लाड़ली योजनाओं का प्रदेश और लापता बेटियों का सच?

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लाड़ली योजनाओं का प्रदेश और लापता बेटियों का सच?

व्यंग्य -राजेन्द्र सिंह जादौन

मध्यप्रदेश को योजनाओं का प्रदेश कहा जाता है। यहाँ समस्या पहले आती है, समाधान बाद में नहीं बल्कि साथ-साथ पोस्टर पर चिपक जाता है। जैसे ही कोई सवाल उठता है, सरकार तुरंत योजना का नाम बता देती है। महिलाओं की बात हो तो जवाब और भी तैयार रहता है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ; लाड़ली बहना; नारी सम्मान; सशक्तिकरण। सुनने में सब कुछ इतना सुंदर लगता है कि लगता है जैसे इस प्रदेश में बेटियाँ नहीं, सिर्फ़ देवियाँ जन्म लेती हों। लेकिन ज़रा परदे के पीछे झाँकिए, वहाँ तस्वीर कुछ और ही दिखती है। वहाँ पोस्टर नहीं, आँकड़े बोलते हैं। और आँकड़े बहुत बेरहम होते हैं, वे तालियाँ नहीं बजाते, वे सवाल करते हैं।

आँकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश उन राज्यों में सबसे आगे है जहाँ महिलाएँ और बेटियाँ सबसे ज़्यादा लापता होती हैं। यह कोई विपक्षी बयान नहीं है, यह सरकारी रिकॉर्ड है। 2019 से 2021 के बीच लगभग दो लाख महिलाएँ और लड़कियाँ इस प्रदेश से गायब हुईं। दो लाख। यह संख्या इतनी बड़ी है कि अगर इन्हें एक जगह खड़ा कर दिया जाए तो कई शहरों की आबादी पीछे छूट जाए। लेकिन यहाँ इन्हें खड़ा नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये लापता हैं। और लापता लोग सरकार के लिए सबसे सुविधाजनक होते हैं न सवाल पूछते हैं, न वोट डालते हैं।

अब अगर हालिया समय की बात करें, तो तस्वीर और डरावनी हो जाती है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में, जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच, तेईस हज़ार से ज़्यादा महिलाएँ और बेटियाँ लापता दर्ज की गईं। यानी औसतन हर दिन चालीस से पैंतालीस महिलाएँ और लड़कियाँ। यह कोई त्योहार का आँकड़ा नहीं है जो साल में एक बार आता हो, यह रोज़ का हिसाब है। सुबह अख़बार आता है, शाम तक कोई बेटी गायब हो जाती है, और रात तक फ़ाइल में “जांच जारी है” लिख दिया जाता है।

सरकार और पुलिस के पास इसका जवाब भी उतना ही सरल है जितना योजनाओं का नामकरण। कहा जाता है कि ज़्यादातर मामले प्रेम प्रसंग के हैं। प्रेम प्रसंग यह शब्द अब प्रशासनिक हथियार बन चुका है। जहाँ मामला उलझा, वहाँ प्रेम प्रसंग लिख दो। जहाँ जिम्मेदारी तय होनी हो, वहाँ प्रेम प्रसंग का पर्दा डाल दो। सवाल यह है कि क्या इस प्रदेश में अचानक प्रेम का ऐसा सैलाब आ गया है कि रोज़ दर्जनों नाबालिग लड़कियाँ उसी में बहकर गायब हो रही हैं? क्या चौदह-पंद्रह साल की बच्चियाँ इतनी स्वतंत्र और सुरक्षित हैं कि वे प्रेम के नाम पर घर, स्कूल, मोहल्ला सब छोड़ दें और फिर कभी वापस न आएँ?

