राज्यसभा की 10 खाली सीटों में एक जोड़ने पर ये संख्या हुई 10+1 यानी 11। अब 399 को 11 से विभाजित करने पर 36 से कुछ अधिक आता है। इसमें एक जोड़ने के बाद कुल संख्या हुई 37। यानी उत्तर प्रदेश में एक राज्यसभा प्रत्याशी को जीतने के लिए 37 विधायकों के प्रथम वरीयता के मत चाहिए।

इन चुनावों में EVM मशीन का इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि बैलेट पेपर पर उम्मीदवार के नाम के आगे वरीयता लिखनी होती है। वोट डालने वाले विधायक, चुनाव कर्मियों द्वारा दी गई पेन से एक से चार तक की वरीयता का अंक लिख देते हैं।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी का कहना है कि राज्यसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का व्हिप लागू नहीं होता है। भले ही पार्टी व्हिप जारी करे। इसी वजह से राज्यसभा चुनाव में कई बार क्रॉस वोटिंग खूब होती है और रिजल्ट अनुमान के उलट हैरान करने वाला भी होता है। जैसा इस बार UP, हिमाचल और कर्नाटक में देखने को मिला।

उत्तर प्रदेश में खेल कैसे हुआ?
उत्तर प्रदेश में BJP के 252 विधायक हैं, जबकि उसके सहयोगी दलों के 34 विधायक हैं। कुल संख्या हुई 286। वहीं सपा के पास विधानसभा में कुल 108 विधायक हैं। सीधा गणित देखें तो प्रति सीट 37 वोटों के हिसाब से BJP के पास 7 राज्यसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त वोट थे। वहीं सपा अपने दो प्रत्याशियों को आसानी से जिता सकती थी, लेकिन इस तरह राज्य सभा की एक सीट खाली रह जाती है।

BJP ने 8 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, जबकि सपा ने 3 सीटों पर। BJP के प्रत्याशियों के नाम थे- आरपीएन सिंह, चौधरी तेजवीर सिंह, अमरपाल मौर्य, संगीता बलवंत, सुधांशु त्रिवेदी, साधना सिंह, नवीन जैन और संजय सेठ। वहीं सपा की तरफ से जया बच्चन, रामजीलाल सुमन और आलोक रंजन चुनाव मैदान में थे। सपा के तीसरे उम्मीदवार आलोक रंजन और बीजेपी के आठवें उम्मीदवार संजय सेठ के बीच सीधा मुकाबला था।

सभी 8 उम्मीदवार जिताने के लिए BJP को कुल 296 वोटों की दरकार थी, जबकि अपने तीनों उम्मीदवार जिताने के लिए सपा को 111 वोट चाहिए थे। यानी BJP के पास 10 वोटों की कमी थी। वहीं सपा के पास 3 वोटों की। BJP को राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल के दो विधायकों और मायावती की पार्टी बसपा के एकमात्र विधायक का भी वोट मिला। इसे भी जोड़ लें तो BJP को अब 7 और विधायकों के वोट मैनेज करने थे।

सपा के समर्थन में कांग्रेस के दो और विधायक थे। सपा के साथ एक और दिक्कत थी कि उसके दो विधायक, इरफान सोलंकी और रमाकांत यादव जेल में होने के चलते वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सकते थे। मतलब, कांग्रेस के समर्थन के बावजूद भी सपा को तीन वोटों की कमी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सपा के कुल 7 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। इनके नाम हैं- राकेश पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, मनोज पांडेय, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य। इससे सपा तीसरी सीट जीतने से दूर हो गई और BJP ने बाजी मार ली।

हिमाचल प्रदेश में खेल कैसे हुआ?
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के 9 विधायकों द्वारा BJP के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की बात सामने आ रही है। हिमाचल में राज्यसभा की एक सीट के लिए विधायकों की प्रथम वरीयता के 35 वोट चाहिए थे। विधानसभा का गणित से समझें तो इसकी कुल स्ट्रेंथ 68 की है। इनमें से कांग्रेस के 40 और BJP के 25 विधायक हैं। अपना कैंडिडेट जिताने के लिए BJP को 10 और वोटों की दरकार थी।

हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट के लिए कांग्रेस ने अभिषेक मनु सिंघवी को उम्मीदवार बनाया था। वहीं BJP के प्रत्याशी थे कांग्रेस के पूर्व विधायक हर्ष महाजन। हर्ष महाजन कभी पूर्व CM वीरभद्र सिंह के करीबी रहे हैं और उनके कांग्रेस के कई नेताओं से अच्छे संबंध हैं।

