भाजपा विधायक की बेटी का डॉन अवतार ?

0
Spread the love

*भाजपा विधायक की बेटी का डॉन अवतार ?*

 

व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

 

मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों एक अजीब-सी हवा चल रही है विकास की कम, दबंगई की ज्यादा। सत्ता के गलियारों से निकलकर यह हवा अब घरों के ड्राइंग रूम तक पहुँच चुकी है, और वहाँ से सीधे सड़कों पर उतर आई है। ताजा मामला सागर जिले की देवरी विधानसभा का है, जहाँ भाजपा विधायक बृजबिहारी पटेरिया की बेटी प्रियंका पटेरिया पर एक युवक के साथ मारपीट के आरोप लगे हैं।

 

घटना साधारण नहीं है, लेकिन कहानी बहुत परिचित है। एक आम नागरिक राजेश शर्मा अपने काम से बैंक गया था। उसे क्या पता था कि बैंक के बाहर “लोकतंत्र” का नया संस्करण उसका इंतजार कर रहा है। आरोप है कि उसे बाहर बुलवाया गया, सवाल पूछने पर गालियाँ मिलीं, और फिर जूते से पीटा गया। कारण? बताया गया “तुम मेरे पापा के खिलाफ काम कर रहे हो।” अब ज़रा इस वाक्य को गौर से देखिए “मेरे पापा के खिलाफ।”

यानी सत्ता अब विचारधारा या पार्टी की नहीं रही, वह “पापा की निजी संपत्ति” बन चुकी है। और जब सत्ता निजी हो जाती है, तो कानून सार्वजनिक नहीं रह जाता वह भी निजी हो जाता है।

 

मध्यप्रदेश में यह पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में नेताओं के बेटों, भाइयों, भतीजों और अब बेटियों तक का “एक्टिव रोल” बढ़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ये लोग पर्दे के पीछे रहते थे, अब खुले मंच पर हैं। लोकतंत्र के इस नए संस्करण में चुनाव जनता लड़ती है, जीत नेता जाते हैं, और राज उनके परिवार चलाते हैं।

 

कभी राजनीति में प्रवेश का मतलब होता था संघर्ष, त्याग और जनता से जुड़ाव। आज इसका मतलब हो गया है पहचान, पहुँच और प्रभाव। और अगर आप किसी विधायक, सांसद या मंत्री के रिश्तेदार हैं, तो यह “योग्यता” अपने आप ही मिल जाती है।

 

बड़ी विडंबना यही है कि जिस लोकतंत्र में जनता “जनार्दन” कही जाती है, उसी जनता को आज “पहचान दिखाओ” के दौर से गुजरना पड़ रहा है। आम आदमी अगर किसी नेता के खिलाफ बोल दे, तो उसे समझाया नहीं जाता उसे “सिखाया” जाता है।

 

कभी अटल बिहारी बाजपई जैसे नेता राजनीति में शालीनता और संवाद का उदाहरण हुआ करते थे। उनके समय में विरोधी भी सम्मान पाते थे। आज हालात ये हैं कि समर्थक भी सुरक्षित नहीं हैं, अगर उन्होंने सवाल पूछने की गलती कर दी।

 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह नहीं है कि एक आरोप लगा है, बल्कि यह है कि ऐसी घटनाएँ अब लोगों को चौंकाती नहीं हैं। समाज ने इसे “नॉर्मल” मानना शुरू कर दिया है। लोग कहते हैं “अरे, नेता का परिवार है, ऐसा तो होता रहता है।” जब गलत चीज़ें सामान्य लगने लगें, तो समझ लीजिए कि समस्या सिर्फ घटना में नहीं, मानसिकता में है।

 

राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन “परिवार की गुंडागर्दी” का यह नया अध्याय जरूर है। अब नेता सिर्फ चुनाव नहीं जीतते, वे अपने परिवार के लिए एक “इकोसिस्टम” तैयार करते हैं जहाँ उनका नाम ही पहचान है, और पहचान ही अधिकार।

 

और फिर शुरू होता है “डॉन अवतार” बिना पद के सत्ता, बिना जिम्मेदारी के अधिकार, और बिना डर के व्यवहार। यहाँ सबसे बड़ा सवाल कानून व्यवस्था पर भी उठता है। क्या एक आम व्यक्ति और एक विधायक के परिवार के सदस्य के लिए कानून बराबर है? कागजों में जरूर होगा, लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।

 

अगर एक आम नागरिक किसी को थप्पड़ मार दे, तो थाने का रास्ता सीधा होता है। लेकिन अगर वही काम कोई “खास” व्यक्ति करे, तो पहले फोन घुमते हैं, फिर सलाह-मशविरा होता है, और फिर कहीं जाकर मामला दर्ज होता है वो भी अगर दबाव ज्यादा हो जाए तो।

 

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत “समानता” होती है कानून के सामने सब बराबर। अगर यही सिद्धांत कमजोर पड़ गया, तो फिर लोकतंत्र सिर्फ चुनाव तक सीमित रह जाएगा। और जनता?

वह हर बार की तरह इस बार भी दो हिस्सों में बंट जाएगी एक हिस्सा कहेगा, “ये गलत है।” दूसरा हिस्सा कहेगा, “ये हमारे नेता हैं, कुछ सोचकर ही किया होगा।” यानी घटना से ज्यादा अहम हो जाएगा “कौन कर रहा है।”

 

देश में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा दिया जाता है, लेकिन कुछ जगहों पर “बेटी दबंग बनाओ” का अनौपचारिक कोर्स भी चलता नजर आ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह कोर्स किताबों से नहीं, सत्ता के गलियारों से सिखाया जाता है।

 

अगर यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा, तो आने वाले समय में चुनावी घोषणापत्र कुछ यूँ भी हो सकता है “हर विधायक के परिवार को एक-एक क्षेत्र दिया जाएगा, जहाँ वे अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा सकें।”

 

और जनता फिर वही करेगी चुनाव में लाइन लगाएगी, वोट डालेगी, और फिर पाँच साल तक यही सोचेगी कि उसने प्रतिनिधि चुना था या शासक। यह मामला किसी एक पार्टी या एक व्यक्ति का नहीं है। यह पूरे सिस्टम का आईना है, जिसमें सत्ता का चेहरा धीरे-धीरे बदल रहा है।

 

जरूरत इस बात की है कि राजनीति फिर से “सेवा” की ओर लौटे, “सत्ता प्रदर्शन” की ओर नहीं। नेताओं को यह समझना होगा कि उनका परिवार उनकी ताकत हो सकता है, लेकिन अगर वही परिवार उनकी छवि पर सवाल उठाने लगे, तो यह सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकता है।क्यों कि जनता देर से समझती है,लेकिन जब समझती है,तो फिर हिसाब भी पूरा करती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481