करो ज़ोरदार अभिनंदन एमपी पुलिस?

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*करो ज़ोरदार अभिनंदन एमपी पुलिस?*

 

व्यंग्य-राजेन्द्र सिंह जादौन

 

गुना जिले का 20 लाख का कांड ऐसे ही थोड़ी हुआ होगा। यह कोई एक दिन की चूक या अचानक हुई घटना नहीं लगती, बल्कि उस लंबी प्रक्रिया का नतीजा दिखाई देती है जो वर्षों से धीरे-धीरे पनपती रही है। जब व्यवस्था के भीतर छोटी-छोटी अनियमितताओं को नजरअंदाज किया जाता है, तो वही आगे चलकर बड़े घोटालों और कांडों का रूप ले लेती हैं।

 

प्रदेश में थाना स्तर पर जो माहौल बना हुआ है, वह किसी से छुपा नहीं है। सड़कों पर, हाईवे पर, चौक-चौराहों पर हर जगह “चेकिंग” और “चालानी कार्रवाई” के नाम पर एक अलग ही व्यवस्था चलती दिखती है। कागजों में यह सब कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए होता है, लेकिन हकीकत में कई बार यह कार्रवाई आम लोगों के लिए परेशानी और आर्थिक बोझ का कारण बन जाती है। लोग जानते हैं कि कहाँ रुकना है, कितना देना है, और कैसे आगे बढ़ जाना है यह एक अनकहा नियम बन चुका है।

 

अब जब इसी व्यवस्था में काम करने वाले कुछ लोग बड़ी रकम के मामले में फंसते हैं, तो आश्चर्य कैसा? जब रोज़-रोज़ छोटी रकम बिना पारदर्शिता के ली जाती है, तो धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है। और आदत जब बढ़ती है, तो लालच में बदलती है। यही लालच एक दिन बड़े कांड का रूप ले लेता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी शेर को अगर खून का स्वाद लग जाए, तो वह फिर साधारण शिकार से संतुष्ट नहीं रहता।

 

यहाँ सवाल सिर्फ उन लोगों का नहीं है जो इस कांड में पकड़े गए हैं या जिन पर कार्रवाई हुई है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जो इस तरह की मानसिकता को जन्म देती है। अगर नीचे स्तर पर गलत चीजें लगातार चलती रहती हैं और ऊपर तक उसकी अनदेखी होती रहती है, तो फिर एक दिन ऐसा विस्फोट होना तय है।

 

सरकार और विभाग की ओर से अक्सर ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई दिखाई जाती है सस्पेंशन, जांच, बयानबाजी। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? सस्पेंशन एक तात्कालिक कदम हो सकता है, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक उस व्यवस्था को नहीं बदला जाएगा, जिसमें इस तरह की प्रवृत्तियाँ पनपती हैं, तब तक ऐसे कांड रुकने वाले नहीं हैं।

 

यह भी एक सच्चाई है कि हर पुलिसकर्मी ऐसा नहीं होता। कई ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी भी हैं, जो पूरी निष्ठा के साथ अपना काम करते हैं। लेकिन जब सिस्टम में कुछ लोग गलत रास्ता अपनाते हैं और उन्हें लंबे समय तक रोका नहीं जाता, तो उसका असर पूरे विभाग की छवि पर पड़ता है। आम जनता के मन में अविश्वास पैदा होता है, और फिर हर वर्दी को शक की नजर से देखा जाने लगता है।

 

गुना का यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक संकेत है एक चेतावनी है कि अगर समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो ऐसे मामले आगे भी सामने आते रहेंगे। जरूरत है पारदर्शिता की, जवाबदेही की, और सबसे ज्यादा जरूरत है उस मानसिकता को बदलने की जिसमें “छोटी वसूली” को सामान्य मान लिया गया है।

 

अगर वास्तव में सुधार करना है, तो सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक बदलाव लाना होगा। टेक्नोलॉजी का सही उपयोग, सख्त निगरानी, और ईमानदार अधिकारियों को प्रोत्साहन ये कुछ ऐसे कदम हैं जो स्थिति को बदल सकते हैं। साथ ही, आम जनता को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा, ताकि वे गलत के खिलाफ आवाज उठा सकें।

 

अंत में सवाल फिर वही खड़ा होता है क्या यह सिर्फ कुछ लोगों की गलती है, या फिर पूरी व्यवस्था कहीं न कहीं इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है? और अगर जिम्मेदारी सामूहिक है, तो समाधान भी सामूहिक ही होना चाहिए।

 

*बाकी… मोहन राज में सब सस्पेंड है या फिर सब “सेट” है ये तय करना अब जनता के हाथ में है।*

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