
पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “सेवा हि परमो धर्म: ..!” सेवा से अहंकार का विसर्जन एवं निर्मल अंतःकरण की निर्मिति होती है। सेवा, परमार्थ और ईश्वरीय समर्पण सनातन संस्कृति की अत्यन्त सुदीर्घ अभिव्यक्तियाँ हैं। अतः प्राप्त सम्पदा साधनों का विनियोग परहित और साधनहीन अभावग्रसितों के प्रति हो …। जब व्यक्ति में पारमार्थिक प्रवृत्तियाँ जाग्रत होती हैं, तब वह व्यक्ति मात्र मनुष्य ही नही, अपितु संस्था अथवा सिद्धान्त बन जाता है। जैसे ही आप सेवा के लिए प्रस्तुत होते हैं, तब आप अनन्त हो जाते हैं। सेवा भारतीय संस्कृति की अत्यन्त सुदीर्घ अभिव्यक्ति है। हमारे पास जो कुछ भी है उनमें सबके अंश भी समाहित है। वृक्ष, धरती, अम्बर, अग्नि, जल, पवन प्रकाशादि के रूप में परमात्मा स्वयं भी सेवा और पारमार्थिक कार्यों में ही संलग्न है। सेवा, औदर्यता एवं त्याग, परोपकार की प्रवृत्तियाँ मनुष्य में दैवत्व का आरोहण करती हैं। एतदर्थ, अपनी आत्मीयता का विस्तार कीजिए और सेवाव्रती बनें। भगवद प्राप्ति के लिए अत्यन्त सहज-श्रेष्ठ, लोक-प्रतिष्ठित और महापुरुषों द्वारा आचरित मार्ग है – सेवा ! सेवा साधन नही, अपितु समस्त साधनों की फलश्रुति है। अभिमान रहित – निष्काम सेवा भाव से परमात्मा सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं, साथ ही सेवा से साधक के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक रूपान्तरण और अहंकार का निर्मूलन होता है। निःस्वार्थ सेवा द्वारा साधक देव-अनुग्रह को अनुभव करने लगता है। अतः परमात्म-प्रसन्नता अर्जन के लिए निराभिमानी एवं सेवाव्रती बनें ! प्राणीमात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है – “ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूत हिते रता: …”। जो सब जीवों का हित-चिन्तन करते हैं, वो मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें तथा सेवाभावी बनें। दिन-दु:खियों की सेवा, निर्बल की रक्षा और रोगियों की सहायता सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। प्राणी मात्र के प्रति दया, उदारता और पारमार्थिक प्रवृत्तियाँ ही मानव जीवन की श्रेष्ठता को उजागर कर धन्यता की अनुभूति प्रदान करती है। युग-युगान्तर से प्रचलित वाणी “सेवा परमो धर्म:” को आत्मसात् कर चरितार्थ करने वालों को ही भविष्य में महामानव की उपाधि मिलती है। निष्काम सेवा लोक-परलोक दोनों में अंग-संग रहती है। अतः राष्ट्र सेवा, माता-पिता सेवा, सभी प्राणियों की सेवा को धर्म समझें। केवल मानवजाति की ही नहीं, बल्कि विश्व के समस्त जीव-जन्तुओं की सेवा आवश्यक है। अतः सेवा के माध्यम से सभी प्राणियों के संरक्षण से ही विश्व में स्थिरता, पर्यावरण संतुलन के साथ-साथ सम्पूर्ण संसार की रक्षा सम्भव है …।