श्यामलाल यादव की शानदार स्टोरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परिवारवादी राजनीति पर लगातार निशाना साधते रहे हैं। वे इसे लोकतंत्र के लिए एक घातक प्रवृत्ति मानते हैं। राजनीतिक सभाओं से लेकर लाल किले से अपने भाषणों तक उन्होंने कभी संकेतों में तो कभी बहुत स्पष्ट ढंग से राजनीति के इस स्याह पहलू को रेखांकित किया है। उनसे पहले शायद ही किसी नेता ने परिवारवादी पार्टियों पर इतना खुलकर कहा होगा!
भारतीय राजनीति की पारिवारिक सल्तनतों पर इंडियन एक्सप्रेस के एसोसिएट एडिटर श्यामलाल यादव की खोजी खबर बिहार विधानसभा चुनाव के पहले आई है। इसमें पूरे देश की सूक्ष्म पड़ताल की गई है। सदनों में बैठे कितने महानुभाव किस-किस दल की खानदानी परंपरा के वारिस हैं और कौन-कौन दल के दल पारिवार की परिसंपत्तियों की तरह संचालित हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चलाएदार पार्टियों में ही कितना लोकतंत्र है, देखना दिलचस्प है।
श्यामलाल यादव को इस रिपोर्ट को तैयार करने में निश्चित ही कुछ महीनों का समय लगा होगा। उन्होंने केंद्र से लेकर राज्यों तक 149 परिवार चिन्हित किए गए हैं, जिनके सदस्य राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा और विधानमंडलों तक विराजित हैं। कम या अधिक संख्या में सभी राजनीतिक दलों में यह प्रवृत्ति पाई गई है। यद्यपि सत्ता को अपना पैतृक अधिकार मानने वाली परिवार केंद्रित पार्टियों की महिमा बिल्कुल ही अलग है। देखा जाए तो स्वाधीनता पूर्व की पाँच सौ से अधिक रियासतें भले ही भारत में विलीन हो गई हों मगर ये डेढ़ सौ परिवार एक प्रकार से अपनी-अपनी राजनीतिक रियासतों के राजा-नवाब ही हैं, जिनकी पीढ़ियाँ तर रही हैं। अनेक आधारहीन अजूबे केवल पारिवारिक विरासत के बूते आनंद में हैं। आम कार्यकर्ता उनकी जय-जयकार में दरी-कुर्सी लगाते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हो रहे हैं।
यह रिपोर्ट बताती है कि बीजेपी, जिनके देश भर में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या 2078 है। इनमें से 387 किसी न किसी परिवार की नुमाइंदगी करते हैं और यह 18.62 प्रतिशत होता है। कांग्रेस का कोई मुकाबला नहीं है, जो पिछले तीन दशकों में केंद्र से लेकर राज्यों में लगातार सिकुड़ती गई है। इसके कुल 857 प्रतिनिधियों में से 285 यानी लगभग 33.25 प्रतिशत परिवारवादी सत्ता के प्रतीक बनकर डटे हुए हैं। शीर्ष परिवार के तीनों सदस्य किसी न किसी सदन में हैं। पार्टी भले ही असफल हो मगर वे चौथी पीढ़ी तक अपनी सत्ता को बनाए रखने में सफल हैं। जनता दल और समाजवादी पार्टी के परिवार ही राज्यों में कांग्रेस की इस राष्ट्रीय उपलब्धि को ऊँचे आँकड़ों के साथ टक्कर दे रहे हैं। सपा के 158 में से 55 नुमाइंदे परिवार के ठप्पे पर हैं जबकि जनता दल यूनाइटेड के 81 में से 28।
बिहार में अब तक हुए 23 मुख्यमंत्रियों में से सात की दूसरी और तीसरी पीढ़ी राजनीति पर कब्जा जमाए हुए है। आरजेडी के 42 फीसदी नुमाइंदे किसी न किसी परिवार से आते हैं। संख्या में यह 98 में से 30 हैं। डीएमके तो करुणानिधि के बाद स्टालिन और उनके पूरे परिवार तक फैली हुई है, जिनके 172 में से 30 सदस्य परिवार प्रथा से हैं। तेलुगूदेशम में भी 163 में से 51 सदस्य परिवारों के पालने से आए हैं। लोकसभा में 182 और राज्यसभा में 58 सदस्यों की आमद खानदानी है। कांग्रेस, सपा, आरजेडी, डीएमके सहित अनेक क्षेत्रीय पार्टियों की चाबियाँ किसी न किसी परिवार के हाथ में हैं।
परिवार के पालनों से झूलते हुए किसी भी सीट पर काबिज हुए नेता किसी न किसी सामान्य कार्यकर्ता का अधिकार छीनकर ही अपनी यात्रा पूरी करता है। लोकतंत्र के विकास में यह एक बड़ी बाधा है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि राजनीति के रास्ते में परिवार प्रथा को शून्य किया जाए। मगर यह करेगा कौन? केवल खबरें समस्या का स्वरूप भर दिखाती हैं। मगर वह एक जरूरी विमर्श भी खड़ा करती हैं। लोकतंत्र में विचार-विमर्श के लिए एक जरूरी विषय की ओर इशारा करती हैं।
श्यामलाल यादव को पूरे देश में सियासी खानदानों और उनकी ओर से सदनों में भेजे गए नुमाइंदों की गहरी छानबीन का आइडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही भाषण से आया। खोजी खबरों के लिए विख्यात श्यामलाल ने सूचना के अधिकार का उपयोग करते हुए इंडिया टुडे में कुछ चर्चित कवर स्टोरी की थीं, जो यूपीए सरकार के मंत्रियों और नौकरशाहों की विदेश यात्राओं पर आधारित थीं। उनके इस काम ने उन्हें दुनिया भर के गिने-चुने खोजी पत्रकारों में शामिल किया। तीन भाषाओं में छपी उनकी किताब पठनीय है-आरटीआई से पत्रकारिता।
राजनीतिक पत्रकारिता का अर्थ केवल पार्टी दफ्तरों में नेताओं के आसपास रोज भटकना-मटकना नहीं है। न ही बैठकों और सभाओं की ऐसी कवरेज, जो लगभग हर जगह छपती-दिखती है। यह भी नहीं कि आप किसी पार्टी विशेष या किसी पार्टी के नेता विशेष को टारगेट पर रखकर मूँछों पर ताव देकर कहें-“देखा, निपटा दिया!’ असल में देखने वाली बात यह है कि पाठकों और दर्शकों को एक समृद्ध दृष्टिकोण देने वाली कितनी विचारपूर्ण रिपोर्टें सामने आती हैं। बेशक महीनों का परिश्रम लगता है मगर ऐसी रिपोर्टें केवल आम लोगों के लिए ही नहीं बल्कि राजनीतिक दलों को भी आइना दिखाने वाली होती हैं।
श्यामलाल यादव माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के ही पूर्व छात्र हैं। वे जहाँ भी रहे हैं, केवल अपनी गहरी दृष्टि और कठोर परिश्रम के बूते अपनी जगह बनाई है। उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। मुझे यह अच्छा लगता है कि वे अपने पाठकों के लिए क्वालिटी कंटेंट को लेकर ग्राउंड पर अब भी दौड़धूप जारी रखे हुए हैं।
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