“यह जनसंपर्क वाणी का उज्जैन केंद्र है… और आप सुन रहे हैं जनसंपर्क गाथा!”
जनसम्पर्क गाथा (भाग-5)
“यह जनसंपर्क वाणी का उज्जैन केंद्र है… और आप सुन रहे हैं जनसंपर्क गाथा!”
जनसम्पर्क विभाग में अपर संचालक पद को लेकर कल दिनभर उठा-पटक चलती रही। सुबह शुरू हुई हलचल शाम होते-होते ठंड में सिमट जरूर गई, लेकिन विभाग के भीतर उबलन अभी भी जस की तस है।
अगर सेटअप की रीढ़ देखें तो कमिश्नर पद को छोड़ बाकी सभी पद संचालक, अपर संचालक, उप संचालक, सहायक संचालक पूरी तरह विभागीय कैडर के हैं। इन पदों पर विभागीय अधिकारियों का नैसर्गिक हक किसी भी नियमावली में दर्ज है। फिर यह प्रयोग क्यों? और किसके इशारे पर?
कल हुई घटनाओं के बाद पाँच राज्यों के जनसंपर्क संगठनों ने हड़ताल का समर्थन दे दिया।
प्रदेश भर के कई पत्रकार संगठनों युवा पत्रकार संघ, खोजी पत्रकार यूनियन, IFWJ ने भी स्पष्ट रूप से विभागीय अधिकारों के समर्थन में खड़े होने का ऐलान किया।
दिनभर यह घटना सोशल मीडिया पर ट्रेंड करती रही।
लेकिन विडंबना देखिए जिन टीवी चैनलों को वर्षों तक थैला भर-भर कर विज्ञापन दिए गए, उन्होंने इस मुद्दे पर एक लाइन चलाने की भी हिम्मत नहीं जुटाई। न ख़बर, न बहस, न पैनल… बस मौन।
सबसे बड़ा सवाल यही है -आखिर किसने यह आइडिया दिया कि विभागीय पद पर राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को बैठाया जाए? कौन है जिसने जनसम्पर्क की मशीनरी में यह ‘पंजाबी तड़का’ डाल दिया? यह प्रश्न अभी भी अधूरा है… और जवाब देने को कोई तैयार नहीं।
कुछ सूत्रों का दावा है कि विभाग में ऐसे कई “बिना पैंदी के लोटे” सक्रिय हैं, जो लगातार ऐसी सलाहें देकर विभागीय व्यवस्था को दांव पर लगा रहे हैं। ऐसे भड़काऊ दिमागों को यदि रीवा या और दूरस्थ जिम्मेदारियों में भेज दिया जाए, तो शायद विभाग का तापमान थोड़ा कम हो।
ईधर टीवी विज्ञापनों की फाइलों का हाल भी खराब बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक लगातार फाइलें पुनः प्रस्तुत कर वापस लौटाई जा रही हैं। काम रुक रहा है, संदेश रुक रहे हैं, और विभाग धीमा हो रहा है।
कुछ चर्चाएँ यह भी कहती हैं कि एक अधिकारी ने अपर संचालक पद पर किसी पारिवारिक व्यक्ति को लाने की कोशिश की थी, लेकिन दांव उलटा पड़ गया। (यह बातें केवल दफ्तर के गलियारों में चल रही चर्चाएँ हैं।)
जनसंपर्क जैसे बुद्धिजीवी, रचनात्मक, नीति-निर्देशक विभाग को अधिकारियों की आपसी खींचतान ने अखाड़ा बना दिया है। सेट-अप के मूल ढाँचे को तोड़कर व्यक्तिगत लाभ के लिए शक्ति-प्रदर्शन हो रहा है। यह विभाग पब्लिक पॉलिसी, मीडिया मैनेजमेंट, रणनीति और जनहित का केंद्र है लेकिन अंदरूनी राजनीति ने इसकी आत्मा को चोट पहुँचाई है।
स्थिति अब इतनी उलझ चुकी है कि मुख्यमंत्री को खुद संज्ञान लेकर सेटअप के अनुसार पदोन्नति करके अपर संचालकों के पद भरने, योग्य और वरिष्ठ विभागीय अधिकारी को संचालक बनाने, और जबलपुर, रीवा, ग्वालियर, इंदौर तथा उज्जैन (सिंहस्थ को देखते हुए) वरिष्ठ अधिकारियों की तत्काल नियुक्ति करने की जरूरत है। तभी जनहितैषी योजनाओं का प्रचार-प्रसार प्रभावी हो सकेगा और जनता तक सही सूचना पहुंच पाएगी।
जनसम्पर्क सृजनशीलता, संवेदना और संचार का विभाग है। इसमें IPS या राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तभी तक ठीक लगते हैं, जब तक वे सेटअप के दायरे में फिट बैठते हों। लेकिन यदि नियम ही इसकी अनुमति नहीं देते, तो विभागीय कैडर की अनदेखी समझ से परे है।
जनसम्पर्क की सेहत तभी ठीक होगी जब जनसम्पर्क को जनसम्पर्क वालों के ही हाथ में छोड़ा जाए।
