आज मेले का आख़िरी दिन और ये मेरी थोड़ी सी ख़रीदारी।

यह आंटी सात बेटियों और एक बेटे की माँ हैं। अंदर से बाहर तक इन्होंने अपना मेहनताना सौ रूपये बताया। साथ के लोगों ने कहा पचास रूपये। मैंने कहा आंटी उठा लो। हम साथ-साथ चलते हैं। चलते-चलते धर्मराज मिल गए॰॰॰ ये क़िस्सा फिर कभी॰॰॰ हमारे साथ वंदना गुप्ता जी भी थीं।
गेट तक आंटी साथ-साथ चलीं। बातों- बातों में बताया कि “मुझे मेरे माता-पिता ने नहीं पढ़ाया बिटिया! अब किताब ढोने का काम करते हैं लेकिन अपने सभी बच्चों को पढ़ा रहे हैं।”
दिल ख़ुश हो गया। हमने बग़ैर मोल-भाव किए। दो सौ रूपये दिए। उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरे सर पर बतौर आशीष रखा॰॰॰
मैं कभी किसी मेहनतकश इंसान से मोलभाव नहीं करती।
फ़ोटो क्रेडिट : बिटिया भामिनी
