माई के लाल को मामा की धौंस का खामियाजा -Sreeprakash dixet

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माई के लाल को मामा की धौंस का खामियाजा
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भुगत रहा एमपी का सरकारी तंत्र और अमला
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नौ साल से ज्यादा हो गए जब साल-2016 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को अवैध घोषित किया था.पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने सरकारी नौकरियों मे प्रमोशन मे भी आरक्षण लागू किया था.हाईकोर्ट द्वारा अवैध घोषित करने के फैसले से अचकचाई शिवराज सरकार को पहले तो कुछ सूझा नहीं क्योंकि अगड़ी जातियों मे भाजपा की गहरी पैठ है.फिर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मे जाने का रास्ता चुना क्योंकि शिवराज को डर लगा की कहीं काँग्रेस और बसपा इस मुद्दे ले ना उड़े.इसलिए राजनैतिक फायदे के लिए आक्रामक मुद्रा अपना कर दहाड़ें-कोई माई का लाल ख़त्म नहीं कर सकेगा प्रमोशन में आरक्षण के उनके एजेंडे को.(माई के लाल के मायने.!)
वो अहंकारी जुबान में यहां तक बोल गए की जरूरत पड़ने पर इसके लिए सारे नियम बदल डालूँगा.यह बात और है की मामा ना तो यह आरक्षण लागू ही कर पाए,ना इसके लिए नियम ही बदल पाए.पिछले नौ साल से यह मामला चकरघिन्नी की भांति सुप्रीम कोर्ट और फिर दुबारा हाईकोर्ट में लंबित है.विधानसभा चुनाव के समय एक मौक़ा ऐसा आया जब मीडिया के मुताबिक़ शिवराज सरकार ने ही लेट लतीफी की क्योंकि चुनाव तक वह इसे लटकाए रखना चाहती थी.नौ साल में कोई डेढ़ लाख सरकारी सेवक बिना प्रमोशन मामा को कोसते/बद्दुआऐं देते रिटायर हो गये और यह सिलसिला अब भी जारी है.
पिछले दिनों प्रकाशित खबरों ने यह मुद्दा फिर से गरम कर दिया है.प्रमोशन में आरक्षण के सुप्रीम कोर्ट और अब फिर से हाई कोर्ट में लंबित होने से प्रशासनिक ढांचा चरमरा गया है.इसका नतीजा यह हुआ है की 58 फीसदी पद खाली होने से सारा बोझ अब 42 फीसदी अमले पर आ गया है.पुलिस जैसे संवेदनशील विभाग में ही १५/२० हजार पद रिक्त होंगे.नतीजा यह है की सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचारियों की बन आई है और उनके कारनामों की खबरें खूब छप रही हैं.हमारा कहना है कि मामा को अदालतों पर भरोसा नहीं था तो सरकार ने सुप्रीमकोर्ट जाकर जनता का पैसा क्यों बर्बाद किया.? बेहतर होता वहाँ से मामला वापस लेकर नियम कानून बदल डालते.जरूरत पड़ने पर संविधान में संशोधन किया जा सकता है क्योंकि केंद्र मे भी उनकी सरकार है और आरक्षण के मुद्दे पर हर पार्टी सरकार का समर्थन करने को बेताब रहेगी.(दैनिक भास्कर/नईदुनिया/पत्रिका की खबरें)

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