नहीं रहे अनिल चाचाजी…अण्णा साहब

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हम सबके बीच से अनिल अग्निहोत्री चाचा( अण्णा साहब) अनंत यात्रा पर चले गए। अनिल चाचा का यूं अचानक चले जाना परिवार, उनके स्नेहजन और साहित्य साधकों के साथ सभी के लिए अपूरणीय क्षति है। वे साहित्यकार एवं महालेखाकार कार्यालय (प्रथम) ग्वालियर में लेखा अधिकारी (प्रशासन) रहे । स्व.अग्निहोत्री विश्व हिंदू परिषद की केंद्रीय मंत्री एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय महिला समन्वयक श्रीमती मीनाक्षी ताई पिश्वे के छोटे भाई थे। 74 वर्षीय स्व.अग्निहोत्री कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनकी अंतिम यात्रा मंगलवार 17 मार्च को सुबह 10 बजे निज निवास बी-115 समाधिया कॉलोनी से महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण मुक्ति धाम के लिए प्रस्थान करेगी। जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। स्व.अग्निहोत्री अपने पीछे पत्नी श्रीमती अपर्णा अग्निहोत्री, भाई अजय अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार सुबोध अग्निहोत्री, पुत्र अनुनय, बेटी निमिषा, भतीजे अभिनव, स्वप्निल, अर्पित सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

आशू भाई(अक्षत चतुर्वेदी) ने शोक संदेश में लिखा…
हुआ शांत अब वेग ‘अनिल’ का…
शब्द हो चले मौन…
गर्ज ढल चला अट्टहास का…
पर सृजन न होगा धौन!!
आदरणीय ‘अण्णा’ चाचा का यूँ अचानक चला जाना ‘कमल-वास्यम’ परिवार, उनके स्नेहार्जित वृहद परिवार और शिंदे नगरी के साहित्य साधकों, सभी के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका व्यक्तित्व, उनका प्रेम, उनका साहित्य और हाँ… काग़ज़ पर मोती सम उनकी लेखनी… मन में सदा उत्कीर्ण रहेंगे… 🙏ऊँ शांति🙏

…23 फरवरी की ही बात थी। मैं जब ग्वालियर गया तो सुबह अनिल अंकलजी से उनके समाधिया कॉलोनी स्थित घर कमल वास्यम में मिला। स्वास्थ्य खराब होने के चलते वे दिल्ली से लौटे थे। वे बोले सांस तेज चल रही है, लेकिन अब ठीक है। कई बातें हुईं। अपर्णा आंटीजी से मिला। पिताजी का जिक्र करते हुए आंटी जी ने कहा कि रामतीर्थ भाई साहब होते तो वे इनके साथ अस्पताल में ही रहते। जब-जब अंकलजी अस्पताल पहुंचे तो पिताजी साथ ही रहे।

हम विल्ब पत्र के तीन पत्ते हैं…
अभी कुछ समय पहले ही अंकलजी की किताब आँगन की बेल प्रकाशित हुई। इसमें भी गुरुजनों के साथ दोस्त हिमांशु चाचा और पिताजी के नाम का उल्लेख रहा। तीन दोस्त हिमांशु चाचा, पिताजी रामतीर्थ और अनिल चाचा। इन तीनों की दोस्ती की गहराई को कोई नहीं नाप सकता। प्रेम अथाह। अगर लड़ भी बैठे तो कब एक हो जाएं पता भी नहीं चले। इनके बीच में कोई पड़ता भी नहीं था। बाबा वेदमंगल के भक्त हमारे हिमांशु चाचा कहते थे कि हम तीनों विल्ब पत्र के तीन पत्ते हैं, जो शिव को प्रिय हैं। जब तीनों मिल जाएं तो रात से सुबह कब हो जाए पता भी नहीं चलता था। किस्से से लेकर साहित्य और घरों की चर्चा आम थी। मुझे इनके बीच रहने का सानिध्य मिला। कई यात्राओं में साथ रहा। उनका व्यक्तित्व, उनका प्रेम, उनका साहित्य पर पकड़ जोरदार थीं। उनके पास कई लेखकों की समीक्षा लिखने के लिए आती थीं। लेखन तो काग़ज़ पर मोती जैसा था। वे समय समय पर हमको मैसेज करते थे। बुधवार को ही

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