काश आज अटल होते …?
काश आज अटल होते …?
व्यंग्य – राजेंद्र सिंह जादौन
मैं वैसे तो कभी अटल बिहारी वाजपेयी से नहीं मिला, लेकिन उन्हें सुना बहुत है, पढ़ा बहुत है और उनके विचारों से प्रेरणा भी बहुत मिली है। शायद इसी कारण आज जब उनके 101वें जन्मदिन पर देशभर में आयोजन, उत्सव, भाषण और होर्डिंग्स की कतार लगी है, तो मन भीतर से सवाल करता है कि काश आज अटल होते तो क्या वे सच में खुश होते। सच कहूँ तो मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है वे चुपचाप कहीं बैठकर यह तमाशा देखते और भीतर ही भीतर रोते।
अटल कभी दिखावे के नेता नहीं थे। वे विचारों के आदमी थे। उनकी राजनीति में कविता थी और उनकी कविता में मनुष्यता। पत्रकारिता हो, संसद हो या प्रधानमंत्री का पद।हर जगह वे सत्य को स्वीकार कर आगे बढ़ने वाले नेता थे, न कि सत्य को ढककर ताली बटोरने वाले। आज जिन मंचों पर उनकी तस्वीरें लगाई जा रही हैं, उन्हीं मंचों पर खड़े लोग अगर अटल को सुन पाते तो शायद सबसे पहले वही मंच छोड़कर चले जाते।
आज अटल को याद करने वाले लोग अटल को नहीं, उनके नाम को याद कर रहे हैं। क्योंकि नाम से राजनीति आसान होती है, विचार से नहीं। आज की राजनीति के पास न कोई नया विज़न है, न कोई वैचारिक साहस। जो कुछ है वह पुरानी तस्वीरें, पुराने भाषणों के अंश और एक महान व्यक्तित्व की विरासत पर कब्जा करने की होड़ है।
पूरे आत्मविश्वास से कहा जा सकता है कि आज भाजपा में अटल जैसे विचारों वाला, उनकी तरह सोचने वाला, उनकी तरह असहमति को सम्मान देने वाला कोई नेता नहीं है। अटल ने विरोध को दुश्मनी नहीं बनाया, उन्होंने सवालों से डरना नहीं सिखाया। आज सवाल पूछना अपराध है और चापलूसी राष्ट्रभक्ति।
जिस मुकाम पर आज भाजपा खड़ी है, उसकी नींव अटल के अटल विश्वास ने रखी थी। लेकिन आज की राजनीति ने उस नींव पर विचारों की इमारत खड़ी करने के बजाय सत्ता का कूड़ा भर दिया है। गठबंधन की राजनीति को अटल ने गरिमा दी थी, आज वही राजनीति सौदेबाज़ी और भय का औज़ार बन चुकी है।
अगर आज अटल जीवित होते तो अपने नाम पर हो रहे इस राजनीतिक तमाशे से सबसे अधिक आहत होते। क्योंकि अटल को पूजा जाना पसंद नहीं था, वे तो सवाल खड़े करना सिखाते थे। वे जानते थे कि लोकतंत्र तालियों से नहीं, असहमति से मज़बूत होता है।
मैं यह दावा नहीं करता कि मैं अटल जैसा हो सकता हूँ। न मेरा कद है, न मेरी हैसियत। लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि उनके रास्ते पर चलकर सत्ता को आईना दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ। इसकी कीमत भी चुका रहा हूँ कभी उपेक्षा में, कभी आरोपों में, कभी अकेलेपन में। लेकिन मेरे कदम डगमगाने वाले नहीं हैं। क्योंकि मैंने भी अटल से ही सीखा है वीर तुम बढ़े चलो। चाहे आँधी हो, चाहे तूफ़ान हो, चाहे रास्ते में अपने ही क्यों न खड़े हों।
आज अटल होते तो न तालियों से खुश होते, न मालाओं से। वे बस इतना कहते नाम से नहीं, काम से याद करो। और शायद यही बात आज की राजनीति को सबसे ज़्यादा चुभती है।
