०प्रतिदिन विचार (28/05/24)आँकड़ों पर नहीं, बेरोज़गारी की हक़ीक़त पर बात कीजिए -राकेश दुबे

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दावों के विपरीत देश में बेरोजगारी का संकट बदतर होता जा रहा है, 4जून को बनने वाली सरकार के सामने सबसे पहली और बड़ी समस्या यही होने वाली है । एक डाटा सरकारी तौर पर सामने आया है कि मोदी सरकार ने अपने 10 साला कार्यकाल के दौरान 51.40 करोड़ रोजगार मुहैया कराए हैं। इसमें सरकारी नौकरियां, स्वरोजगार और निजी क्षेत्र में नौकरियां और दिहाड़ीदार रोजगार आदि शामिल हैं। डाटा के अर्थ हैं कि हर साल औसतन 5.14 करोड़ रोजगार के अवसर पैदा किए गए। यह भी दावा है कि 43 करोड़ से अधिक लोगों को मुद्रा लोन दिए गए। जाहिर है कि वे भी रोजगार का एक हिस्सा हैं।
आँकड़े कहते हैं कि सरकार की 12 परियोजनाओं के तहत 19.79 करोड़ रोजगार दिए गए। यदि यूपीए सरकार मनरेगा दिहाड़ी को रोजगार मानती थी, तो मोदी सरकार के दौरान ऐसे अवसरों को ‘रोजगार’ क्यों नहीं माना जा सकता। करीब 180 देशों में रोजगार का यही प्रारूप लागू है। यह भी दावा किया गया कि रोजगार की 3.35 प्रतिशत सालाना बढ़ोतरी दर दर्ज की गई है। इन दावों के विपरीत देश में बेरोजगारी का संकट बदतर होता जा रहा है। सरकारी आंकड़ा 6.7 प्रतिशत का बताया जा रहा है, लेकिन निजी सर्वेक्षण कंपनियों के निष्कर्ष हैं कि देश भर में, सभी धर्मों, समुदायों, जातियों, जमातों में बेरोजगारी का औसत 2023-24 के दौरान 8.03 प्रतिशत रहा है। रोजगार का यही औसत 37.18 रहा है।
आम चुनाव के 6 चरणों में केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे सम्पन्न राज्यों से लेकर बिहार, ओडिशा, राजस्थान सरीखे अपेक्षाकृत गरीब राज्यों तक बेरोजगारी ही सबसे बड़ी गूंज रही है। मतदाता, रिपोर्टर, चुनाव विश्लेषक, जनमत सर्वेक्षणों और पार्टी कार्यकर्ताओं आदि ने यह मुद्दा महसूस किया और उठाया है।
सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष सामने आया है कि 29 प्रतिशत से अधिक लोग बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा और संकट मानते हैं, लेकिन चुनाव इस मुद्दे पर नहीं लड़ा गया , लिहाजा वे क्षुब्ध हैं। बेरोजगारी की यह निराशाजनक स्थिति कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि भारत के युवा बेरोजगारी की समस्या लगातार झेलते रहे हैं। कोरोना महामारी के बाद यह समस्या बढ़ी और बदतर हुई है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के ताजा डाटा के अनुसार, जनवरी-मार्च तिमाही में बेरोजगारी दर, 15-29 आयु वर्ग में, 17 प्रतिशत रही है। सरकारी डाटा से यह करीब तीन गुना ज्यादा है। इस आयु-वर्ग में दहाई में बेरोजगारी का संकट पिछले कई सालों से गहराता जा रहा है। दरअसल अवैतनिक काम बढ़ रहा है, गैर-श्वेत कॉलर के काम (हुनरमंद श्रम) घट रहे हैं, स्वरोजगार एक अंतिम विकल्प है, उसमें भी कम आय वर्ग वालों को घाटा ही हो रहा है। असल दिहाड़ी भी मिलना मुश्किल है। यह स्थिति तब है, जब औसतन 50 लाख लोग सालाना कार्यबल में शामिल हो रहे हैं।
भारत की औसतन रोजगार दर, बीते आठ सालों के दौरान, 5.6 प्रतिशत गिरी है। श्रम बल भागीदारी दर के मद्देनजर देखें, तो सवर्णों में हिंदुओं की भागीदारी दर सबसे कम है। ओबीसी और अनुसूचित जातियों, जो दो सबसे बड़ी कामकाजी उम्र की आबादी हैं, उनमें सबसे तेज गिरावट देखी गई है। बेरोजगारी के कई बुनियादी कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि सरकारी नौकरियां बेहद सीमित हैं।वे मायावी-सी हैं, दुष्प्राप्य हैं, 144 करोड़ के देश के हरेक पात्र नागरिक को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती।
नौकरियों के लिए परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं, तो पहले ही पेपर लीक हो जाते हैं। उसका माफिया भी देश में सक्रिय है। देश में निजी शैक्षणिक संस्थान, कॉलेज, विश्वविद्यालय कुकुरमुत्तों की तरह फैल गए हैं। यह भी एक विस्फोटक स्थिति है। वे अधकचरे स्नातक पैदा कर रहे हैं, लेकिन उनके लिए नौकरियां नहीं हैं। सभी की प्राथमिकता सरकारी नौकरी की है। ऐसी स्थिति में कोई भी सरकार बेरोजगारी को नियंत्रित कैसे कर सकती है? ऐसे में कई युवा रोजगार-घोटालों के शिकार होते हैं, विदेश भेज कर उन्हें सीधा युद्ध के मैदान में उतार दिया जाता है, नतीजतन कुछ युवा तो अनाम मौत के शिकार हुए हैं। ऐसा ही रूस का एक मामला सामने आया था। उसमें केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप भी किया था। ऐसे उदाहरण बेरोजगारी की ही देन हैं। इसी संदर्भ में केंद्र सरकार की ‘अग्निवीर’ योजना की भी छीछालेदर की जाती रही है। बेरोजगारी का चुनावी प्रभाव इतना अधिक हो अथवा न हो, लेकिन युवा स्पष्ट संदेश दे रहे हैं

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