सिंहासन के बत्तीस भ्रष्टाचारी ? व्यंग -राजेन्द्र सिंह जादौन

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हमारे राजा उसी उज्जैनी नगरी से हैं जहाँ कभी विक्रमादित्य का न्याय मशहूर था। उस राजा की कुर्सी पर बैठने से पहले बत्तीस पुतलियाँ जीवित हो जाती थीं और हर पुतली राजा से सवाल करती थी। अगर वह न्यायप्रिय, सत्यनिष्ठ और साहसी नहीं होता तो सिंहासन उसे ठुकरा देता था। आज भी सिंहासन है, राजा है, पुतलियाँ हैं बस अब सवाल कोई नहीं पूछता। अब पुतलियाँ केवल ताली बजाती हैं, जयकार करती हैं और सत्ता की पूजा करती हैं। विक्रमादित्य की पुतलियाँ न्याय की कथाएँ कहती थीं, हमारे राजा की पुतलियाँ भ्रष्टाचार के भजन गाती हैं।

समय बदल गया, विचार बदल गए, अब सिंहासन भी बिक चुका है। राजा की गद्दी पर बैठने के लिए न योग्यता चाहिए, न निष्ठा, बस मीडिया मैनेजमेंट और पैसे की मोटी परत चाहिए। हमारे राजा का दरबार अब न्याय का नहीं, पीआर का मंच है। वहाँ हर कोई राजा की हाँ में हाँ मिलाने आता है। कोई यह नहीं पूछता कि प्रजा कहाँ है, सड़कें टूटी क्यों हैं, स्कूलों में अध्यापक क्यों नहीं हैं, अस्पतालों में दवा क्यों नहीं है। राजा के आसपास जो हैं, वे सब पुतलियाँ हैं किसी के हाथ में फाइल है, किसी के हाथ में माइक, किसी के हाथ में झूठी तारीफों का रटा हुआ स्क्रिप्ट।

कभी उज्जैनी का राजा जनता की तकलीफ़ सुनता था, आज का राजा कैमरे की तरफ़ देखता है। अब जनता पीछे रह गई है, सामने सिर्फ कैमरा और पीछे पुतलियाँ। एक पुतली राजा की तस्वीर सोशल मीडिया पर चमकाती है, दूसरी उसे महापुरुष बताती है, तीसरी जनता को भूलने की सलाह देती है। बत्तीस पुतलियाँ अब काँच के महल में बैठकर विकास की कहानी लिखती हैं, जो हर बारिश में बह जाती है।

मध्यप्रदेश आज भी उम्मीदों पर जिंदा है। जनता सोचती है कि शायद अगली बार न्याय मिलेगा, पर अब न्याय फाइलों में दबा है। राजा अब जनता की नहीं सुनता, बल्कि अपनी टीम से सुनता है वही टीम जो हर असफलता को सफलता बताती है। राजा को अब फिक्र नहीं कि लोग भूखे हैं, उसे चिंता है कि अगले चुनाव में फोटो कैसी दिखेगी। उसकी नजर आँकड़ों पर नहीं, तालियों पर है।

हर मंत्री, हर अधिकारी, हर सलाहकार अब बत्तीस पुतलियों का हिस्सा बन चुका है। कोई नालों को सड़क बताता है, कोई घोटाले को योजना कहता है, कोई हर असफलता को ‘विजन’ का नाम देता है। राजा इन सब पर मुस्कुराता है, क्योंकि सिंहासन अब सवाल नहीं पूछता। सिंहासन अब केवल सत्ता के वजन को झेलता है।

राजा भोज भी कभी सिंहासन 32 पर नहीं बैठ पाए थे क्योंकि वे उन गुणों पर खरे नहीं उतरे थे। पर आज का राजा तो गुण नहीं, गणना देखता है किस जाति का कितना वोट, किस क्षेत्र का कितना प्रभाव। उसकी राजनीति अब नीति नहीं, गणित बन गई है। राजा अब वही करता है जो अगले चुनाव तक उसे कुर्सी पर रखे। जनता की आवाज अब दीवारों से टकरा कर लौट आती है।

भ्रष्टाचार अब नई संस्कृति है। हर योजना के पीछे कमीशन है, हर परियोजना के पीछे रिश्वत है, हर आदेश के पीछे दलाली है। राजा जानता है, मगर चुप है क्योंकि हर पुतली उसकी चमकती तस्वीर में हिस्सेदार है। सत्य अब कोई पुतली नहीं, वह दरबार के बाहर खड़ा भिखारी है जिसे भीतर आने की इजाजत नहीं।

पुराने समय में सिंहासन न्याय का प्रतीक था, अब वह सत्ता का सौदा है। बत्तीस पुतलियाँ अब फाइलों, ठेकों, पदों और पुरस्कारों के रूप में जिंदा हैं। हर एक की डोर राजा के हाथ में है और राजा खुद किसी और के हाथ का खिलौना है। जनता दूर से देखती है कि राजा मुस्कुरा रहा है, पर वह मुस्कान असल में सत्ता की मजबूरी है।

अब कोई विक्रमादित्य नहीं जो सच सुन सके, कोई पुतली नहीं जो झूठ को रोक सके। सिंहासन अब सजावट है, और न्याय अब नारे में बदल गया है। राजा वही है, पर राज अब जनता का नहीं, दरबार का है। और दरबार में सिर्फ बत्तीस पुतलियाँ बची हैं जो हर दिन नई कहानी गढ़ती हैं, हर घोटाले को उपलब्धि में बदल देती हैं और हर सच को झूठ कह देती हैं।

मध्यप्रदेश की मिट्टी में आज भी उम्मीद बाकी है, लेकिन हवा में भ्रष्टाचार का धुआँ घुल चुका है। बत्तीस पुतलियाँ अब विकास की नहीं, विनाश की कथा सुना रही हैं। सिंहासन मौन है, राजा भ्रम में है, जनता भ्रमित है। न्याय अब कथा बन चुका है, और बत्तीस पुतलियाँ अब उसका मज़ाक उड़ा रही हैं।

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