सत्ता के गलियारे से..रवि अवस्थी
** वक्त की बात
समय व भाग्य दोनों परिवर्तनशील हैं लेकिन इसका भी वक्त तय है। धर्मधानी उज्जैन में लगभग तैयार हो चुके वैदिक वॉच टॉवर के मामले को ही लीजिए। तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री डॉ.मोहन यादव ने दो साल पहले इसके लिए भूमि पूजन किया।
टॉवर निर्माण व इस पर वैदिक घड़ी लगाने की शुरुआती अवधि तीन माह रखी गई। मुख्य अतिथि व लोकार्पण की तिथि भी तय हो गए,22 मार्च 2023। मगर ऐसा हो नहीं सका। इसके बाद तीन बार तिथियां और बदलीं। पहले 15 अगस्त,5 सितंबर और फिर 31अक्टूबर 2023। मामले की गंभीरता देखिए कि निर्माण में विलंब के लिए ठेकेदार पर पेनाल्टी भी लगी,लेकिन वह’घड़ी’नहीं आई।
इसे तो जैसे इंतजार था,अपने लिए जमीन तैयार करवाने वाले के मुख्यमंत्री बनने का। यह ‘घड़ी’अब नजदीक है। आगामी एक मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया की इस अदभुत वैदिक घड़ी का लोकार्पण करेंगे और विशिष्ट अतिथि होंगे,सीएम डॉ मोहन यादव।
** यात्राओं का सहारा
चुनाव के मौके पर जमीनी तैयारी की जगह कांग्रेस को यात्राओं का सहारा है। पार्टी सांसद राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे हैं तो मप्र में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी राम यात्रा निकालने की तैयारी में हैं। न्याय यात्रा की शुरुआत जिस उत्साह से हुई, वह अब फीका पड़ रहा है। इसके चलते 20मार्च को पूरी होने वाली यात्रा के शेड्यूल में कई बदलाव हुए।
मप्र में न्याय यात्रा दो मार्च को आएगी और करीब छह दिन रहेगी। बीते साल भी राहुल ने मप्र के 22 विधानसभा क्षेत्रों से होकर भारत जोड़ो यात्रा निकाली,लेकिन यहां इसका असर नहीं दिखा। उलटे,विधानसभा चुनाव में यात्रा वाली 22 में से 18 सीटें भाजपा के खाते में आ गईं। राम यात्रा का शेड्यूल अभी तय नहीं,लेकिन न्याय यात्रा की तरह समूचा फोकस आदिवासी अंचलों पर रहने के आसार है। इसे एक तरह का फॉलोअप कहा जा सकता है।
इस खींचतान के मायने
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने लक्ष्य में फेल क्या हुए। दिग्विजय ने फौरन दिल्ली दरबार की आंखों का तारा बनने की कवायद शुरू कर दी। न मौका था,न पार्टी का कोई कार्यक्रम,लेकिन दिल्ली पहुंच एक प्रदर्शन के बहाने गिरफ्तारी भी दे दी। दिखा दिया कि पार्टी में मप्र की सियासत के वही असली नेतृत्वकर्ता हैं। इधर,प्रतिस्पर्धी भी कम नहीं हैं।वे बार—बार उनका नाम लोकसभा उम्मीदवारी के तौर पर उछालकर कुछ और ही साबित करने की जुगत में हैं। इसके चलते पूर्व मुख्यमंत्री को भी दोहराना पड़ा कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे..,नहीं लड़ेंगे..।
** दिखने लगा सख्ती का असर
किसी भी सरकार के मुखिया को विजन व मिजाज को समझने यूं तो पांच साल भी कम पड़ते हैं,लेकिन प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने बीते दो माह में ही अपनी कार्यशैली से साफ कर दिया कि सुशासन को लेकर वह सख्त मिजाज हैं। पहली बार गेहूं भंडारण करने वाले गोदामों का सघन भौतिक सत्यापन और गड़बड़ी पर 176 को ब्लैक लिस्टेड किया जाना।
करीब सात साल पुराने 41 लाख रुपए के घोटाले मामले में कैग की रिपोर्ट पर अजा मैट्रिक हॉस्टल भोपाल के कर्मचारी की गिरफ्तारी और गुना हादसे के बाद बीते दो माह में 6हजार से अधिक यात्री बसों की सघन जांच और इनमें बड़े पैमाने पर पकड़ी गई गड़बड़ी। यह बताने के लिए काफी है कि जो पहले हुआ वह आगे नहीं चलेगा।वर्ना तो गुना से बड़े सड़क हादसे पहले भी हुए..लेकिन चंद दिनों की औपचारिक जांच और प्रचार के लिए फोटो सैशन के बाद मामले रफा—दफा हो गए।
** जमीन की तलाश
यूपी में पैर उखड़ने के बाद समाजवादी पार्टी अब मप्र में अपनी संभावनाएं तलाश रही है।गठबंधन के नाम पर खजुराहो संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ना मप्र में उसके भविष्य के लिटमस टेस्ट की तरह होगा।
पार्टी के नए कार्यालय के लिए खजुराहो में पांच एकड़ जमीन की खरीदारी उसकी उम्मीदों का खुलासा करती है। यानी बुंदेलखंड की सियासत के लिए खजुराहो सपा का अगला गढ़ होगा। इससे मप्र के साथ ही उप्र में भी अपनी खोई हुई जमीन को पाने का जतन भी वह करेगी।
आजादी के बाद मप्र की राजनीति दो दलीय रही है। क्षेत्रीय दलों में सिर्फ बीएसपी को वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में यहां एक सीट रीवा से सफलता मिली थी।
