ज़्यादा ऊर्जा क्या होती है…?कहीं ज़्यादा चंदा तो नहीं?
ज़्यादा ऊर्जा क्या होती है…?कहीं ज़्यादा चंदा तो नहीं?
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
बड़े नेता जी मंच पर थे, माइक चमक रहा था, कैमरे मुस्कुरा रहे थे और शब्दों में गजब की “ऊर्जा” भरी हुई थी। उन्होंने अपने चहेते की तारीफ़ों के ऐसे पुल बाँधे मानो विकास की गंगा नहीं, बल्कि ऊर्जा की नर्मदा बहा दी हो। बोले अब वाला पहले वाले से बेहतर ऊर्जा के साथ काम कर रहा है। भीड़ ने तालियाँ बजाईं, लेकिन सवाल वहीं खड़ा रहा ये ऊर्जा आखिर किस चीज़ की बनी होती है?
पहले वाला इंसान को इंसान समझता था। गरीब की पीड़ा को आँकड़ों में नहीं, चेहरे पर पढ़ता था। पत्रकारों से प्रेम था, सवालों से नहीं घबराता था। उसकी ऊर्जा गलियों में दिखती थी, अस्पतालों में महसूस होती थी, और पंचायत से लेकर मंत्रालय तक इंसानियत की शक्ल में मौजूद रहती थी। काम धीमा सही, लेकिन दर्द समझने की रफ्तार तेज़ थी।
अब वाला आपकी ही तरह व्यापारी है। उसे इंसान नहीं, निवेश दिखता है। उसकी ऊर्जा फाइलों में नहीं, फंड में दिखाई देती है। व्यापारी मित्रता इसलिए नहीं बढ़ रही कि राज्य मजबूत हो, बल्कि इसलिए कि आपकी चौखट पर चंदे का वजन बढ़े। यही नई ऊर्जा है जिसका मीटर जनता की ज़रूरत से नहीं, दान-पेटी की मोटाई से नापा जाता है।
कहा जा रहा है राज्य पहले भी बीमारू था। बात सही है। लेकिन तब मरीज ज़मीन पर था, आज वेंटिलेटर पर है। फर्क बस इतना है कि अब हर सांस को “उपलब्धि” कहा जा रहा है और हर इंजेक्शन को “विकास”। ऊर्जा बढ़ी है, ऐसा दावा है लेकिन मरीज बोल नहीं पा रहा, इसलिए तालियाँ डॉक्टर बजा रहे हैं।
व्यापारियों से मिलने वाला चंदा राजनीति और राजनेताओं का पोषण करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन काश, आपने इस ऊर्जा पर चढ़े कर्ज़ को भी देख लिया होता। क्योंकि जब ऊर्जा कर्ज़ के तारों से दौड़ती है, तो वह रोशनी नहीं देती वह ब्याज पैदा करती है। तब ऊर्जा, ऊर्जा नहीं रहती, कर्ज़दार हो जाती है।
आज की राजनीति में ऊर्जा का मतलब मेहनत नहीं, मैनेजमेंट है। संवेदना नहीं, सौदेबाज़ी है। और जब नेता जी कहते हैं कि अब वाला ज्यादा ऊर्जा के साथ काम कर रहा है, तो जनता को समझ लेना चाहिए ऊर्जा का स्रोत बदल गया है। पहले वह लोगों के पसीने से आती थी, अब वह चंदे के करंट से दौड़ रही है।
सवाल बस इतना है ये ज़्यादा ऊर्जा किसके लिए है?
जनता के लिए… या चंदे के लिए? क्योंकि जिस दिन ऊर्जा का हिसाब दिल से नहीं, हिसाब-किताब से होने लगे उसी दिन विकास की लाइट जलती कम है और बिल ज़्यादा आता है।