अगर सच में ऐसा है, तो यह सरकार की उपलब्धि नहीं, उसकी सबसे बड़ी विफलता है। क्योंकि प्रेम अगर असुरक्षा पैदा कर रहा है, तो सुरक्षा व्यवस्था कहाँ है? लेकिन इन सवालों पर चुप्पी साध ली जाती है। चुप्पी भी यहाँ एक नीति है। जितना कम बोला जाए, उतना बेहतर। जितना कम माना जाए, उतना सुरक्षित।

सरकार ऑपरेशन मुस्कान का ज़िक्र करती है। नाम सुनकर लगता है जैसे हर लापता बेटी को मुस्कुराते हुए घर पहुँचा दिया गया हो। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हज़ारों परिवार आज भी थानों के चक्कर काट रहे हैं। कई माँएँ अब थाने में कुर्सी नहीं ढूँढतीं, उन्हें पता है कहाँ बैठना है। कई पिता अब आवेदन की भाषा सीख चुके हैं, उन्हें मालूम है किस अफ़सर से कैसे बात करनी है। यह सशक्तिकरण नहीं है, यह मजबूरी का प्रशिक्षण है।
जिस प्रदेश में महिलाओं के नाम पर सबसे ज़्यादा योजनाएँ हैं, वहीं महिलाएँ सबसे ज़्यादा लापता हैं। लाड़ली बहना योजना से सरकार को राजनीतिक ताक़त ज़रूर मिली, लेकिन उसी समय लापता बहनों की संख्या भी बढ़ती गई। फर्क बस इतना है कि योजना वाली बहनें मंच पर दिखाई देती हैं और लापता बहनें आँकड़ों में दफ़न हो जाती हैं। मंच पर ताली बजती है, आँकड़ों पर फ़ाइल बंद हो जाती है।

जब सवाल ज़्यादा तेज़ हो जाते हैं, तो कहा जाता है कि ज़्यादातर लड़कियाँ मिल जाती हैं। यह भी एक दिलासा है। लेकिन जो नहीं मिलतीं, उनका क्या? जो सालों से गायब हैं, जिनकी उम्र अब काग़ज़ों में बढ़ रही है, लेकिन तस्वीर वही पुरानी है, उनका क्या? क्या वे किसी योजना की अगली किस्त में शामिल होंगी? या फिर अगली रिपोर्ट में सिर्फ़ एक संख्या बनकर रह जाएँगी?

यह भी एक अजीब संयोग है कि जब-जब सरकार असहज होती है, पुलिस आगे कर दी जाती है। और जब-जब पुलिस पर सवाल आते हैं, तो समाज को दोष दे दिया जाता है। समाज खराब है, परिवार सख़्त हैं, प्रेम प्रसंग हैं। यानी हर कोई दोषी है, सिवाय उस सिस्टम के जो सुरक्षा का दावा करता है।

आज मध्यप्रदेश में कई घर ऐसे हैं जहाँ दरवाज़ा शाम को जल्दी बंद नहीं होता, इस उम्मीद में कि शायद बेटी लौट आए। कई कमरों में किताबें रखी हैं, कपड़े टंगे हैं, लेकिन आवाज़ नहीं है। यह सिर्फ़ अपराध का मुद्दा नहीं है, यह संवेदना का संकट है। यह उस शासन शैली का परिणाम है जिसमें योजना ज़्यादा ज़रूरी है और इंसान कम।
अगर यही हाल रहा, तो शायद सरकार को एक नई योजना शुरू करनी पड़े।लापता बेटी खोजो अभियान। पोस्टर लगेंगे, विज्ञापन चलेंगे, भाषण होंगे। और शायद तब भी कोई बेटी नहीं मिलेगी, लेकिन योजना ज़रूर चलती रहेगी।

आख़िर में सवाल बहुत सीधा है। अगर यह प्रदेश सच में बेटियों का है, तो बेटियाँ कहाँ हैं? और अगर बेटियाँ सुरक्षित हैं, तो हर दिन यह आँकड़ा क्यों बढ़ रहा है? इन सवालों का जवाब पोस्टर पर नहीं मिलेगा, न ही भाषण में। जवाब मिलेगा उस दिन, जिस दिन सरकार आँकड़ों को नहीं, इंसानों को देखेगी। वरना इतिहास यही लिखेगा कि यह वह दौर था जब योजनाएँ ज़िंदा थीं और बेटियाँ लापता।

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