** जीत का लक्ष्य किसके लिए ?
गृह क्लेश से जूझ रहे टीवी कलाकार नीतीश भारद्वाज ने कहा कि अब तक वह’राम’ की तरह जी रहे थे,लेकिन’कृष्ण’अब युद्ध की भूमिका में आ गया है। नीतीश 90 के दशक में सर्वाधिक लोकप्रिय टीवी धारावाहिक महाभारत में भगवान कृष्ण की भूमिका निभा चुके हैं। इसी धारावाहिक से उन्हें प्रसिद्धि भी मिली।
नीतीश व उनकी पूर्व पत्नी आइएएस अधिकारी स्मिता घाटे का विवाद इन दिनों सड़कों पर है। इसी के चलते फिल्म कलाकार का यह बयान सामने आया। नीतीश भले ही अपनी तुलना’कृष्ण’से कर रहे हों,लेकिन वह यह भूल गए कि कर्मयोगी’कृष्ण’ का प्रेम तो नि:स्वार्थ था। जिससे उन्होंने सारी दुनिया को जीता। घृणा उनके व्यवहार में कभी रही ही नहीं फिर वह भले ही युद्ध में अर्जुन के सारथी क्यों न रहे हों। कमोबेश यही संदेश राधा ने भी दिया।
कहा भी गया—प्रेम वहीं हैं,जहां त्याग है।त्याग उस घृणा का,जिसके चलते बात यहां तक पहुंची। प्रेम उन किशोर बेटियों से,जिनका निर्दोष कोमल हृदय अपनों के इस क्लेश की तपिश से झुलस रहा होगा।फिर जीत का जो लक्ष्य है,वह किसके लिए?
**फिक्र किसकी?
किसी बड़े निजी संस्थान के आसपास के अतिक्रमण को हटाने के मामले में प्रशासन कितना फिक्रमंद होता है,राजधानी की भदभदा बस्ती इसकी बानगी है। एनजीटी के एक आदेश का हवाला देकर बस्ती के पौने चार सौ घरों को बलपूर्वक उजाड़ दिया गया।
पुनर्वास की बात तो फिर बेमानी ही है। दरअसल,यह बस्ती झील किनारे खड़ी पांच सितारा एक होटल की शान में गुस्ताखी कर रही थी। वर्ना एनजीटी के ऐसे आदेश तो पहले भी कितने आए।इन सभी पर अमल हुआ होता तो न केरवा,कोलार की पहाड़ी सीमेंट—कांक्रीट के जंगल में बदलती न बड़ी झील का डूब क्षेत्र बदसूरत हुआ होता।
** नाम बड़ा या काम
व्यापमं से पीईबी और अब मप्र कर्मचारी भर्ती मंडल।दो बार नाम बदलने के बाद भी इस संस्था की शैली में कोई बदलाव नजर नहीं आता। साढ़े छह हजार से अधिक पटवारी पदों के लिए जारी भर्ती मामले को ही लीजिए। आठ महीने तक मामले को ठंडा रखा गया और आनन—फानन में परीक्षा परिणाम कर भर्ती के लिए काउंसलिंग भी शुरू कर दी गई,लेकिन नया विवाद उन 13सौ16 स्नातक संविदा कर्मियों को लेकर जिनसे अब 5 साल का अनुभव प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है। भर्ती के लिए जरूरी आयु सीमा ही 21 से 25 साल है।
जाहिर है,ऐसे में अभ्यर्थी का 17 साल की उम्र में 12वीं,20साल में स्नातक और तत्काल ही पटवारी पद पर संविदा नौकरी पा जाना जरूरी है। यानी जब नौ मन तेल ही नहीं होगा तो,फिर लाटरी किसी और ‘राधा’की ही लगना तय है।
** खुदा खैर करे!
मुजफ्फरपुर से हाल ही में एक खबर आई कि पति के हमबिस्तर नहीं होने पर पुलिस ने उसके खिलाफ पत्नी की शिकायत पर एफआईआर कर ली। इंदौर में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को अपने पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश सुनाया।इंदौर में ही एक महिला को अपने दो बच्चों के पिता की शक्ल पसंद नहीं।इसके चलते उन्होंने अब तलाक की पेशकश कर दी।खुदा खैर करे! ☺️
