मोदी जी, महिला आरक्षण की याद अब क्यों आई?
मोदी जी, महिला आरक्षण की याद अब क्यों आई?
राजेन्द्र सिंह जादौन
देश की राजनीति भी अजीब खेल है। जब जरूरत होती है, तब मुद्दे गायब रहते हैं और जब चुनावी मौसम आता है, तब वही मुद्दे अचानक “ऐतिहासिक” बन जाते हैं। महिला आरक्षण भी कुछ ऐसा ही किस्सा बन गया है।
नरेंद्र मोदी जी, आपसे एक सीधा सवाल है जब आपके पास पूर्ण बहुमत था, जब आपकी सरकार हर बड़े फैसले को “साहसिक” बताकर लागू कर रही थी, तब महिला आरक्षण की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई? तब तो आप चाहें तो अपनी पार्टी में ही 33 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर एक मिसाल कायम कर सकते थे। लेकिन नहीं, तब शायद यह “राजनीतिक रूप से जरूरी” नहीं था।
अब जब 2023 में बिल पास हुआ, तो पूरे देश में इसे “महिला सशक्तिकरण का नया युग” बताया गया। संसद में तालियाँ बजीं, टीवी चैनलों पर बहस हुई, और सोशल मीडिया पर इसे ऐतिहासिक फैसला घोषित कर दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ बिल पास कर देना ही सशक्तिकरण है?
कानून बना दिया, लेकिन लागू कब होगा इसका जवाब “जनगणना” और “परिसीमन” की शर्तों में छुपा दिया गया। यानी आज नहीं, अभी नहीं… कभी भविष्य में।
तो फिर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह फैसला वास्तव में महिलाओं को अधिकार देने के लिए था, या सिर्फ एक राजनीतिक संदेश देने के लिए?
मोदी जी, अगर नीयत साफ होती, तो शुरुआत खुद की पार्टी से होती। भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है, आपके पास संगठन की ताकत है, सत्ता की शक्ति है आप चाहें तो बिना कानून के भी महिलाओं को बराबर हिस्सेदारी दे सकते थे।
लेकिन आपने क्या किया? एक कानून बना दिया, जिसकी चाबी भविष्य के ताले में डाल दी। यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी को घर का नक्शा दे दिया जाए, लेकिन जमीन ही न दी जाए।
और सबसे दिलचस्प बात इस पूरे मामले में राजनीति की खुशबू साफ आती है। जिन राज्यों में विपक्ष मजबूत है, जहां चुनावी समीकरण जटिल हैं, वहां इस मुद्दे का इस्तेमाल अलग तरीके से किया जा रहा है। महिला आरक्षण अब सिर्फ सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं रहा, यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है।
मोदी जी, आपने हमेशा खुद को “निर्णायक नेता” बताया है जो फैसले लेने से नहीं डरता। फिर महिला आरक्षण के मामले में यह हिचकिचाहट क्यों?
तीन तलाक पर तुरंत कानून, नोटबंदी एक झटके में, GST रातों-रात लागू तो फिर महिला आरक्षण में यह “धीमी गति” क्यों?
क्या यह इसलिए कि इसका सीधा असर राजनीतिक समीकरणों पर पड़ता है? आपने देश को “नारी शक्ति” का संदेश दिया, लेकिन क्या वह शक्ति संसद में दिखेगी, या सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगी?
सवाल यह भी है कि क्या महिला आरक्षण सिर्फ एक “इवेंट” बनकर रह जाएगा? जैसे चुनावी मंचों पर महिलाओं को सम्मान देने की बात होती है, लेकिन टिकट बंटवारे में वही पुराने चेहरे दिखाई देते हैं।
मोदी जी, देश की महिलाएं अब सिर्फ नारों से संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें हिस्सा चाहिए, अधिकार चाहिए, और सबसे जरूरी तुरंत चाहिए। आपने बिल पास करके उम्मीद जरूर जगा दी, लेकिन उस उम्मीद को अधर में भी छोड़ दिया।
और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा वाक्य है आपने इतिहास तो बना दिया, लेकिन वर्तमान को इंतजार में छोड़ दिया।
आज देश पूछ रहा है क्या यह महिला आरक्षण सच में महिलाओं के लिए है, या फिर यह भी एक “सही समय” का इंतजार करता हुआ राजनीतिक हथियार है?
मोदी जी, अगर शुरुआत करनी ही थी, तो अधूरी क्यों की? अगर हिम्मत दिखाई, तो आधी क्यों दिखाई?
देश को कानून नहीं, बदलाव चाहिए। और बदलाव तब तक अधूरा है, जब तक वह जमीन पर नजर न आए।
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