हिमाचल प्रदेश की विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा भी 35 है। कांग्रेस विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने के बाद कहा जा रहा है कि BJP ऑपरेशन लोटस भी शुरू कर सकती है। कांग्रेस के बागी विधायक अगर BJP का दामन थाम लेते हैं तो कांग्रेस की सरकार मुसीबत में आ जाएगी।

कर्नाटक में क्या खेल हुआ?
कर्नाटक में राज्यसभा की 4 सीटों के लिए मतदान हुए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक BJP के 2 विधायकों ने कांग्रेस के पाले में वोटिंग की। राज्य की विधानसभा में कुल सीटों की संख्या 224 है। कांग्रेस ने बीते साल 135 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई थी।

राज्य में BJP के 66 और JDS के 19 विधायक हैं। राज्यसभा चुनाव के फॉर्मूले के हिसाब से एक सीट पर जीत के लिए 45 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोट चाहिए थे। जबकि चुनाव मैदान में 4 सीटों पर कुल 5 उम्मीदवार खड़े हो गए। कांग्रेस ने अजय माकन, सैयद नासिर हुसैन और जीसी चंद्रशेखर को उम्मीदवार बनाया, जबकि BJP और JDS गठबंधन ने नारायणा कृष्णासा भांडगे और JDS के नेता डी कुपेंद्र रेड्डी को टिकट दिया।

इस लिहाज से BJP और JDS गठबंधन को 5 अतिरिक्त वोटों की दरकार थी। वोटिंग के दौरान ही खबर आई कि कांग्रेस के विधायकों को धमकी देने के आरोप में कुपेंद्र रेड्डी और उनके कुछ सहयोगियों के खिलाफ बेंगलुरु में FIR दर्ज की गई है। ये भी खबर आई कि BJP विधायक एसटी सोमशेखर ने कांग्रेस के पक्ष में वोट किया है। BJP के मुख्य सचेतक डोड्डानगौड़ा जी. पाटिल ने ये जानकारी दी।

क्या राज्यसभा में दूसरे दल के उम्मीदवार को वोट करने पर कार्रवाई नहीं होती है?
राज्यसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के विधायकों पर व्हिप लागू नहीं होता है। विधायक अपने विवेक से वोट कर सकते हैं, लेकिन इसमें एक पेंच होता है। राज्यसभा चुनाव में ओपन वोटिंग होती है। जो भी विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ जाते हैं, तो उनको पार्टी से निष्कासित किए जाने का प्रावधान है।

राजनीतिक दल को एक प्रार्थना पत्र स्पीकर को देना होता है ओर उस विधायक की सदस्यता रद्द कर दी जाती है। ऐसे में ये कहना कि राज्यसभा चुनाव में दूसरे दल के उम्मीदवार को वोट करने पर कार्रवाई नहीं होती है, ये सही नहीं है।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ओपन वोटिंग का प्रावधान इसीलिए बनाया था, ताकि विधायक दूसरे दलों से पैसा लेकर राज्यसभा चुनाव में वोट नहीं करें।

राज्यसभा में किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत होने का फायदा और नुकसान क्या है?
अमिताभ कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में राज्यसभा का चुनाव इस तरह से होता है कि लोकसभा और राज्यसभा में किसी एक दल को एक समय पर स्पष्ट बहुमत मिलना मुश्किल होता है।

अगर किसी बड़े दल के पास स्पष्ट बहुमत होता है तो इसका फायदा यह है कि छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों या निर्दलीय सांसदों की अपने समर्थन के बदले अनुचित मांगों को लेकर सरकार से मोलभाव करने की स्थिति खत्म हो जाती है।

हालांकि इसका नकारात्मक पहलू भी है। जब किसी एक दल के पास लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगहों पर बहुमत हो तो संसदीय कामकाज में आम सहमति बनाने की स्थिति कम हो जाती है। बड़ी पार्टी अपने मन से फैसला लेती है। वह छोटे और दूसरे दलों से सलाह नहीं लेती है। यह लोकतंत्र के लिए सेहतमंद स्थिति नहीं है।

1989 तक कांग्रेस पार्टी के पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत हुआ करता था। इस समय अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकार होती थी।

1989 से लेकर आज तक सभी सरकारों को राज्यसभा में महत्वपूर्ण विधेयकों पारित कराने में छोटे-छोटे दलों को साधना पड़ा है या विपक्षी दलों के साथ मिलकर आम सहमति बनानी पड़ी है। हालांकि इस स्थिति से भारतीय जनता पार्टी की सरकार धीरे-धीरे उबर रही है और बहुमत से सिर्फ 4 सीटें कम हैं।

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