*चंबल के बीहड़ और जय भवानी का नारा… लूट और सिर्फ़ लूट राजनीतिक लुटेरे ?

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*चंबल के बीहड़ और जय भवानी का नारा… लूट और सिर्फ़ लूट राजनीतिक लुटेरे ?

राजेन्द्र सिंह जादौन

कभी चंबल के बीहड़ डकैतों की शरणस्थली हुआ करते थे। वहाँ धूल उड़ती थी, बंदूकें गरजती थीं और रात के अंधेरे में घोड़ों की टाप सुनाई देती थी। उन दिनों डकैतों को “बागी” कहा जाता था। कारण भी था। कई बागी ऐसे थे जो अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाने का दावा करते थे। कहानियाँ बनाई गईं कि वे अमीर साहूकारों को लूटते हैं और गरीबों की मदद करते हैं। गाँवों में उनके किस्से वैसे सुनाए जाते थे जैसे कोई लोककथा हो।

फिर वक्त बदला। बीहड़ों में बंदूकें कम हो गईं, लेकिन लूट खत्म नहीं हुई। फर्क सिर्फ इतना आया कि पहले डकैत चेहरे ढकते थे, अब चेहरे चमकते हैं। पहले घोड़े पर आते थे, अब लालबत्ती और काफिलों में आते हैं। पहले पुलिस पीछा करती थी, अब पुलिस सलामी देती है।

पान सिंह तोमर फिल्म का वह संवाद आज भी कानों में गूंजता है“बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत तो संसद और विधानसभा में होते हैं।” उस समय यह संवाद सिनेमाई लगा था, लेकिन आज यह देश की राजनीतिक आत्मकथा जैसा लगता है।

पहले डकैत डकैती डालने से पहले “जय भवानी” का नारा लगाते थे। कम से कम उन्हें पता था कि वे डकैती डालने जा रहे हैं। उनके हाथ में बंदूक होती थी, इरादा साफ होता था और सामने वाला जानता था कि उसे लूटा जा रहा है।

आज की राजनीति ने इस कला को आधुनिक बना दिया है। अब लूटने के लिए बंदूक की जरूरत नहीं पड़ती। अब नारों से काम चल जाता है। जनता को धर्म, जाति, राष्ट्रवाद और भावनाओं के ऐसे पैकेट थमा दिए गए हैं कि आदमी अपनी जेब कटने के बाद भी ताली बजाता रहता है।

पहले डकैत घर लूटकर चले जाते थे। आज व्यवस्था आदमी की पूरी जिंदगी गिरवी रख देती है। पेट्रोल महंगा, गैस महंगी, शिक्षा महंगी, इलाज महंगा… लेकिन नारे बिल्कुल मुफ्त। ऐसा लगता है जैसे सरकार ने अर्थव्यवस्था नहीं, “नारा उद्योग” शुरू कर दिया हो।

जनता भी बड़ी भोली है। पहले डकैत आते थे तो लोग दरवाजे बंद कर लेते थे। अब जो जितना बड़ा लुटेरा दिखता है, जनता उतनी बड़ी माला पहनाकर स्वागत करती है। आदमी अपनी ही जेब कटवाकर सेल्फी ले रहा है।

पहले बीहड़ों में डर था, अब टीवी डिबेट में डर है। पहले बंदूक देखकर आदमी सहम जाता था, अब सवाल पूछने से डरता है। क्योंकि अब डकैतों के पास सिर्फ हथियार नहीं, भक्त भी हैं।

राजनीति का नया गणित बड़ा अद्भुत है। सड़क टूटी हो सकती है, अस्पताल में दवा नहीं होगी, किसान कर्ज में डूबा होगा, बेरोजगार लाइन में खड़ा होगा… लेकिन अगर भीड़ सही नारा लगा रही है तो सब “रामराज्य” घोषित कर दिया जाएगा।

आज हालत यह है कि जनता राशन की लाइन में खड़ी है और नेता भाषण में विश्वगुरु बना रहे हैं। आदमी EMI भरते-भरते बूढ़ा हो रहा है और उसे बताया जा रहा है कि वह “अमृतकाल” में जी रहा है।

चंबल के पुराने डकैत कम से कम ईमानदार थे। वे सीधे कहते थे“जो है निकाल दो।”आज के राजनीतिक डकैत कहते हैं“सबका साथ, सबका विकास”… और फिर धीरे-धीरे आदमी की जेब, नौकरी, अधिकार और भविष्य सब निकाल लेते हैं।

सबसे मजेदार बात यह है कि पहले डकैत जंगलों में छिपते थे, आज जनता सच बोलने वालों को छिपने पर मजबूर कर देती है। क्योंकि अब लूट सिर्फ धन की नहीं, दिमाग की भी हो रही है।

धर्म अब आस्था कम और राजनीतिक एटीएम ज्यादा बन गया है। नारे ऐसे लगाए जाते हैं जैसे देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाँटा जा रहा हो। जो सवाल पूछे, वह देशद्रोही। जो ताली बजाए, वही राष्ट्रभक्त।

बीहड़ों के डकैतों ने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि आने वाले समय में उनसे बड़े कलाकार पैदा होंगे। वे सिर्फ जेवर और नकदी लूटते थे, आज वाले सपने लूट रहे हैं।

और जनता?जनता आज भी नारा लगा रही है…बस फर्क इतना है कि पहले डकैतों से डरकर लगाती थी, अब मोह में लगाती है।

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