चौथे स्तंभ की पतंगबाजी औऱ पत्रकार ?
*चौथे स्तंभ की पतंगबाजी औऱ पत्रकार ?*
राजेन्द्र सिंह जादौन
मध्यप्रदेश की पत्रकारिता तीन दशक से अधिक का अनुभव कहता है कि इसे समझना लगभग उतना ही कठिन है जितना पतंगबाजी का खेल। हर सुबह अखबार के पन्नों में वही कहानी उभरती है, जो किसी शक्तिशाली ‘पतंगबाज’ के इशारे पर फड़फड़ाती है। कभी यह खबर हवा में उड़ती है, तो कभी किसी राजनीतिक या आर्थिक दबाव ने उसकी डोर काट दी होती है। और फिर आश्चर्यचकित होकर हम देखते हैं कि वही खबर पन्नों पर लौट आई है लेकिन अब किसी और के नाम और एजेंडा के साथ।
पत्रकारिता को पतंगबाजी की तरह समझना दुखद है, लेकिन यह सच है। मध्यप्रदेश में पत्रकारिता में सत्ता, पैसा और चमक-दमक कभी कभी इतनी अधिक होती है कि सच की डोर अक्सर टूट जाती है। एक हाथ में नोटों की गिनती, दूसरे में प्रेस कार्ड और बीच में जनता। क्या इस खेल में जनता की आवाज़ बच पाएगी?
तीन दशक से मैं देख रहा हूँ पत्रकारिता का उत्थान और पतन, दोनों। और हर बार यही सवाल उठता है: क्या हम आज भी वही पत्रकारिता कर रहे हैं जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों ने की थी? जिन्होंने अपनी कलम को तलवार की तरह चलाया, सत्य के लिए जेल गए, और कभी भी डर के आगे झुके नहीं।
आज के पत्रकार अक्सर दो तरह के हो गए हैं एक वे जो सत्ता के चमकते चाँदी के टुकड़ों के लिए सच को मोड़ देते हैं, और दूसरे वे जो दर्शक संख्या और क्लिक के लिए खबर की आत्मा बेच देते हैं। और बीच में खो गई है वह पत्रकारिता, जो जनता के हित में होती थी।
मध्यप्रदेश की पत्रकारिता के हालिया उदाहरण देखें। एक ओर डिजिटल मीट्स और ग्लोबल इन्वेस्टर सम्मिट की चमकदार खबरें लगातार पन्नों पर बिछाई जाती हैं, और दूसरी ओर गाँव-गाँव में भ्रष्टाचार, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याएं दब जाती हैं। जनता की समस्याएँ, बेरोजगारी, महंगाई—इनका कवरेज अक्सर अधूरा या एजेंडा आधारित होता है। ऐसा लगता है जैसे कुछ पत्रकार केवल “क्लिक और चंदा” के लिए खबरों की कटिंग-पेस्ट मशीन बन चुके हैं।
पत्रकारिता को स्वतंत्र होना पड़ेगा। स्वतंत्रता केवल शासन से नहीं आती यह मानसिक, नैतिक और सामाजिक स्वतंत्रता है। यह वही ताकत है जो हमें सिखाती है कि अगर कोई लड़ रहा है, तो उसका साथ देना चाहिए। अगर साथ नहीं दे सकते, तो उसके साथ खड़े रहना चाहिए। और अगर खड़े भी नहीं हो सकते, तो कम से कम उसका आत्मविश्वास बढ़ाइए। यही मूल मंत्र था हमारे शहीद पत्रकारों का।
मध्यप्रदेश में पत्रकारिता की हालत ठीक नहीं है लेकिन यह पूरी तरह से खराब भी नहीं है। अभी भी ऐसे पत्रकार हैं, जो अपने कलम को तलवार की तरह चलाते हैं। जो रिपोर्टिंग को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानते हैं। लेकिन उन्हें समर्थन और हौसले की जरूरत है।
हम अक्सर यह भी देखते हैं कि “गोदी मीडिया” का खेल बड़े पैमाने पर चलता है। किसी बड़े नेता की तारीफ़ करना, किसी विवाद को छोटा दिखाना, या किसी भ्रष्टाचार को दबाना ये सब आज के अखबारों और चैनलों की नीति में शामिल होता जा रहा है। और पाठक? वह भ्रमित, खफा और अनजान।
व्यंग्य की जरूरत यहाँ पर उतनी ही अधिक है जितनी सच की। क्योंकि व्यंग्य वह दर्पण है जो समाज को दिखाता है कि क्या हो रहा है, और किसकी दया में हमारी पत्रकारिता फंसी हुई है। व्यंग्य वह हथियार है जिससे पाठक और पत्रकार दोनों चेतावनी लेते हैं सत्य की तलवार हमेशा तेज रहती है। पत्रकारिता केवल खबर नहीं है; यह चेतना है। यह समाज के कमजोर वर्ग की आवाज़ है। यह लोकतंत्र की रक्षा की तलवार है। और इसे पतंगबाजी, चंदे या सत्ता के चमक के खेल में नहीं बदलना चाहिए।
आज के पत्रकारों से मैं यही कहना चाहता हूँ -याद रखें, शहीदों की पत्रकारिता यही सिखाती है“अगर कोई लड़ रहा है, उसका साथ दो। अगर साथ नहीं दे सकते, तो उसके साथ खड़े रहो। अगर खड़े भी नहीं हो सकते, तो कम से कम उसका आत्मविश्वास बढ़ाओ।”
मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का पुनर्निर्माण तभी होगा जब हम अपनी स्वतंत्रता को फिर से पहचानेंगे। हमें अपने भीतर की निर्भीकता को जगाना होगा। हमें अपने लेखन, अपनी रिपोर्टिंग और अपने विचारों में निष्पक्षता और साहस को प्राथमिकता देनी होगी।
*पत्रकारिता का असली मकसद केवल खबर देना नहीं है; यह लोकतंत्र और समाज के हित में आवाज़ उठाना है। और अगर हम इसे याद रखें और पालन करें, तो पतंगबाजी के इस खेल में भी पत्रकारिता अपनी असली जगह पा सकती है स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रेरक।*
