27 सितम्बर की शाम राजुरकर और यूनुस के नाम


27 सितम्बर की शाम राजुरकर और यूनुस के नाम
विजयदत्त श्रीधर – राजुरकर ने अपना जीवन धरती पर बोझ बनकर नहीं जिया बल्कि अपने काम के माध्यम से वो अभी भी लोगों के दिल में बसा हुआ हैं।
शशांक -यूनुस की आवाज़ अपनेपन के साथ लोगों तक पहुंचती है
राजेश भट- राजुरकर राज और यूनुस में एक समानता है दोनों ने अपने सपनों को पूरा करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी।
अनिल करमेले- छिंदवाड़ा का तापमान यूनुस में है
यूनुस खान- छोटे शहरों के लोगों के ख्वाब भी पूरे होते हैं, इसका उदाहरण मैं आज आपके सामने खड़ा हूं
आज दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय की राज सदन राजूरकर राज सम्मान समारोह संपन्न हुआ ।इस वर्ष का यह सम्मान मुंबई विविध भारती के उद्घोषक यूनुस खान को दिया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान के संस्थापक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने की। मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार और पूर्व अपर महानिदेशक दूरदर्शन शशांक जी उपस्थित थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम प्रमुख आकाशवाणी भोपाल के राजेश भट जी थे। सारस्वत अतिथि के रूप में वरिष्ठ कवि और यूनुस के परम मित्र अनिल करमेले मंचासीन थे। कार्यक्रम का संयोजन दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के सदस्य वी के श्रीवास्तव ने किया तथा संचालन दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय की सदस्य डॉक्टर विशाखा राजुरकर ने किया। इस अवसर पर स्वागत उद्बोधन संग्रहालय की सचिव करुणा राजुरकर ने दिया एवं आभार संग्रहालय की संयुक्त सचिव सुरेश पटवा जी ने व्यक्त किया। इस अवसर पर रामराव वामनकर , घनश्याम मैथिल अमृत और जया आर्या ने राजुरकर के व्यक्तित्व -कृतित्व पर प्रकाश डाला तथा अनिल करमेले ने यूनुस खान के साथ छिंदवाड़ा में बिताये दिनों को साझा किया। इस अवसर पर आवाज की दुनिया के जादूगर यूनुस खान को सुनने के लिए उनके बहुत से प्रशंसक संग्रहालय में उपस्थित थे । यूनुस खान ने अपने इस सफर की स्मृतियों को याद करते हुए बताया कि बचपन में वह भोपाल आकाशवाणी में कार्यक्रम देने जाते थे ।इसके बाद छिंदवाड़ा में उनका युवा काल का समय साहित्यिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हुए बीता। यही से अनिल करमेले से उनकी प्रगाढ़ता बढ़ी ।प्छिंदवाड़ा आकाशवाणी की युव वाणी में कार्यक्रम देते हुए उन्होंने तय किया कि उन्हें अब आकाशवाणी में ही काम करना है इसके लिए उन्हें अपने परिजनों और मित्रों का का विरोध भी सहना पड़ा पर उन्होंने अपने लिये तय किये गए लक्ष्य को हासिल करके ही दम लिया। अनिल करमेले ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।आवाज़ किस तरह लोगों के मनोभाव और जीवन बदल देती है इसका उदाहरण यूनुस के रूप में आपके सामने है। यूनुस ने सिर्फ आवाज़ की दुनिया में लोकप्रिय है बल्कि उन्होंने नसरीन मुन्नी की गुलज़ार पर केन्द्रित किताब जिया जले का हिन्दी अनुवाद किया। गीतकार शैलेंद्र के गीतों पर केंद्रित उनकी किताब उम्मीद के गीतकार शैलेंद्र भी खासी चर्चित है। उन्होंने फिल्म जगत की अनेक महत्वपूर्ण हस्तियों जैसे लता मंगेशकर ,ओ पी नैयर, आमिर खान, तब्बू के इंटरव्यू लेकर भी फिल्म जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इस तरह यूनुस ने उद्घोषणा के साथ-साथ जो महत्वपूर्ण काम किए हैं वे उनके प्रशंसकों की संख्या को बढ़ाते हैं ।इस अवसर पर जब यूनुस ने मंच पर अपना अपनी बात कहना शुरू किया तो लोग मंत्र मुग्ध होकर सुनते रहे।
इस अवसर पर सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर जी ने राजुरकर को याद करते हुए राजुरकर की कर्मठता का जिक्र किया। उन्होंने कहा राजुरकर एक ऐसा व्यक्तित्व था जो धरती पर बोझ नहीं बना और अपने अंत समय तक काम करते हुए लोगों के दिल में बस गया।
इस अवसर वरिष्ठ कथाकार और दूरदर्शन के अपर महानिदेशक ने भी राजूरकर और यूनिस दोनों के कामों का जिक्र करते हुए कहा कि आज का यह सम्मान समारोह इस महीने में सार्थकता लिए हुए हैं कि राजुरकर और यूनुस दोनों ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पूरी लगन और मेहनत से काम किया और अपने लक्ष्य को हासिल करके ही रहे। उन्होंने बताया कि किस तरह आवाज की दुनिया के लोग, लोगों के मनोभावों को प्रभावित करते हैं और उनके जीवन जीने की दिशा भी बदल देते हैं । राजूरकर और यूनुस की आवाज में वही जादू था।
आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी राजेश भट जिन्होंने राजुरकर के साथ लंबे समय तक काम किया राजुरकर की बहुत सी यादों को मंच से साझा किया। उन्होंने कहा कि दिन- रात, सोते -उठते -बैठते आकाशवाणी के लिए काम करते हुए भी राजुरकर के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ संग्रहालय ही रहता था। उन्होंने इस संग्रहालय के लिए सुबह 4:00 बजे उठकर लगातार आकाशवाणी की ड्यूटी करना स्वीकार किया ताकि वे अपने बचे हुए समय का उपयोग संग्रहालय के कार्यों के लिए कर सके।
इस अवसर पर राजुरकर और यूनुस दोनों को चाहने वाले बड़ी संख्या में उपस्थित थे। जिनमें अशोक निर्मल ,अशोक मनमानी ,लक्ष्मीकांत जवणे,जया आर्य ,अरविंद सोनी, क्षमा पांडे जगदीश कौशल ,मनोज मीक,महेश सक्सेना ऋषि श्रृंगारी , राजेंद्र गट्टानी और संग्रहालय के सभी पदाधिकारियों की उपस्थिति ने आयोजन को ऊंचाईयां प्रदान की।
